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हम होली क्यों मनाते है? होलिका-दहन क्यों किया जाता हैं?

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भगवान् सर्वव्यापक है, यह बोध करने के लिए होली मनाई जाती हैं। लेकिन हम लोग क्या करते है? हम लोग बहिरंग(बाहरी) विनोद करते हैं, इसके बारे में लिखना व्यर्थ हैं, क्योंकि आप लोग जानते है आप क्या-क्या करते हैं होली के पर्व पर। होली किस लिए है? क्यों मनाते हैं हम  होली?
   यह बात तब की हैं जब प्रह्लाद(प्रहलाद) हिरण्यकशिपु के पुत्र थे, और हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी की तपस्या करने गया था। तब नारद जी ने हिरण्यकशिपु की स्त्री को इंद्र से बचाया था और नारदजी ने हिरण्यकशिपु की स्त्री अपने आश्रम लेकर गए। उस वक्त प्रह्लाद पेट में थे और उसी वक्त नारदजी ने भक्ति का उपदेश दिया था। वैसे तो प्रह्लाद अनंत जन्म का महापुरुष था, लेकिन लीला करने के लिए नारदजी ने उपदेश दिया और वो भक्त हो गया। और पैदा होते ही भक्ति करने लगा क्योंकि पेट में भक्त था। ये सब बातें सतयुग की हैं उस वक्त लोगों की स्मरण(याददाश्त) बहुत अधिक थी आज के मुकाबले।
        हिरण्यकशिपु  भगवान् का दुश्मन था, क्योंकि उसके भाई (हिरण्याक्ष) को भगवान् ने मार था। हिरण्यकशिपु भगवान् को मारने के लिए ब्रह्मा का घोर तप किया और बड़ा लंबा-चौड़ा वरदान मांग: "न…

अर्जुन ने युद्ध भूमि में कर्म किया था, कर्म का मूल अर्थ?

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हमने आपको बताया की कर्म किसे कहते हैं? कर्म, क्रिया और कार्य में क्या भेद हैं? कर्म क्या है? इस लेख में विस्तार रूप से बतया। लेकिन! हम ने इस लेख में माया जगत कर्म के कर्म को बताया। लेकिन अब हम आपको कर्म का मूल अर्थ बताने जा रहे है। कर्म कामना से उत्पन होता है और कामना आसक्ति से होती है।जिसकी जहाँ आसक्ति होगी, उसीकी कामना होगी और जिसकी कामना होगी उसकी पूर्ति में आनंद (सुख) मिलेगा, और लोभ पैदा होगा। कामना की पूर्ति नहीं हुई तो दुःख मिलेगा, और क्रोध पैदा होगा। दो प्रकार के कर्म तो अब कर्म भी दो प्रकार के हो गए एक तो संसार संबंधी कर्म और एक भगवान संबंधी कर्म। जैसा कि हमने आपको बताया कि कर्म कामना से उत्पन्न होता है और कामना आसक्ति से उत्पन्न होती है। हम लोग जो माया के आधीन हैं हमारी आसक्ति माया के जगत में है और जो ऋषि मुनि संत महात्मा भक्ति त्यागी लोग हैं उनका आसक्ति या अटैचमेंट भगवान में है। भगवान में आसक्त होना या भगवान में मन का लगना यही भक्ति कहलाती है और संसार में मन का आसक्त होना या अटैचमेंट होना यह संसारी आसक्ति कहलाती है। इसी को माया का बंधन कहते हैं। तो युद्ध भूमि क्योंकि अर…

रामकृष्ण परमहंस का जीवन परिचय - जन्म विवाह मृत्यु इत्यादि

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संछेप में रामकृष्ण परमहंस का व्यक्तित्व रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए भक्त (उपासना) का जीवन बिताया चाहिए और उन्होंने भी अपने जीवन में यही किया। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म के उपासना काण्ड सच्चे हैं और उनमें कोई अंतर नहीं। वे ईश्वर तक पहुँचने के साधन मात्र हैं। सभी धर्मो के कर्म काण्ड में अंतर है जिससे ऐसा लगता है कि एक धर्म और दूसरा धर्म अलग है। रामकृष्ण परमहंस का जीवन जन्म और माता-पिता संत रामकृष्ण परमहंस का जन्म १८ फ़रवरी १८३६ को बंगाल प्रांत एक कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके बचपन का नाम गदाधर था। पिता का नाम खुदीराम और माता का नाम चन्द्रमणिदेवी था। उनके भक्तों के अनुसार रामकृष्ण के माता पिता को उनके जन्म से पहले ही अलौकिक घटनाओं और दृश्यों का अनुभव हुआ था। गया में जब उनके पिता खुदीराम ने एक स्वप्न देखा था। जिसमें उन्होंने देखा की भगवान गदाधर (विष्णु के अवतार हैं) ने उन्हें कहा की वे उनके पुत्र के रूप में …

