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अगर भगवान अकर्मा हैं, तो फिर अवतार लेकर दुष्ट का संहार कैसे करता है?

श्री कृष्ण
भागवत ३.४.१६ "श्री कृष्ण को कोई इच्छा नहीं है।" इच्छा तो उसको होती है जिसको कोई न्यूनता(कमी) हो।" जैसे हम लोग को ज्ञान, पैसा की कमी है। तो भगवन को कोई इच्छा नहीं है ये सही हैं और इस बात को सिद्ध करता है वेद बृहदारण्यकोपनिषद् ५.१.१ पूर्ण से पूर्ण निकालो ऐसा ब्रह्म है। लेकिन फिर कर्म क्यों करते है? ये प्रशन उठता है। और हम जानते है की बिना इच्छा के कर्म हो ही नहीं सकता। अगर कोई कर्म करता है तो इच्छा हुई तभी तो कर्म किया। बैठे-बैठे थक गया है कोई, खड़ा हो गया। आप क्यों खड़े हुई? क्यों सो गए? क्यों हँसे? क्यों रोए? क्यों खाये? क्यों बोले? हर जगह प्रशन होगा, और जबाब मिलेगा इच्छा हुई। तब कर्म हुआ है।
भगवान की तो इच्छा नहीं तो फिर क्यों कर्म करते? और छोटे-मोठे कर्म नहीं "अनंत कोटि ब्रम्हांड को बनाना, उसमे व्यापक होना, हर एक जीव के अंदर एक ही रूप से बैठना, उसके अनंत जन्मो के कर्मों का हिसाब-किताब रखना। प्रत्यके जीव के इंद्रिय मन बुद्धि में शक्ति देते रहना, उसको कर्म का फल देना, उसके वर्तमान कर्मों को लिखना, इतने सारे काम करते है और फिर अवतार लेना राक्षस का वध करना। और १६ हज़ार १०८ ब्याह करना, और एक-एक स्री के १०-१० बच्चे करना, और सबको मरवा देना।" इतने सरे काम कोई कर सकता हैं, विश्व में? और भागवत १०.४६.३८ अजन्मा कहलाता है, क्योंकि जन्म कर्म से होता हैं। जब किसी के पूर्व जन्म के कर्म होते है, तो उस कर्म को भोगने केलिए जन्म होता है।
भगवान तो न्यायाधीश है, उनको तो न कर्म करना है और न फल भोगना है। फिर भी नन्द कुमार बनते है, दशरथ नंदन बनते हैं। और तो और वेद कहता है! भगवान ने तपस्या किया, सोचा ऐतरेयोपनिषद् १.३.११ 'स ईक्षत', प्रश्नोपनिषद् ६.६.३ 'स ईक्षांचक्रे', तैत्तिरीयोपनिषद २.६.३ सोऽकामयत्' : भगवान ने सोचा ऐसा हो जाये और हो गया। तो कोई कर्म किसी चीज को पाने केलिए की जाती है। तो देखो! भगवान करता नहीं है, लेकिन हमें लगता है की वो करता हैं। ये दो विरोधी बात, हमको इसलिए समझ नहीं आती क्योंकि हम तर्क करते है और वेद कहता है ,कठोपनिषद १.२.९ और वेदांत २.१.११ तर्क नहीं चलता भगवान के यहाँ। भागवत १०.१४ गोचारण लीला में श्री कृष्ण गाय चराने गएथे। नारद जीने बोला था ब्रह्मा जी को, की भगवान आये है संसार में। तो ब्रह्मा ने बोला की मुझे पता होता अगर कोई आया होता तो। लेकिन नारद जी ने बोला था इसलिए ब्रह्मा जी ने सोचा चलके देखते है। तो एक दिन कृष्ण ग्वाल-बाल के साथ कलेवा करने लगे, कोई हस रहा है, कोई ठिठोली कर रहा हैं, जैसे छोटे-छोटे गाँव के किया करते हैं। और ग्वाल-बाल का जूठन खातेजा रहेथे। उसी समय ब्रह्मा आये। तब ब्रह्मा ने सोचा "ये भगवान है? मैं जनता हूँ वेद पहले मैंने पढ़ा है", तो वो सब ग्वाल-बालों को वहाँ से लेगये। तो देखो जब ब्रह्मा को भ्रम हो गया तो हम लोग क्या है उनके सामने।
हाँ तो अब निष्कर्ष सुनो, "जो व्यक्ति परिपूर्ण होता है , तब वो जो भी कर्म करता है, वो दुसरो केलिए ही करता है।" जैसे तुलसीदास, मीरा और महात्मा लोग, ये लोग जब भगवतप्राप्ति कर लेते है तब ये परिपूर्ण हो जाते हैं। अब ये जोभी कर्म करते है, जान कल्याण केलिए करते है। देखो कर्म जो हम आपने लिए करते है, ध्यान दो "आपने लिए" वो कर्म होता है, जो दुसरो के लिया कर्म किया जाता है, वो परोपकार, कल्याण, कृपा आदि कहा जाता है। क्योंकि हम कोईभी कर्म करते है वो अपने आनंद के हेतु ही करते है और जो महापुरुष भगवान कर्म करते है वो दुसरो के कल्याण केलिए ही करते है। उनकेलिए कर्म शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि कर्म मतलब एक्शन नहीं होता, एक्शन मतलब क्रिया होता है। और क्रिया और कर्म में बहुत भेद है। कर्म के बारे में और जानना है तो इस लेख को पढे. कर्म किसे कहते है?

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