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आनंद क्या है, हम आनंद क्यों चाहते हैं?

आनंद तत्व
आनंद तत्व क्या हैं इस पर प्रकाश डालना है। क्यों? ये आनंद क्या है। अनंत जन्म बीत गए और हम लोगो ने येभी नहीं समझा, आनंद है क्या? किन्तु हम आनद चाहते हैं। पशु पक्षी कीट पतंग से लेकर देवता तक, सब आनंद चाहते हैं। केवल आनंद चाहते हैं। इस संसार में किसी दो व्यक्ति की शक्ल नहीं मिलती, अंगूठा निशानी नहीं मिलता, संसार में इतना वैषम्य हैं, किन्तु सब आनंद ही क्यों चाहते है? आचार्य हैं! किसी ने क्या पाठ पढ़ाया हैं क्या? माँ बाप ने! या किसी और ने "बेटा आनंद ही चाहा करो! दुखः न चाहा करो।" नहीं! किसी ने नहीं बताया-सिखाया।हम स्वाभाविक आनंद चाहते हैं। हम जब संसार में आये। माँ के पेट से बाहर! तो रोये। क्यों रोये? हमने आनंद मांग। हमें जो पैदा होने में, जो कष्ट हुआ, उसे हम नहीं चाहते। हम रोकर उस दुखः को निकल रहे थे। विस्तार पूर्वक जानने के लिए पढ़े ❛सभी व्यक्ति अपने सभी कार्य से आनंद ही चाहता हैं।❜
ये क्या! संसार में आते ही दुखः, और सरे जीवन रोते रहे। बहुत कुछ किया हमने M.A. किया B.A. किया ये किया वो किया, नोकरी मिली, बड़ी बड़ी पोस्ट मिली, PM तक बन गए, लेकिन हालात ख़राब। वहीं दुःख वहीं अशांति वहीं अतृप्ति एक सा। ये आनद क्या है! हमे यह सोचने का समय नहीं हैं, क्योंकि हम व्यस्त आदमी हैं। अरे किस लिए व्यस्त हो तुम? आनंद पाने के लिए। तो पहले समझ लो आनंद कहाँ है। तो हम लोग कहते है "हमें को सब मालुम्म है! सब इधर भाग रहे है, संसार की ओर।" हम लोग ये मानते है की १ लॅक में आनंद १० लॅक में आनंद १ करोड़ में आनंद है, एक अरब में आनंद है। बिल गेट्स बनजाये तो आनंद मिलजाए, मुकेश अम्बानी बन जाये तो आनंद मिलजाए। अरे जरा उनसे पूछ लो भाई! ये जितने खरबपति है, उनको आनंद मिला क्या? वो कहते है "अरे साहब गोली खाके नींद आती है यही आनंद है हमारा" बड़ा तनाव है, उनको(अर्थात बड़े आदमी को) अधिक है। जिसके आस-पास इतने अंगरक्षक हैं, वो चाहे सोने पे पलंग पे भी सोयेंगे, तोभी वो अशांत ही रहे गए। हम आनंद चाहते हैं। इस का कारण केवल हमारे वेदों ने बतया।

तैत्तिरीय उपनिषद्(३.६.१) आनंद भगवान है। भगवान में आनंद है, ऐसा बोला जाता है, किन्तु वास्तव में, आनंद ही भगवन है। आनंद भगवान का पर्यायवाची शब्द है। अर्थात कोई एक ब्रह्म है। वेद कहता है, श्वेताश्वतर उपनिषद् (१.१२) तीन तत्व है। अनादि अनंत शाश्वत। एक ब्रह्म, एक जीव, एक माया। चौथा कोई तत्व न था न है न होगा। तो ये आनंद तत्व कहाँ से आगया। वो जो ब्रह्म: उसी का पर्यायवाची है आनंद। तो हम सब जीव है और एक भगवान परमात्मा और एक माया है। गीता (१५.७), भागवत (१०.८७.२०) ये सब कहते है तीन तत्व है, जीव माया के आधीन है और जीव! भगवान का अंश है। रामचरितमानस " ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि" सब सस्त्र वेद कहते है, ये जीव भगवान का अंश है। तो? अंश अपने अंशी को ही चाहता है, चाहे गया स्वाभाविक। और कुछ चाहहि नहीं सकता। तो भगवान के अंश होने के कारण हम भगवान को ही चाहते है अर्थात विष में कोई नाश्तिक होही नहीं सकता क्यों, की सभी जीव भगवान के अंश है और अंश अपने अंशी को ही चाहेगा। तो सब जीव भगवान को ही चाहते है। हम आनंद क्यों चाहते हैं इस विवाद का हल वेदों ने बतया है, और कोई संसार का धार्मिक ग्रन्थ नहीं बताता हैं।
अस्तु, वलिमिकी जी ने कहाँ "संसार में ऐसा कोई प्राणी हो नहीं सकता जो राम का भक्त न हो।" तो क्योंजी संसार में नास्तिक लोग हैं वोतो राम गाली देते हैं। हाँ, वो गाली देते है भोलेपन में। जैसे एक भाई दूसरे भाई को, माँकी गाली देता है भोलेपन में। दोने की माँ एक है, और फिरभी भाई-भाई माँ की गाली दे रहा है। अर्थात भगवान और आनंद पर्यायवाची शब्द है। हम भगवान के अंश है ये वेद बोल रहा है, तो हम आनंद के अंश हुए, इसलिए आनंद चाहते है क्योंकि हम आनंद रूपी भगवान के अंश हैं।
अवश्य पढ़े ❛आनंद ही भगवान है, आनंद की परिभाषा?❜ और ❛अगर भगवान आनंद है, तो हम संसार में आनंद क्यों मानने लगे?❜

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