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कर्म-धर्म का पालन करने का फल क्या है?

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वेद कहता है मुण्डकोपनिषद १.२.७ "कर्म-धर्म को कोई विधिवत भी पालन करेगा, तो उसका फल जो मिलेगा वो नश्वर (नाश होनेवाला) है।" जैसे एक बड़ा कमजोर पुल है, जिसके ऊपर पैर रखा और गिर गया और गया पाताल में। १८ प्रकार के यज्ञ होते है, सबका यही है, सब नश्वर (नाश होनेवाला) है। मुण्डकोपनिषद १.२.८ इस मंत्र का भवार्थ यह है कि "कर्म धर्म का पालन करने वाला ८४ लाख के शरीर में घूमता रहता है। न तो उसे मोछ मिलेगा, न भगवान मिलेंगे, न आनंद मिलेगा, न तो दुःख जायेगा।" मुण्डकोपनिषद १.२.९ "जो लोग अपने आप को बड़ा बुद्धिमान मानने वाले, जो कर्म-धर्म का पालन करते है ये कुछ के लिए नश्वर (नाश होनेवाला) स्वर्ग में जाते है फिर स्वर्ग से निचे गिरा दिए जाते है अर्थात् मृत्यु लोक या नर्क में भेज दिए जाते है।" जैसे एक प्रधान मंत्री ५ साल तक सत्ता में रहा फिर बाद में इलेक्शन में हार जाने से वो बिचारा एक कोने में चुचाप बैठा रहता है। अब उसको कोई नहीं पूछता। तो! यह तो काम से काम मनुष्य बना है, काम से काम रोटी दाल खा रहा है। लेकिन जब स्वर्ग वाले निचे आते है उसका क्या हल होता है? मुण्डकोपनिषद १.२.१० &qu…

सरस्वती देवी कौन है?

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सरस्वती जी के हाथ में जो पुस्तक है उसमें ब्रह्म ज्ञान है, अतएव माँ सरस्वती मूल रूप से वेदज्ञान की देवी है। तो माँ सरस्वती वास्तव में वैदिक शिक्षा देने वाली देवी है। सरस्वती जी हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं। सरस्वती जी भगवान की योग माया शक्ति है। जो विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनका नामांतर 'शतरूपा' भी है। सरस्वती माँ के अन्य नामों में शारदा, शतरूपा, वीणावादिनी, वीणापाणि, वाग्देवी, वागेश्वरी, भारती आदि कई नामों से जाना जाता है। ये शुक्लवर्ण, श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणावादनतत्परा तथा श्वेतपद्मासना कही गई हैं। इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है। माघ शुक्ल पंचमी को इनकी पूजा की प्रथा चली आ रही है क्योकिं इस दिन इनका जन्म (प्रकट) हुई थी। देवी भागवत के अनुसार ये ब्रह्मा की स्त्री हैं। सरस्वती जी को साहित्य, संगीत, कला की देवी है। उसमें विचारणा, भावना एवं संवेदना का त्रिविध समन्वय है। वीणा संगीत की, पुस्तक विचारणा की और मयूर वाहन कला की अभिव्यक्ति है। मनन से मनुष्य बनता है। मनन बुद्धि का विषय है। भौतिक प्रगति का श्रेय बुद्धि-वर्चस् को दिया जाना और उसे सरस…

माँ सरस्वती वंदना मंत्र | Saraswati Vandana

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माँ सरस्वती को विद्या और कला की देवी है। भारत में संगीतकारों से लेकर वैज्ञानिकों तक हर कोई ज्ञान-प्राप्ति और मार्गदर्शन के लिए माँ सरस्वती देवी से पूजा-प्रार्थना करता है। माँ सरस्वती के भक्तगण सौभाग्य-प्राप्ति के लिए हर सुबह सरस्वती वंदना मंत्र का पठन करते हैं। माँ सरस्वती वंदना मंत्र या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमणितकरा या श्वेतपदमासना।।
या ब्रह्माडच्युतशंकरप्रभृतिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।। १।। भावार्थ :- जो विद्या की देवी भगवती सरस्वतीकुन्द के फूल, चन्द्रमा, हिमराशि औऱ मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है, जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ मे वीणा औऱ दण्ड शोभायमान है तथा जिन्होंने श्वेत कमल पर आसान ग्रहण किया है, ब्रह्मा, बिष्णु औऱ महेश तथा अन्य देवता जिसकी वन्दना करते है, वही सम्पूर्ण जड़ता औऱ अज्ञान को दूर कर देने वाली भगवतीं सरस्वती हमारी रक्षा करें। शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमाम् आद्यां जगद् व्यापिनीम्।
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।।
हस्ते स्फाटिकमालिका विंदधतीं पद्यासने संस्थिताम्।
वन्दे तां पर…

