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वेद, भागवत - धर्म अधर्म क्या है?

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धर्म का शाब्दिक अर्थ धर्म एक संस्कृत शब्द है। संस्कृत में (धातु) धा + ड (विशेषण) से इसका अर्थ है "धारण करना" अतएव जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़े धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है? धर्म अधर्म - वेद अनुसारभागवत ६.१.४० में लिखा है कि जो वेद में कहा गया है ये करो ये करो वो धर्म है और जो कहा गया कि ये न करो ये न करो उसका नाम अधर्म। जैसे वेद ने कहा तैत्तिरीयोपनिषत् १.११ "सत्यं वद । धर्मं चर ।" अर्थात् सत्य बोलों वर्णाश्रम धर्म का पालन करो - ये धर्म है। अधर्म क्या है? इसका उल्टा! झूठ न बोलो पापा मत करो। इसी को वेद में कहते है विधि और निषेध। विधि मने ये करो ये करो। निषेध मानें ये न करो। यही है धर्म और अधर्म। तो जो वेद में लिखा है! इसी का नाम धर्म अधर्म। ८०,००० कुल वेद की ऋचाएं है अर्थात् वेद मंत्र है धर्म अधर्म की। इनको पढ़ना समझना, इस कलयुग वाले मनुष्य की बुद्धि के लिए असंभव सा है। भागवत ११.२७.६ में भगवान कृष्ण उद्धव से कह रहे है कि "कर्म काण्ड (कर्म धर्म) का अंत नहीं है उद्धव।" भागवत ६.३.१९ वेदव्य…

आदि शंकराचार्य - संन्यास, जन्म, हिन्दू धर्म की पुनः स्थापना

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आदि शंकराचार्य अद्वैत (दो नहीं) वेदांत के प्रणेता प्रसिद्ध शैव आचार्य थे। उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्होंने अपनी टीकाएँ लिखने का उदेस्य अद्वैत (दो नहीं) वेदांत का प्रचार करना था। परन्तु जगह जगह पर देव्त (दो) की बातें भी लिखी है। इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद् और जिनके प्रबंधक तथा गद्दी के अधिकारी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं। वे चारों स्थान ये हैं- (१) बदरिकाश्रम, (२) करवीर पीठ, (३) द्वारिका पीठ और (४) शारदा पीठ। इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था। ये शंकर जी के अवतार हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विस्तार से व्याख्या की है। आदि शंकराचार्य लगभग पूरे भारत की यात्रा की और इनके जीवन का अधिकांश भाग उत्तर भारत में बीता। आदि शंकराचार्य - जन्म आदि शंकराचार्य का जन्म सन् 788 ई. में केरल में कालपी अथवा 'काषल' नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा था। बहुत दिन तक सपत्नीक शिव को आराधना करने के अनंतर शिवगुरु ने पुत्ररत्न पाया था, अत:…

कैसे किया आदि शंकराचार्य ने संन्यास ग्रहण?

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जब आदि शंकराचार्य तीन ही वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया। शंकराचार्य बड़े ही मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। छह वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड पंडित हो गए थे और आठ वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। शंकराचार्य के संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है। कहते हैं, माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। एक दिन जब शंकर अपनी माता के साथ किसी आत्मीय के यहाँ से लौट रहे थे, तब नदी, पार करने के लिए वे उसमें घुसे। गले भर पानी में पहुँकर इन्होंने माता को संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा न देने पर डूब मरने की धमकी दी। इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान की और इन्होंने गोविन्द स्वामी से संन्यास ग्रहण किया। पहले ये कुछ दिनों तक काशी में रहे, और तब इन्होंने विजिलबिंदु के तालवन में मण्डन मिश्र को सपत्नीक शास्त्रार्थ में परास्त किया। इन्होंने समस्त भारतवर्ष में भ्रमण करके बौद्ध धर्म को मिथ्या प्रमाणित किया तथा वैदिक धर्म को पुनरुज्जीवित किया। अवश्य पढ़े वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है। और क्या सब कुछ भगवान करत…