वास्तविक कारण - माँ सती राम को देखकर भ्रमित होना व झूठ बोलना।

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जैसा कि आप लोग जानते हैं कि सती ने शिवजी से झूठ बोला था कि उन्होंने सीता का वेश धारण करके राम की परीक्षा नहीं ली है। परंतु शिव जी तो अंतर्यामी है उनको पता चल गया कि सती जी झूठ बोल रही हैं। जिसके बाद शिव जी ने मन ही मन माँ सती जी को त्याग दिया था और उसके उपरांत बाद में जब दक्ष यज्ञ कर रहे थे। तो उस में शिव जी को नहीं बुलाया। तब सती जी ने अपने पति का अपमान समझते हुए अपने आप को योगअग्नि में जला दिया। कुछ लोग इस कथा को ऐसा समझते हैं कि माँ सती को जो भ्रम हुआ था, वह वाकई उनको भ्रम हुआ था, ऐसा कुछ लोग मानते हैं। और कुछ लोग यह भी मानते हैं कि शिव जी के मन में वाकई सती को त्यागने की बात आई थी। कयोंकि यह बात तुलसीदास ने लिखा है। तो जो लोग ऐसा मानते हैं उनके लिए सच्चाई उनके सोच से परे है। वास्तविकता यह है कि शिव जी ने जब शिव पार्वती का विवाह हो गया था। तो एक दिन शिवजी से माँ पार्वती जी शिव जी से कहती हैं कि जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी॥
तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना॥ भावार्थ :- हे सुख की राशि ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी ज…

पति (शंकर जी) के अपमान से दुःखी होकर सती का योगाग्नि से जल जाना।

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सती से पति शिवजी का अपमान सहा नहीं गया। ब वे सारी सभा को हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं - हे सभासदों और सब मुनीश्वरो! सुनो। जिन लोगों ने यहाँ शिवजी की निंदा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछताएँगे। जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति श्री विष्णु भगवान की निंदा सुनी जाए, वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस निंदा करने वाले की जीभ काट लें और नहीं तो कान मूँदकर वहाँ से भाग जाएँ। चन्द्रमा को ललाट पर धारण करने वाले वृषकेतु शिवजी को हृदय में धारण करके मैं इस शरीर को तुरंत ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजी ने योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशाला में हाहाकार मच गया। सती का मरण सुन शिवजी ने सती का मरण सुनकर शिवजी के गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगुजी ने उसकी रक्षा की। ये सब समाचार शिवजी को मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्र को भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओं को यथोचित फल (दंड) दिया। सती ने मरते समय भगवान हरि से वर माँगा सती ने मरते समय भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा …

शिव ने समाधि खोली, सती जी का दक्ष के यज्ञ में जाना - सती शिव की कथा

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हमने अपने पिछले लेख में बताया शिवजी द्वारा सती का त्याग और शिवजी की समाधि - सती शिव की कथा अब उसके आगे क्या हुआ यह बताने जा रहे है। शिव ने समाधि खोली सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनाशी शिवजी ने समाधि खोली। शिवजी जब रामनाम का स्मरण करने लगे, तब सतीजी ने जाना कि अब जगत के स्वामी (शिवजी) जागे। उन्होंने जाकर शिवजी के चरणों में प्रणाम किया। शिवजी ने सती को बैठने के लिए सामने आसन दिया। फिर शिव भगवान हरि की रसमयी कथाएँ सती जी से कहने लगे। दक्ष को अहंकार जब सती को शिव हरि की कथा सुना रहे थे। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्मा ने सब प्रकार से योग्य देख-समझकर दक्ष को प्रजापतियों का नायक बना दिया। जब दक्ष ने इतना बड़ा अधिकार पाया, तब उनके हृदय में अत्यंत अभिमान आ गया। तुलसीदास कहते है कि जगत् में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो। दक्ष का निमन्त्रण दक्ष ने सब मुनियों, किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व, सब देवता और भगवान को बुला लिया। दक्ष का निमंत्रण पाकर - किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियों सहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेव को छोड़कर सभी देवता अपना-अपना …