वसंत पंचमी या श्रीपंचमी क्यों मनाते है?

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वसंत पंचमी क्या है? - आध्यात्मिक हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल माघ महीने में शुक्ल की पंचमी को विद्या और बुद्धि की देवी माँ सरस्वती की उपासना होती है। इस पर्व को आम भाषा में वसंत पंचमी कहा जाता है। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है। ज्ञान और कला की देवी माँ सरस्वती का जन्मदिवस को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माँ शारदे (सरस्वती) की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। ज्ञानवान या बुद्धिमान कौन हैं?भागवत ११.१९.४२ मे भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव से कहा था कि "मुर्ख वो है जो अपने आप को शरीर (मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ) मानता है।" तो इस आधार से ज्ञानवान या बुद्धिमान वो है जो अपने आप को सदा आत्मा माने। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता १०.३५ में कहा कि ऋतुओं में वसन्त ऋतु मैं हूँ।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर: ॥ भावार्थ :- गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छन्दों में गायत्…

आदि शंकराचार्य - संन्यास, जन्म, हिन्दू धर्म की पुनः स्थापना

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आदि शंकराचार्य अद्वैत (दो नहीं) वेदांत के प्रणेता प्रसिद्ध शैव आचार्य थे। उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्होंने अपनी टीकाएँ लिखने का उदेस्य अद्वैत (दो नहीं) वेदांत का प्रचार करना था। परन्तु जगह जगह पर देव्त (दो) की बातें भी लिखी है। इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद् और जिनके प्रबंधक तथा गद्दी के अधिकारी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं। वे चारों स्थान ये हैं- (१) बदरिकाश्रम, (२) करवीर पीठ, (३) द्वारिका पीठ और (४) शारदा पीठ। इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था। ये शंकर जी के अवतार हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विस्तार से व्याख्या की है। आदि शंकराचार्य लगभग पूरे भारत की यात्रा की और इनके जीवन का अधिकांश भाग उत्तर भारत में बीता। आदि शंकराचार्य - जन्म आदि शंकराचार्य का जन्म सन् 788 ई. में केरल में कालपी अथवा 'काषल' नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा था। बहुत दिन तक सपत्नीक शिव को आराधना करने के अनंतर शिवगुरु ने पुत्ररत्न पाया था, अत:…

कैसे किया आदि शंकराचार्य ने संन्यास ग्रहण?

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जब आदि शंकराचार्य तीन ही वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया। शंकराचार्य बड़े ही मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। छह वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड पंडित हो गए थे और आठ वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। शंकराचार्य के संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है। कहते हैं, माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। एक दिन जब शंकर अपनी माता के साथ किसी आत्मीय के यहाँ से लौट रहे थे, तब नदी, पार करने के लिए वे उसमें घुसे। गले भर पानी में पहुँकर इन्होंने माता को संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा न देने पर डूब मरने की धमकी दी। इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान की और इन्होंने गोविन्द स्वामी से संन्यास ग्रहण किया। पहले ये कुछ दिनों तक काशी में रहे, और तब इन्होंने विजिलबिंदु के तालवन में मण्डन मिश्र को सपत्नीक शास्त्रार्थ में परास्त किया। इन्होंने समस्त भारतवर्ष में भ्रमण करके बौद्ध धर्म को मिथ्या प्रमाणित किया तथा वैदिक धर्म को पुनरुज्जीवित किया। अवश्य पढ़े वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है। और क्या सब कुछ भगवान करत…

