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आनंद ही भगवान है, आनंद की परिभाषा?

आनंद! यह एक ऐसी चीज है, जिसे एक चींटी से लेकर देवता तक चाहते हैं। अनंत जन्म हमारे हो गए है, पर हमने अबतक आनंद नहीं मिला। हमने संसार में माँ बनाया, पिता बनाया, पति बनाया, पत्नी बनाया, अरब पति बन गए, परंतु! उस आनंद को पाने की इच्छा सदा बानी रही। उसी माँ, पति, पिता, बेटा को आज गले लगाया परंतु फिर कल उसको गले लगाने की इच्छा हुई। आज रसगुल्ला खाया और कल फिर खाने की इच्छा हुई। अर्थात हम आनंद ऐसा चाहते है जो कभी ख़त्म न हो अर्थात सदा रहे। इसका मतलब आनंद कुछ ऐसी वस्तु है, जो इन व्यक्ति और वस्तु में नहीं अथवा माया जगत में नहीं हैं।
तो आनंद क्या है? इस बात को केवल हमारे वेदों ने बतया। तैत्तिरीयोपनिषद ३.६.१ : आनंद ही भगवान है। अधिक जानकारी के लिए पढ़े आनंद क्या है हम आनंद क्यों चाहते हैं? अगर आपने आनंद क्या है हम आनंद क्यों चाहते हैं? पढ़ लिया है तो ही आपको आगे की बातें समझ में आएगी।
अस्तु, आनंद ही भगवान है यह बात आपको आनंद क्या है हम आनंद क्यों चाहते हैं? पढ़ कर बोध हो गया होगा, तो वो आनंद कैसा है? उस आनंद की परिभाषा (अर्थ) क्या है? यह प्रश्न केवल शेष है।
छान्दोग्योपनिषद् ७.३२.१ "जो अनंत मात्रा का हो और सदा केलिए हो" ये मंत के अर्थ को समझने की कोशिश कीजिये सबकुछ इस मन्त्र से ही समझ में आजायेगा। जो अनंत मात्रा का हो। अर्थात हम लोग जो आनंद चाहते हैं. वो अनंत मात्रा का चाहते हैं। तभी तो हम लोग को माँ, पति, पिता, बेटा को आज गले लगते है और फिर कल उसको गले लगाने की इच्छा हुई। आज रसगुल्ला खाया और कल फिर खाने की इच्छा हुई। ये सब इसलिए होता है क्योंकि आनंद उस में है नहीं हम उस व्यक्ति वस्तु के प्रति अपनी कामना बनाते हैं, और जब पूर्ति होती है तो ख़ुशी मिलती हैं, परंतु ज्यादा देर के लिए इसलिए नहीं ख़ुशी मिलती क्योंकि वो हमारी कामना की पूर्त्ति थी और आनंद का कामना के साथ कुछ लेना देना है ही नही। क्योंकि हमारी कामना पूर्ति हो गयी तो उस कामना की पूर्ति में हम जश्न मानते हैं। जैसे एक व्यक्ति की नोकरी नहीं लग रही है, वो बहुत मेहनत करता है, और फिर तब जाके नोकरी लगती है, तो वह व्यक्ति अपनी मेहनत और कामना की जब पूर्ति हो गयी तब वह व्यक्ति उस मेहनत और कामना की पूर्ति में हर्षित महसूस करता है। परंतु अधिक समय तक नहीं, जब तक उस व्यक्ति को अहसास होगा की हमने कितनी मेहनत की है, कितनी मुश्किल से जो में चाहता था वो मिला है। तब तक वह व्यक्ति हर्षित महसूस करे गया। जिस दिन वो व्यक्ति यह बात भूल जायेगा, उस दिन आनंद समाप्त हो जायेगा।
आनंद तो भगवान है, आनंद भगवांन का नाम है उनका तुम्हारे कामना की पूर्ति से क्या लेना देना। भगवान का रूप अनंत, लीला अनंत, गुण अनंत हैं। अस्तु, भगवान की कोई चीज सिमित नहीं हैं और हमारे पास जो भी चीज है वह सिमित है।
आनंद सदा केलिए हो: भगवान एक बार किसी भक्त को मिल जाया करते है तो फिर उससे अलग नहीं होते। संसार में हम किसी से प्यार करे (माँ, पति, पिता, बेटा आदि) तो इनका साथ अनित्य है। एक दिन हमे छोड़ के चले जायेगे। गीता ९.३१ "मेरे भक्तो का पतन नहीं होता क्योंकि मैं उनकी रक्षा करता हूँ।" तो जब भगवान मिल गए और उनका साथ मिलगया और उन्होंने कहा की उनका पतन नहीं हो सकता। तो एक बार भगवान की प्राप्ति हो जाने पर दुःख कभी नहीं मिलसकता क्योंकि दुःख का कारण अज्ञान, और भगवान जैसे ज्ञानी मिलने के बाद अज्ञान आ ही नहीं सकता।

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