क्यों शिवजी ने सती (पार्वती) को त्याग कर दिया। - सती शिव की कथा

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हमने अबतक अपने दो लेख में सती जी को अनेक भगवान शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे। - सती शिव की कथा और सती का सीता का रूप धारण करके राम की परीक्षा लेना। - सती शिव की कथा को बताया। सती जी ने झूठ कहा कि वो श्री राम की परीक्षा नहीं ली है। लेकिन शिवजी ने ध्यान करके देखा और सतीजी ने जो चरित्र किया था, सब जान लिया। अब उसके आगे क्या हुआ यह बताने जा रहे है। परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥56॥ भावार्थ :- भोलेनाथ मन में सोच रहे है - सती परम पवित्र हैं, इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करने में बड़ा पाप है (जो भगवान से प्रेम करते है, उन्हें किसी और से प्रेम नहीं करना चाहिए, वह पाप है) प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदय में बड़ा संताप है। शिवजी के मन में सती त्याग की बात तब शिवजी ने प्रभु श्री राम के चरण कमलों में सिर नवाया और श्री रामजी का स्मरण करते ही उनके मन में यह आया कि सती के इस शरीर से मेरी पति-पत्नी रूप में भेंट नहीं हो सकती और शिवजी ने अपने मन में यह संकल्प कर लिया। आकाशवाणी होना स्थिर बुद्धि शंकरजी ऐसा विचार कर श्री…

सती जी को अनेक भगवान शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे। - सती शिव की कथा

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हमने अपने पिछले लेख में बताया सती का सीता का रूप धारण करके राम की परीक्षा लेना। - सती शिव की कथाअब उसके आगे क्या हुआ यह बताने जा रहे है। सतीजी को संकोच सती जी सोच में पड़ गयी की राम ने मुझे पहचान कैसे लिया, जबकि मैं तो सीता का रूप बनाई हूँ। सतीजी डरती हुई चुपचाप शिवजी के पास जाने लगी, उनको बड़ी चिन्ता होने लगी कि मैंने शंकरजी का कहना न माना और अपने अज्ञान का श्री रामचन्द्रजी पर आरोप किया। अब जाकर मैं शिवजी को क्या उत्तर दूँगी? यह सोचते-सोचते सतीजी के हृदय में अत्यन्त भयानक जलन पैदा हो गई। पीछे की ओर फिरकर देखा, तो वहाँ भी भाई लक्ष्मणजी और सीताजी के साथ श्री रामचन्द्रजी सुंदर वेष में दिखाई दिए। अनंत भगवान के रूप दिखाए पड़े सतीजी जिधर देखती हैं, उधर ही श्री रामचन्द्रजी विराजमान हैं और ने अनेक भगवान अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे। उन्होंने अनगिनत अनुपम सती, ब्रह्माणी और लक्ष्मी देखीं। जिस-जिस रूप में ब्रह्मा आदि देवता थे, उसी के अनुकूल रूप में (उनकी) ये सब (शक्तियाँ) भी थीं। सती जी देखा कि अनेकों वेष धारण करके देवता प्रभु श्री रामचन्द्रजी की पूजा कर रहे हैं। सीता सहित श्री रघुनाथजी बह…

सती का सीता का रूप धारण करके राम की परीक्षा लेना। - सती शिव की कथा

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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने यह कथा लिखा है। तुलसीदास जी ने जो चौपाई व दोहा में लिखा उसी को हम आपके बतायेगे।
यह ध्यान रहे की यह लीला है, लीला भगवान रचते है। जो कुछ भगवान करते है उसे लीला कहते है। और लीला में बुद्धि नहीं लगाते है। लीला क्या है तो एक शब्द में कहे तो झूठ। यह वास्तविकता नहीं। लेकिन ऐसा किसी समय हुआ है, यह सत्य है। लेकिन जो लीला में होता है वो वास्तविक बात नहीं है। भगवान हम लोगों के लिए लीला करते हैं। लीला के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़े लीला क्या है? लीला का मतलब? भगवान की लीला की वास्तविकता। शिवजी और सती जी का अगस्त्य ऋषि के पास जाना और कैलास गमन। तो बहुत समय पहले एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गए। उनके साथ जगज्जननी भवानी सती जी भी थीं। अगस्त्यजी ने संपूर्ण जगत्‌ के ईश्वर शिव जी का पूजन किया। फिर अगस्त्यजी ने राम कथा शिवजी और माँ सती को विस्तार से कही, जिसको महेश्वर ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने शिवजी से सुंदर हरिभक्ति पूछी और शिवजी ने उनको रहस्य सहित भक्ति का निरूपण किया। श्री रघुनाथजी के गुणों की कथाएँ कहते-सुनते कुछ दिनों तक शिवजी…