चार युग - मनुष्य का जीवन (वर्ष) और उनकी लम्बाई।

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युग का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। उदाहरणः कलियुग, द्वापर, सत्ययुग, त्रेतायुग आदि। सभी युग में मनुष्यों की अलग-अलग होती है उनका जीवन और उनके शरीर की लम्बाई।
प्रत्येक युग के जीवन प्रमाण और उनकी शरीर की लम्बाई कुछ इस तरह है: सत्ययुग सत्ययुग का पूर्ण समय - 17,28,000 मानव वर्ष
मनुष्य की आयु - 1,00,000 मानव वर्ष
लम्बाई - 31 फिट (लगभग) त्रेतायुग त्रेतायुग का पूर्ण समय - 12,96,000 मानव वर्ष
मनुष्य की आयु - 10,000 मानव वर्ष
लम्बाई - 21 फिट (लगभग) द्वापरयुग द्वापरयुग का पूर्ण समय - 8,64,000 मानव वर्ष
मनुष्य की आयु - 1000 मानव वर्ष
लम्बाई - 11 फिट (लगभग) कलियुग कलियुग का पूर्ण समय - 4,32,000 मानव वर्ष
मनुष्य की आयु - 100 मानव वर्ष
लम्बाई - 5.5 फिट (लगभग)

ब्रह्मा जी की आयु है इस ब्राह्मण की आयु।

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सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी हैं। इनकी आयु ब्राह्मण की आयु के बराबर होती है। ब्रह्मा जी की आयु १००० महायुगों के बराबर होती है। ब्रह्मा की काल गणना ब्रह्मा जी की आयु 100 वर्ष है। जिसमें से उनकी आधी उम्र बीत गयी है। चारों युग सत युग - 1,728,000 मानव वर्ष
त्रेता युग - 1,296,000 मानव वर्ष
द्वापर युग - 864,000 मानव वर्ष
कलि युग - 432,000 मानव वर्ष यह चारों युग का कुल समय = 43 लाख 20 हजार मानव वर्ष होता है जिसे महायुग भी कहते है। श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार "सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः", अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग। इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 खरब 32 अरब मानव वर्ष (एक कल्प) है। इतना ही समय ब्रह्मा जी की रात्रि भी है। अर्थात ब्रह्मा जी का एक दिन (रत+दिन) होता है = 8,640,000,000 (8 खरब 64 अरब) मानव वर्ष (2 कल्प) है। दूसरे शब्दों में समझें:
यह चारों युग = 43,20,000 (43 लाख 20 हजार) मानव वर्ष =1 महायुग
1 महायुग x 71 = 1 मन्वन्तर (306,720,000) मानव वर्ष
प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होत…

हिन्दू वैदिक चार युग का कुल समय।

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युग, हिंदु सभ्यता के अनुसार, एक निर्धारित संख्या के वर्षों की कालावधि है। ब्रह्माण्ड का काल चक्र चार युगों के बाद दोहराता है। काल के अंगविशेष के रूप में 'युग' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद से ही मिलता है (दश युगे, ऋग् 1.158.6) इस युग शब्द का परिमाण अस्पष्ट है। युग का अर्थ युग का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। उदाहरणः कलियुग, द्वापर, सत्ययुग, त्रेतायुग। युग का समय सत्ययुग (उकृत), त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। सबसे पहले सत्ययुग आता है, फिर त्रेतायुग, फिर द्वापरयुग और फिर कलियुग आता है। चारों युग सत युग - 1,728,000 मानव वर्ष
त्रेता युग - 1,296,000 मानव वर्ष
द्वापर युग - 864,000 मानव वर्ष
कलि युग - 432,000 मानव वर्ष इस को दूसरे शब्दों में कहे तो
कलियुग का दोगुना द्वापर - 432,000x2=840000 मानव वर्ष
कलियुग का तीनगुना त्रेता - 432,000x3=1296000 मानव वर्ष
कलियुग का चारगुना सत युग - 432,000x4=1728000 मानव वर्ष विष्णु पुराण के अनुसार - विष्णु पुराण भाग १, तॄतीय अध्याय के अनुसार: 1 मानव वर्ष = एक दिव्य दिवस (दिन)
360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष 4,000 + 400 + 400 = …