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गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है?

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❛गुरु मंत्र अथवा दीक्षा क्या होती है?❜ हमने इस लेख में जो ढोंगी बाबा गुरु मंत्र अथवा दीक्षा देते है उनका पहचान बताया और यह बताया की गुरु मंत्र अथवा दीक्षा को कोई अलौकिक शक्ति कहता है, तो कोई दिव्य आनंद और कोई दिव्य प्रेम आनंद कहता है। यदपि यह सब एक ही है। दीक्षा देना का मतलब अलौकिक शक्ति देना भी है, दिव्य प्रेम देना भी है और दिव्य आनंद देना भी है। अब एक प्रश्न है। दीक्षा कब मिलती है? जब हमारा अंतःकरण (मन) शुद्ध हो जाता है तब दीक्षा मिलती है। शुद्ध का मतलब संछेप में समझिये जब अंतःकरण (मन) एक भोले भाले बच्चे की तरह हो जाता है, वह बच्चा न तो किसी के बारे में बुरा सोचता है न तो किसी के बारे में अच्छा सोचता है, अर्थात संसार से उस बच्चे का मन ना तो राग (प्रेम) करता है और ना तो द्वेष (दुश्मनी) करता है। जब किसी वक्ति का अंतःकरण भगवान में मन लगाकर, इस अवस्था पर पहुँच जाता है। तब वास्तविक गुरु आपके अंतःकरण को दिव्य बनायेगा। तब वास्तविक गुरु अथवा संत अथवा महापुरुष आपको गुरु मंत्र या दीक्षा देता है। अब दीक्षा का समय आया है, जब अंतःकरण शुद्ध हो गया। इससे पहले दीक्षा नहीं दी जा सकती। क्योंकि हमारा…

राजा नृग का उद्धार कैसे हुआ?

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नृग का उद्धार की कथा भागवत १०.६४.१०-३० और १०.३७.१७ में है। राजा नृग प्राचीन काल के एक प्रतिष्ठा प्राप्त राजा थे, जो इक्ष्वाकु के पुत्र थे। राजा नृग अपनी दान के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। एक बार भूल से राजा नृग ने पहले दान की हुई गाय को फिर से दूसरे ब्राह्मण को दान दे दिया। लेकिन इसका ज्ञान राजा नृग को दान देते समय नहीं था, किंतु इसके फलस्वरूप ब्राह्मणों के शाप के कारण राजा नृग को गिरगिट होकर एक सहस्र वर्ष तक कुएँ में रहना पड़ा। अंत में कृष्ण अवतार के समय नृग का उद्धार हुआ। भागवत के अनुसार एक बार प्रद्युम्न, चारुभानु और गदा आदि यदुवंशी राजकुमार घूमने के लिये उद्यान (बगीचा) में गये। वहाँ बहुत देर तक खेल खेलते हुए उन्हें प्यास लगी। वे सब जगह जल की खोज करने लगे। वे एक कुएँ के पास गये। उसमें जल नहीं था परन्तु एक बड़ा विचित्र जीव था। वह जीव एक बहुत बड़ा गिरगिट था। उसे देखकर उनके आश्चर्य में पड़गए। राजकुमारों ने सोचा उसे बाहर निकालने का प्रयत्न करने लगे। लेकिन राजकुमार ने गिरे हुए गिरगिट को चमड़े और सूत की रस्सियों से बाँधकर बाहर न निकाल सके। तब जिज्ञासा के कारण उन्होंने यह गजब का कथन श्री कृष्ण…

यज्ञ करने की विधि में ६ शर्तें।

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वेदों में यज्ञ को प्रमुख धर्म बताया है। एक धर्मी को यज्ञ करना होता है। तो यज्ञ में छह शर्ते है। इन छह नियम को कोई पालन ठीक ठीक करें तो उसे यश, मान-सम्मान, कीर्ति धन की प्राप्ति होगी और मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा। धर्म / यज्ञ में छह शर्ते है। यज्ञ में छह नियम हैं। किस जगह यज्ञ हो। हर जगह यज्ञ नहीं हो सकता।किस समय यज्ञ हो। हर समय यज्ञ नहीं हो सकता। आज भद्रा है, आज का नक्षत्र गड़बड़ है। ये सब विचार कर के यज्ञ का सही समय का निर्णय होता है।कर्ता। मतलब जो यज्ञ करने वाला है उसको यह विश्वास पक्का हो कि हम जो आहुति डालेंगे तो इंद्र आएगा उस आहुति को लेने। हमारे भारत में एक को भी विश्वास नहीं है। पंडित जी ने कहा स्वाहा: बस। पंडित जी को विश्वास ही नहीं है।द्रब्य। द्रब्य (बर्तन, सामान आदि) भी सही-सही होना चाहिए। जिस द्रव्य (बर्तन) से यज्ञ होता है वो सही कमाई का हो। काले धंधे की कमाई का द्रव्य (बर्तन) नहीं होना चाहिए। जो वेद में वर्णाश्रम धर्म है उसके अनुसार पैसा कमा कर यज्ञ हो सकता है। जैसे ब्राह्मण भीख मांगकर पैसा जुटा सकता है। तो भीख में जो पैसे मिले उससे बर्तन लेकर यज्ञ हो।विधि। विधि भी सही हो। …