चार युग - मनुष्य का जीवन (वर्ष) और उनकी लम्बाई।

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युग का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। उदाहरणः कलियुग, द्वापर, सत्ययुग, त्रेतायुग आदि। सभी युग में मनुष्यों की अलग-अलग होती है उनका जीवन और उनके शरीर की लम्बाई।
प्रत्येक युग के जीवन प्रमाण और उनकी शरीर की लम्बाई कुछ इस तरह है: सत्ययुग सत्ययुग का पूर्ण समय - 17,28,000 मानव वर्ष
मनुष्य की आयु - 1,00,000 मानव वर्ष
लम्बाई - 31 फिट (लगभग) त्रेतायुग त्रेतायुग का पूर्ण समय - 12,96,000 मानव वर्ष
मनुष्य की आयु - 10,000 मानव वर्ष
लम्बाई - 21 फिट (लगभग) द्वापरयुग द्वापरयुग का पूर्ण समय - 8,64,000 मानव वर्ष
मनुष्य की आयु - 1000 मानव वर्ष
लम्बाई - 11 फिट (लगभग) कलियुग कलियुग का पूर्ण समय - 4,32,000 मानव वर्ष
मनुष्य की आयु - 100 मानव वर्ष
लम्बाई - 5.5 फिट (लगभग)

ब्रह्मा जी की आयु है इस ब्राह्मण की आयु।

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सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी हैं। इनकी आयु ब्राह्मण की आयु के बराबर होती है। ब्रह्मा जी की आयु १००० महायुगों के बराबर होती है। ब्रह्मा की काल गणना ब्रह्मा जी की आयु 100 वर्ष है। जिसमें से उनकी आधी उम्र बीत गयी है। चारों युग सत युग - 1,728,000 मानव वर्ष
त्रेता युग - 1,296,000 मानव वर्ष
द्वापर युग - 864,000 मानव वर्ष
कलि युग - 432,000 मानव वर्ष यह चारों युग का कुल समय = 43 लाख 20 हजार मानव वर्ष होता है जिसे महायुग भी कहते है। श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार "सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः", अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग। इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 खरब 32 अरब मानव वर्ष (एक कल्प) है। इतना ही समय ब्रह्मा जी की रात्रि भी है। अर्थात ब्रह्मा जी का एक दिन (रत+दिन) होता है = 8,640,000,000 (8 खरब 64 अरब) मानव वर्ष (2 कल्प) है। दूसरे शब्दों में समझें:
यह चारों युग = 43,20,000 (43 लाख 20 हजार) मानव वर्ष =1 महायुग
1 महायुग x 71 = 1 मन्वन्तर (306,720,000) मानव वर्ष
प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होत…

हिन्दू वैदिक चार युग का कुल समय।

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युग, हिंदु सभ्यता के अनुसार, एक निर्धारित संख्या के वर्षों की कालावधि है। ब्रह्माण्ड का काल चक्र चार युगों के बाद दोहराता है। काल के अंगविशेष के रूप में 'युग' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद से ही मिलता है (दश युगे, ऋग् 1.158.6) इस युग शब्द का परिमाण अस्पष्ट है। युग का अर्थ युग का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। उदाहरणः कलियुग, द्वापर, सत्ययुग, त्रेतायुग। युग का समय सत्ययुग (उकृत), त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। सबसे पहले सत्ययुग आता है, फिर त्रेतायुग, फिर द्वापरयुग और फिर कलियुग आता है। चारों युग सत युग - 1,728,000 मानव वर्ष
त्रेता युग - 1,296,000 मानव वर्ष
द्वापर युग - 864,000 मानव वर्ष
कलि युग - 432,000 मानव वर्ष इस को दूसरे शब्दों में कहे तो
कलियुग का दोगुना द्वापर - 432,000x2=840000 मानव वर्ष
कलियुग का तीनगुना त्रेता - 432,000x3=1296000 मानव वर्ष
कलियुग का चारगुना सत युग - 432,000x4=1728000 मानव वर्ष विष्णु पुराण के अनुसार - विष्णु पुराण भाग १, तॄतीय अध्याय के अनुसार: 1 मानव वर्ष = एक दिव्य दिवस (दिन)
360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष 4,000 + 400 + 400 = …

गोपियों को शंका - कृष्ण अखंड ब्रह्मचारी कैसे?

