× Subscribe! to our YouTube channel

कर्म किसे कहते हैं? कर्म, क्रिया और कार्य में क्या भेद हैं?

कर्म क्या है,
यहाँ संसारी कर्म की बात हो रही हैं। भगवान श्री कृष्ण ने कर्म के बारे में गीता में कहाँ था, गीता ८.७ मेरा स्मरण कर, और युद्ध कर। मतलब, अगर मन युद्ध में नहीं आसक्त (इस लेख में विस्तार पूर्वक आसक्ति के बारे में लिखा है) है। यानि राग और द्वेष से रहित है, तो वो कर्म का फल नहीं मिलेगा क्योंकि वो कर्म ही नही है। जब किसी भी कर्म में हमारा राग और द्वेष नहीं होता तो वो अभिनय कहलाता हैं। मंशा से युक्त जो कर्म होता हैं, अच्छी मंशा या बुरी मंशा या किसी भावना से युक्त कर्म को कर्म कहते हैं। संक्षेप में! कहा जाये तो "मंशा या भावनासे युक्त कर्म को कर्म कहते हैं।"
जैसे, साला-जीजा आपसमे अब्शब्द बोलते रहते हैं, कोई बुरा नहीं मानता। क्योंकि वो जानरहे है कि इसमें मन की मंशा नहीं हैं। मन युक्त है, लेकिन आसक्त नहीं हैं। युक्त होना अलग बात और आसक्त होना अलग बात। जैसे आप को आपकी पत्नी खाना बनके देती हैं, माँ देती है, बहन देती है तो वो खाना बनाते समय ये सोचती है की "मेरा भैया खायेगा, मेरा बेटा खायेगा बढ़िया(अच्छा) खाना बनाओ।" यहाँ पर माँ की, बहन की आसक्ति हैं, आप में। नोकर से आप खाना बनवाते है, वोभी बना बनाता है लेकिन डर-डर से। नोकर सोचता है, "खाना अच्छा होना चाहिए नहीं तो मालिक नोकरी से निकाल देगा।" तो जब माँ-बहन ने खाना बनाया तो वहाँ राग, मंशा और भावना ये तीनो थे इस ये भी कर्म हैं और जब नोकर खाना बनाया तो वहाँ भी मंशा और भावना थी, इसलिए ये भी कर्म हैं। आसक्ति हो यानि राग हो और द्वेष हो, ये दोनों में एक हो तो उसी को कर्म कहते है।
तो कर्म किसे नहीं कहते हैं? इसका सबसे अच्छा उदाहरण वो लोग हैं जो मंदिर में जाते हैं चारो धाम जाते हैं, और पूजा करते है, श्लोक पढ़ते है, "त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव॥" लेकिन सिर्फ मंत पढ़ते है, मानते नहीं। आप लोग सोच रहे होंगे कि हम तो मानते हैं। तो फिर मेरा एक प्रश्न(सवाल) है आपसे। ये श्लोक का अर्थ यह है की "तुम ही मेरे माता हो, ही पिता, तुम ही मेरे साख और तुम ही सब कुछ हो मेरा" इस श्लोक का ये अर्थ हैं। तो अब जरा सोचो! अगर भगवान "ही" माता पिता है, तो ये जो तुम्हारे माता पिता हैं संसार के, ये कौन है? "ही" का अर्थ होता है "केवल" और केवल का अर्थ "तुम्हारे सिवा कोई और नहीं।"

अस्तु, मंदिर में इंद्रियों से कर्म करते है हम लोग, और भगवान् मन से किया हुआ कर्म लिखते है। ये जितने भी लोग मंदिर में जाकर सर झुकाते हैं। क्या वो लोग मानते हैं, की इस मूर्ति में भगवान १००% है? नहीं मानते, मूर्ति देखा! की सर झुकालो।
मन से किया हुआ ही कर्म, भगवान् क्यों मानते है? ये प्रश्न आप कर सकते। तो इसका जबाब ये है, की अगर भगवान् इन्द्रियों के कर्म का हिसाब रखते। तो जितने लोग आंधे हैं सूरदास की तरह, जितने लोग चल नहीं सकते, जितने लोग सुन नहीं सकते। तो जो लोग इंद्रियों से रहित है, वो लोग कहेगे "हमें भगवत प्राप्ति मुफत में कराओ, क्योंकि हम चारो धाम की यार्ता कैसे करे, कैसे उन चारो धाम में स्थित मंदिर के दर्शन करे" ये सारे प्रश्न वो करेगे। इसलिए मन से किया गया कर्म, भगवान् लिखा करते हैं।
तो कर्म आप लोग समझ गए होंगे। लेकिन! कार्य क्या होता है? कार्य जैसे "राम खाना खा रहा है।" तो खाना-खाना कार्य हुआ। तो अब एक और प्रश्न उठता है क्रिया क्या होती है? : "जिस शब्द से किसी कार्य का होना या करना समझा जाय, उसे क्रिया कहते हैं।" अर्थात राम के खाना खाने की हरकत को हम जिस शब्द का प्रयोग करके हम उसके हरकत को दर्शायेगे वो क्रिया हैं। अर्थात "राम खाना खा रहा है।" इसमें खाना शब्द क्रिया हैं। तो आप लोग भली-भाति समझ गए होगे की कर्म, क्रिया और कार्य में कितना भेद है।
तो कर्म किसे नहीं कहते हैं? संसार से आप उदासीन हो जाओ, क्योंकि उदासीन में हमको उसचीज से न आसक्ति होती है न राग और न द्वेष होता हैं।

You Might Also Like

सबसे बड़े भगवान कौन है, राम कृष्ण शंकर या विष्णु?

क्या राम और कृष्ण एक ही हैं?

राजा नृग को कर्म-धर्म का फलस्वरूप गिरगिट बनना पड़ा।

गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है?

धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है?

कर्म-धर्म का पालन करने का फल क्या है?

वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है।

वेद, भागवत - धर्म अधर्म क्या है?