राजा निमि - श्राप से सम्बंधित एक कथा।

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निमि, मिथिला के प्रथम राजा थे। वे मनु के पौत्र तथा इक्ष्वाकु के पुत्र थे। संस्कृत में 'निमि' का अर्थ 'पलक' होता है। एक बार राम बोले - "हे लक्ष्मण! अब मैं तुम्हें श्राप से सम्बंधित एक कथा सुनाता हूँ। अपने ही पूर्वजों में निमि एक प्रतापी राजा थे। वे महात्मा इक्ष्वाकु के बारहवें पुत्र थे। उन्होंने वैजयन्त नामक एक नगर बसाया था। इस नगर को बसाकर उन्होंने एक भारी यज्ञ (कर्म-धर्म) का अनुष्ठान किया। पहले महर्षि वधिष्ठ को और फिर अत्रि, अंगिर, तथा भृगु को आमंत्रित किया। परन्तु वशिष्ठ का एक यज्ञ के लिए देवराज इन्द्र ने पहले ही बुला लिया था, इसलिये वे निमि से प्रतीक्षा करने के लिये कहकर इन्द्र का यज्ञ कराने चले गये। वशिष्ठ के जाने पर महर्षि गौतम ने यज्ञ को पूरा कराया। वशिष्ठ ने लौटकर जब देखा कि गौतम यज्ञ को पूरा कर रहे हैं तो उन्होंने क्रोध में आकर निमि से मिलने की इच्छा प्रकट की। जब दो घड़ी प्रतीक्षा करने पर भी निमि से भेंट न हो सकी तो उन्होंने श्राप दिया कि राजा निमि! तुमने मेरी अवहेलना (निरादर) करके दूसरे पुरोहित को बुलाया है, इसलिये तुम्हारा शरीर प्राणहीन होकर गिर जायेगा…

राजा नृग को कर्म-धर्म का फलस्वरूप गिरगिट बनना पड़ा।

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राजा नृग प्राचीन काल के एक प्रतिष्ठा प्राप्त राजा थे, जो इक्ष्वाकु के पुत्र थे। राजा नृग अपनी दान के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। राजा नृग १००० गाये रोज दान करते थे। एक दिन एक गाय, जिस ब्राह्मण को दान किया था उससे भाग करके फिर आगयी राजा के गौशाला में। अब जिसके यहाँ लाखों गाये है तो नौकर चाकर भी कितना पहचानेगा बिचारा। दूसरे दिन दूसरा ब्राह्मण आया उसको वही गाय देदी, क्योंकि राजा और नौकर-चाकर को पता नहीं था। अब वो जो पहला ब्राह्मण था जिसको दान किया था, वो अपनी गाय ढूढ़ता-ढूढ़ता उस ब्राह्मण के पास पहुंचा जिसको राजा ने दूसरे दिन दान दिया था। उनसे कहा "ये हमारी गाय है तुम चुरा कर लाये हो।" दूसरे ने कहा "क्या कह रहे हो, ये राजा ने दान किया है।" अब दोनों लड़ पड़े कि हमको दिया, हमको दिया है। दोनों ब्राह्मण गए राजा नृग के पास। राजा नृग समझ गए कि भूल से पहले दान की हुई गाय को फिर से दूसरे ब्राह्मण को दान दे दिया है। तो फिर राजा नृग ने क्षमा मांगा ब्राह्मण से "आप १०,००० गाये ले लीजिये इसके बदले में" लेकिन दोनों ब्राह्मण ने तय कर लिया कि ये मेरी नाक का सवाल है, मैं यह गाय नहीं…

वेद - कर्म-धर्म का पालन करने वाले घोर मूर्ख है।

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वेदों में यज्ञ को प्रमुख धर्म बताया है। तो हमने आपको बतया यज्ञ करने की विधि में ६ शर्तें। इस लेख में हमने ६ नियम को बताया लेकिन इनका पालन करना इतना कठिन है की कलुग में असम्भ सा है। फिर हमने आपको इस लेख में वेदों पुराणों द्वारा बताया वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है। क्योंकि उसका फल है स्वर्ग। इस बात को हमने आपको विस्तार पूर्वक प्रमाणों द्वारा बताया इस लेख में कि कर्म-धर्म का पालन करने का फल क्या है? इस लेख का सारांश यह है कि कर्म-धर्म का पालन करने वाले लोग स्वर्ग जाते है कुछ दिन के लिए उसके बाद निचे आते है तो कुत्ते बिल्ली गधे की निम्न योनि में या नर्क में डाल दिए जाते है। वेद कहता है, मुण्डकोपनिषद १.२.१० इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ अर्थात् ’इष्ट’ कर्म अग्निहोत्रादि पञ्चमहायज्ञ और अन्य श्रुति-विहित कर्मों को कहा जाता है मतलब धर्म। अस्पताल बनवाना, गरीबों को भोजन कराना, आदि स्मृति-विहित कर्म ’पूर्त’ कर्म कहाते हैं। तो इष्ट (धर्म) और पूर्त कर्मों को ही सबसे श्रेष्ठ मानते हुए, वि…

कर्म-धर्म का पालन करने का फल क्या है?