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एक बार गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा कि हमने एक व्रत रखा है, उसके परायण के लिए एक महात्मा को ढूंढ रहे हैं, उनको हम खाना खिला दे तो व्रत का परायण हो जाए। तो कृष्ण ने कहा कि एक काम करो तुम हमारे गुरु के पास जाओ। श्रीकृष्ण के गुरु दुर्वासा थे। तो सभी गोपियों ने कहा कि वह दुर्वासा जी तो यमुना उस पार रहते हैं और इस समय भादों की यमुना है। यमुना का पानी बहुत ऊपर है कैसे जा सकते हैं। तो श्रीकृष्ण ने कहा कि अच्छा एक काम करो तुम जाओ और यमुना से कह दो कि अगर श्री कृष्ण अखंड ब्रह्मचारी हैं यमुना मार्ग दे दे। अब गोपियों ने सोचा कि ये झूठ बोल रहे हैं। अरे! हमारे साथ खुद ही घुमा-फिरा करते हैं। हम लोग को प्रत्यक्ष अनुभव यह कहाँ से अखंड ब्रह्मचारी है? हमारे साथ राधा जी के साथ इतने दिन उन्होंने गुजारे हैं। और अखंड ब्रह्मचारी कैसे हैं? तभी एक सखी ने कहा एक गोपी से चलो छोड़ो जाने दो, अगर यमुना मार्ग नहीं देती तो इन्हीं के कान खींचेगे हम। और इनका (कृष्ण का) फिर से दर्शन मिलने का लाभ भी प्राप्त होगा। गोपी गई यमुना के पास और कहा यमुना से कि हे यमुना मैया अगर श्रीकृष्ण अखंड ब्रह्मचारी हो तो आप हमें मार्ग दे …

माया और योग माया

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माया और योग माया में क्या अंतर है? सबसे पहले यह समझ लीजिए कि माया और योगमाया यह दोनों भगवान की शक्ति है। जैसा की हम जानते हैं कि शक्ति और शक्तिमान से पृथक नहीं हो सकती। उदाहरण से समझिए आग और आग में जलाने की शक्ति। आग में जलाने की शक्ति होती है। तो आग को अलग कर दो और जलाने की शक्ति बची रहे ऐसा तो हो नहीं सकता। इसी प्रकार माया और योग माया दोनों भगवान की शक्ति है। योग माया शक्ति क्या है? योग माया भगवान की अंतरंग शक्ति है। यह भगवान की अपनी शक्ति है। भगवान के जितने भी कार्य होते हैं वह योग माया से होते हैं। जैसे भगवान जो भी लीला करते हैं वह योग माया के द्वारा करते हैं। भगवान जो कुछ भी सोचते हैं वह योग माया तुरंत उस चीज को कर देती है। जैसे कि आपने सुना होगा कि कृष्ण जब जन्म लिए तो द्वारपा सो गए, द्वार अपने आप खुल गए, यमुना ने मार्ग दे दिया, यह सब योग माया से होता है। योग माया की पहचान। जब भी भगवान की कोई चीज या कार्य असंभव हो और वह संभव हो रही है। तो आप समझ लीजिये की यह योग माया के द्वारा हुआ है। जैसे वेदों ने कहा कि भगवान स्वतंत्र हैं वह किसी के अधीन नहीं है। और वह यशोदा मैया के डंडे से ड…

स्वामी विवेकानन्द के अनमोल वचन

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हमारे देश में कई ऐसे महापुरूष हुए हैं, जिनके जीवन और विचार से कोई भी व्यक्ति बहुत कुछ सीख सकता है। उनके विचार ऐसे हैं कि निराश व्यक्ति भी अगर उसे पढ़े तो उसे जीवन जीने का एक नया मकसद मिल सकता है। इन्‍हीं में से एक हैं स्‍वामी विवेकानंद। उनका जन्‍म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। पहले जानिए उनके बारे में ये खास बातें... स्वामी विवेकानन्द ने कहा मैं सिर्फ और सिर्फ प्रेम की शिक्षा देता हूँ और मेरी सारी शिक्षा वेदों के उन महान सत्यों पर आधारित है जो हमें समानता और आत्मा की सर्वत्रता का ज्ञान देती है। सफलता के तीन आवश्यक अंग हैं-शुद्धता, धैर्य और दृढ़ता। लेकिन, इन सबसे बढ़कर जो आवश्यक है वह है प्रेम। हम ऐसी शिक्षा चाहते हैं जिससे चरित्र निर्माण हो। मानसिक शक्ति का विकास हो। ज्ञान का विस्तार हो और जिससे हम खुद के पैरों पर खड़े होने में सक्षम बन जाएं। खुद को समझाएं, दूसरों को समझाएं। सोई हुई आत्मा को आवाज दें और देखें कि यह कैसे जागृत होती है। सोई हुई आत्मा के का जागृत होने पर ताकत, उन्नति, अच्छाई, सब कुछ आ जाएगा। मेरे आदर्श को सिर्फ इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता हैः मानव जाति देवत्व की सीख क…