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हर धर्म प्रेम सिखाता हैं। प्रेम क्या हैं?

प्रेम
"हर धर्म प्रेम सिखाता हैं" यह बात आप लोग ने बहुत बार सुना होगा और कहा भी होगा सबसे! लेकिन आप ने कभी भी ये सोचा की, ये बात सच है या नहीं? इससे पहले ये तो जान लो प्रमे क्या है, प्रेम की परिभाषा क्या है? अस्तु, नारद जी ने प्रेम की परिभाषा किया, उन्होंने कहाँ नारद भक्ति सूत्र ५१ "प्रेम का सुरुअप अनिर्बाचिनम है।" अर्थात प्रेम के पास शब्द नहीं जा सकता। वेद तैत्तिरीयोपनिषद २.४.१, २.९.१ "इंद्री मन बुद्धि उस प्रेम के पास नहीं जा सकती।" तुलसीदस जी कहते है "कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।" अर्थात जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, ऐसा कुछ प्रेम होता है। इस बात को इस प्रकार समझो, एक आम का कीड़ा से एक नीम का कीड़ा पूछता है की "भाई! ये मीठा किस होता है ।
आम का कीड़ा "तुमने कभी रसगुल्ला, आम खाया है क्या?" नीम का कीड़ा "नहीं मैं तो नीम का कीड़ा हूँ, नीम के सिवा मैंने कुछ खाया ही नहीं अपनी जिंदगी में।" आम का कीड़ा "तो फिर तुम नहीं समझ सकते की मीठा क्या हैं"
"जो अपने सुख के लिए हो वो प्रेम नहीं" एक छोटी सी परिभाषा। वेद कहता है, "इस संसार में कोई भी किसी के सुख के लिए कर्म नहीं कर सकता, सोच नहीं सकता।" बृहदारण्यकोपनिषद् ४.५ "अरे, यह निश्चय है कि पति की प्रीति के -पति-सुख के मतलब के लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजन के लिये पति प्रिय होता है; स्त्री के मतलब के लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही मतलब के लिये स्त्री प्रिया हुआ करती है।" इसी प्रकार पुत्र, वित्त, पशु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, आदि सभी कुछ उनके मतलब के लिये नहीं, अपने मतलब के लिये-अपने सुख के लिये ही प्रिय हुआ करते हैं। वस्तुतः जगत में हमारा व्यवहार-व्यापार, आकर्षण, प्रेम, स्नेह, सेवा-सभी कुछ आत्मसुखकामना, सीमित स्वार्थपरता, आत्मेन्द्रिय-सुखेच्छा से ही प्रेरित होते हैं।

अतएव यह बात तो पाकी की कोई किसी के सुख के लिए कर्म नहीं करता क्यों की वेद किहता है। वेद के बात को कुछ इस प्रकार समझने की कोशिश करो। हर व्यक्ति की एक ❛कामना❜ है, वो ❛कामना❜ जब तक कोई व्यक्ति पूरा करता है, तब तक हम उसके साथ रहते हैं। या यू कहे कि जब तक अपना सुख मिलता है, उस व्यक्ति से तो तब तक उस व्यक्ति के पास रहना चाहते है। जब सुख नहीं मिलता तो भाड़ में गई माँ , बाप , बेटा, बेटी, पत्नी, दोस्त, आदि। या यू कहे कि जब तक अपना स्वार्थ सिद्ध होता हैं उस व्यक्ति से, तो तब तक उस व्यक्ति के पास रहना चाहते हैं। जैसे, संसार में एक पुत्र अगर सही-सही आचरण नहीं करता पिता के प्रति, तो पिता उसे घर से निकल देता है। अतएव जब स्वार्थी सिद्ध नहीं हूँआ तो भाड़ में गई माँ , बाप , बेटा, बेटी, पत्नी, दोस्त, आदि। संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसे व्यक्ति के साथ रहना नहीं पसंद करता जो उसे दुःख देता हो। वह केवल ऐसे ही व्यक्ति के साथ रहना पसंद करता है जो उसे सुख देता हो।
माँ! बाप! आप लोग सोचते हैं कि "ये स्वार्थी नहीं है" परन्तु ऐसा नहीं हैं। जब तक आप माँ बाप के अनुसार आप चलते गये तब तक उनका स्वार्थी सिद्ध होता हैं। कैसा स्वार्थ? उन्होंने अपने आप को शरीर मन लिया हैं। इसलिए वो मान-सम्मान, पैसा, इज्जत यह सारी बातें मान रखा है। अगर आप इनमे से एक भी काम नहीं कर पाए तो, उनका स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा, तो आप उनके लिए नालायक हो जायेंगे। जैसे एक बेटा बाबा या संत या कोई भी ऐसा कार्य जिसके लिए माँ बाप को छोड़ना अथवा त्यागना पड़े तो वो(माँ बाप) नहीं त्यागने देंगे।क्योंकी उन्होंने अपना स्वार्थ आपमें मान रखा हैं। आप चले जाये गए तो उनका स्वार्थ सिद्ध कैसे होगा। ठीक इसी प्रकार हम भी माँ बाप दोस्त आदि से ऐसे ही स्वार्थी सिद्धि करते है।
अतएव, हम लोग अपने माँ से बाप से बेटे से बेटी से पति से प्यार करते है ये सब अज्ञान के कारण है। ये सब स्वार्थ सिद्धि का खेल हैं। सब अपने स्वार्थ सिद्ध करना चाहते है। इसलिए आप से प्यार करने का नाटक करते हैं। चाहे वहाँ आपकी प्रेमिका, प्रेमी, माँ, बाप, बेटा, बेटी, पत्नी, दोस्त, आदि की क्यों न हो।
तो "हर धर्म प्रेम सिखाता है." लेकिन! उस पतित पवन, नित्य निरंजन,जग सुख कारण, सत्य सनातन से।ध्यान दो "से" प्रेम करने को सिखाता है। वेदों पुराणों में शरीफ उस सच्चिदानंद से ही एकमात्र प्रेम करने को कहाँ गया है। संसार में शरीफ "ड्यूटी" कर्तव्य निभाने को कहा है, और कर्तव्य (ड्यूटी) कैसे करे? हम कर्तव्य (ड्यूटी) ऐसे करे की ❛नामापराध❜ न हो। ❛नामापराध❜ मतलब न प्रेम हो न तो खार व द्वेष हो। यह ध्यान रहे की इस संसार में "किसी भी वस्तु, जीव, इंसान, कर्म से" न तो प्रेम हो न तो खार व द्वेष हो।

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