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धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है?

परधर्म व अपरधर्म क्या है?
धर्म का अर्थ होता है "धारण करना" या "धारण करने योग" वेदों में दो प्रकार के धर्मों का वर्णन हैं , १.परधर्म २.अपरधर्म। अपरधर्म अर्थात "वर्णाश्रम धर्म" वर्णा माने, "ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र", और आश्रम अर्थात, "ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास यह चार आश्रम हैं।" जैसे ब्राह्मण क्या करे क्या ना करे, उसके बारे में वेदों में बहुत कुछ विस्तार से लिखा है, जैसे ब्राह्मण ब्रह्मचर्य में क्या करे क्या ना करे, फिर गृहस्थ में क्या करे क्या न करे, वानप्रस्थ और संन्यास में क्या करे क्या न करे, वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए भी लिखा हैं। वेदों में वर्णाश्रम धर्म का बड़ालंबा -चौड़ा उलेख है, अगर इस जन्म में कोई पढ़े और पालन करे, तो वो असंभव बात है।
परधर्म का अर्थ संक्षेप में होता है भगवान (श्री कृष्ण, राम, संकर आदि) की भक्ति। लेकिन परधर्म में कामना नहीं होती, यानि "हेतु के बिना" अर्थात अहेतुकी जो भक्ति होती है, वो परधर्म है। तोपरधर्म मतलब भगवान(श्री कृष्ण, राम, संकर आदि) उनका नाम, उनका रूप, उनकी लीला, उनके गुण,उनके धाम, उनके संत इतने में मन का लगाव हो तो वो परधर्म कहलाता है। धर्म का विभाजन किया जाये तो कुल ४ धर्म होते हैं। इस चार धर्म के अन्तर्गत विश्व के सभी धर्म है।
१. तामस धर्म
२. राजस धर्म
३, सत्तव धर्म
४. परधर्म (आध्यातिमक धर्म )
सत्तव, राजस, तमस ये तीनो माया के गुण हैं। इसलिए इन तीनो माया के गुण को एक करके माइक धर्म कहते हैं और इन्हें ही अपरधर्म व वर्णाश्रमधर्म भी कहते हैं। इन्ही के अलग-अलग विभाजन से अनेक नाम हो गए है। जैसे अपरधर्म, शारीरिक धर्म, और माइक धर्म। तो अपरधर्म शारीरिक धर्म होता है, इस शरीर को क्या धारण चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये ये इनमे उलेख हैं। और इस शरीरी अर्थात आत्मा को क्या धारण करना चाहिये वो परधर्म या आध्यात्मिक धर्म। और धारण कौन करता हैं? धारण करने वाला केवल मन हैं। तो मन में धारण करना है, चाहे उन तीनो धर्म को धारण करो या फिर परधर्म को धारण करो। धारण करने का मतलब मन का लगाव (आसक्ति)
तो किस धर्म से कौन सा फल मिलेगा? इस प्रश्न (प्रशन) का भी उत्तर समझ लेते हैं। मन का लगाव (आसक्ति) अगर तमो गुणी व्यक्ति या वस्तु में हो तो तमो गुणी फल मिलेगा, मरने के बाद आसुरी योनि में जायेंगे। और अगर मन का लगाव राजो गुणी व्यक्ति या वस्तु में हो तो राजो गुणी फल मिलेगा, मरने के बाद मृतुलोकमें जायेंगे। और अगर मन का लगाव सात्विक देवता या वस्तु में होगा, तो मरने के बाद स्वर्ग जायेंगे। तो तमो गुणी व्यक्ति में मन का लगाव हो, अब वो व्यक्ति चाहे आपका पिता हो माँ हो बहन हो पति होया कोई हों, तो आपको उसका तमो गुणी फल मिलेगा। तो मन का जिस व्यक्ति वस्तु में लगाव हो, और वो व्यक्ति वस्तु उस गुण का होगा मारने के बाद उसीको प्राप्त हो जाओगे। यानि कि आपको उस गुण का फल मिल जायेगा। वो कुत्ता बनेगा तो तुम कुते के बच्चे बनोगे। गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते है, "जो संसार की भक्ति करेगा वो संसार को प्राप्त होगा, जो देवताओ की भक्ति करे गया वो देवताओ को प्राप्त होगा और जो मुझसे भक्ति करेगा वो मुझको प्राप्त होगा।"
तो धारण करने वाला मन है, और धारण करने की दो वस्तु है, ❛माया❜ और भगवान। अगर कोई कहे, की"हम भगवान को भी नहीं धारण करेगे और न माया को" तो तुम भोले हो। तुम्हे दोनों मेसे एक को धारण करना पड़े गया और उनमे से तुमने माया को तो धारण किया हुआ ही है। माया से तुम अलग नहीं हो सकते जब तक भगवान को नहीं धारण अर्थत मिल नहींलेते।
तो वर्णाश्रम धर्म या अपरधर्म परिवर्तन शील हैं। जैस ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थ, के बाद वानप्रस्थ और वानप्रस्थ के बाद संन्यास। ये बदलते जाते है न। परन्तु, परधर्म परिवर्तन शील नहीं हैं, क्योंकि परधर्म का पालन ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास यह चारो आश्रमों में करना हैं। अवश्य पढ़े ❛सुख की श्रेणी, माया जगत में सबसे बड़ा सुख क्या है?❜ अवश्य पढ़े ❛देवी-देवता और भगवान में क्या अंतर है?❜

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