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वेद कहता है मुण्डकोपनिषद १.२.७ "कर्म-धर्म को कोई विधिवत भी पालन करेगा, तो उसका फल जो मिलेगा वो नश्वर (नाश होनेवाला) है।" जैसे एक बड़ा कमजोर पुल है, जिसके ऊपर पैर रखा और गिर गया और गया पाताल में। १८ प्रकार के यज्ञ होते है, सबका यही है, सब नश्वर (नाश होनेवाला) है। मुण्डकोपनिषद १.२.८ इस मंत्र का भवार्थ यह है कि "कर्म धर्म का पालन करने वाला ८४ लाख के शरीर में घूमता रहता है। न तो उसे मोछ मिलेगा, न भगवान मिलेंगे, न आनंद मिलेगा, न तो दुःख जायेगा।" मुण्डकोपनिषद १.२.९ "जो लोग अपने आप को बड़ा बुद्धिमान मानने वाले, जो कर्म-धर्म का पालन करते है ये कुछ के लिए नश्वर (नाश होनेवाला) स्वर्ग में जाते है फिर स्वर्ग से निचे गिरा दिए जाते है अर्थात् मृत्यु लोक या नर्क में भेज दिए जाते है।" जैसे एक प्रधान मंत्री ५ साल तक सत्ता में रहा फिर बाद में इलेक्शन में हार जाने से वो बिचारा एक कोने में चुचाप बैठा रहता है। अब उसको कोई नहीं पूछता। तो! यह तो काम से काम मनुष्य बना है, काम से काम रोटी दाल खा रहा है। लेकिन जब स्वर्ग वाले निचे आते है उसका क्या हल होता है? मुण्डकोपनिषद १.२.१० &qu…

वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है।

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वेद में जो विधि बताई गयी है। जो कर्म बताये गए हैं, ब्राह्मण को, क्षत्रिय को, वैश्य को और शूद्र को। और जो आश्रम है ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास ये वर्णाश्रम धर्म धर्म है। उसका ठीक ठीक विधिवत अगर कोई पालन करे तो वो धर्मात्मा, धर्मी कर्मी कहलायेंगे। कर्म धर्म का पालन करना बेकार है। क्यों? इसलिए क्योंकि कर्म-धर्म का पालन करने से स्वर्ग मिलता है। भागवत ९.५.२५ कहती है कि "नर्क है स्वर्ग, स्वर्ग और नर्क में कोई अंतर नहीं है। दोनों एक सा है। केवल देखने का अंतर है।" गीता ९.२१ कहती है कि "स्वर्ग में एक व्यक्ति तभी तक रहता है जबतक उसके पुण्य कर्म-धर्म ख़त्म नहीं हो जाते। पुण्य कर्म-धर्म ख़त्म होते ही कुत्ते बिल्ली आदि के शरीर में डाल दिए जाते है।" और सबसे बड़ी बात यह है कि स्वर्ग में सुख नहीं है, वहाँ भी माया का अधिपत्य (कब्ज़ा) है जैसे हमारे मृत्युलोक पर है। अधिक जानने के लिए पढ़े देवी-देवता और भगवान में क्या अंतर है?भागवत ६.३.२५ कहती है कि "जो वेद में कर्म-धर्म की मीठी मीठी बातें लिखी है कि इनका पालन करो तो स्वर्ग मिलेगा इनके चक्कर में मत आओ।" धर्म-कर्म क…

वेद, भागवत - धर्म अधर्म क्या है?

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धर्म का शाब्दिक अर्थ धर्म एक संस्कृत शब्द है। संस्कृत में (धातु) धा + ड (विशेषण) से इसका अर्थ है "धारण करना" अतएव जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़े धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है? धर्म अधर्म - वेद अनुसारभागवत ६.१.४० में लिखा है कि जो वेद में कहा गया है ये करो ये करो वो धर्म है और जो कहा गया कि ये न करो ये न करो उसका नाम अधर्म। जैसे वेद ने कहा तैत्तिरीयोपनिषत् १.११ "सत्यं वद । धर्मं चर ।" अर्थात् सत्य बोलों वर्णाश्रम धर्म का पालन करो - ये धर्म है। अधर्म क्या है? इसका उल्टा! झूठ न बोलो पापा मत करो। इसी को वेद में कहते है विधि और निषेध। विधि मने ये करो ये करो। निषेध मानें ये न करो। यही है धर्म और अधर्म। तो जो वेद में लिखा है! इसी का नाम धर्म अधर्म। ८०,००० कुल वेद की ऋचाएं है अर्थात् वेद मंत्र है धर्म अधर्म की। इनको पढ़ना समझना, इस कलयुग वाले मनुष्य की बुद्धि के लिए असंभव सा है। भागवत ११.२७.६ में भगवान कृष्ण उद्धव से कह रहे है कि "कर्म काण्ड (कर्म धर्म) का अंत नहीं है उद्धव।" भागवत ६.३.१९ वेदव्य…