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मनुष्य का क्या कर्तव्य है, क्या करें और क्या नहीं करें है?

मनुष्य का कर्तव्य
परीक्षित ने शुकदेव परमहंस से प्रश्न किया, भागवत १.१९.३८ : "मनुष्य का क्या कर्तव्य है? किसका स्मरण करें, किसका भजन करें, किसका कीर्तन करें, किसका त्याग करना चाहिए? क्या सुने, क्या सोचे?" तो शुकदेव परमहंस ने उत्तर दिया, भागवत २.१.५ "भरत(परीक्षित) सुन, भगवान का श्रवण(लीला, गुण आदि का श्रवण), कीर्तन और स्मरण(भगवान का ध्यान) ये मनुष्य का कर्तव्य हैं।" और चौथा कुछ नहीं है, नवधा भक्ति भी है, एकादशधा भक्ति भी है और अनेक प्रकार की भक्ति हैं। लेकिन शुकदेव परमहंस कहते है केवल ये तीनो करो "श्रवण, स्मरण और कीर्तन" इससे जल्दी लक्ष्य प्राप्त होगा। क्या लक्ष्य! भगवत प्राप्ति और उनकी सेवा। परीक्षित की मृत्यु में केवल एक सप्ताह ही बाकी था।
अस्तु, तो श्रवण के लिए भगवत विषय किससे सुने? भगवत विषय महापुरुष से सुनना चाहिए, और वो महापुरुष श्रोत्रिय-ब्रह्म निष्ठ हो! अर्थात, शास्त्र-वेद का ज्ञाता और भगवान का दिव्य प्रेम मिला हो या कहो, दर्शन किया हो। अस्तु, शुकदेव परमहंस ने केवल ये तीनो का उपयोग बतया "श्रवण, स्मरण और कीर्तन" ये श्रवण, स्मरण और कीर्तन भजन किसके लिए हैं? ये सबके लिए हैं। शुकदेव परमहंस फिर कहते है, भागवत २.१.११ "परीक्षित! जो सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं, जो भौतिक या मोक्ष की कामना करते हैं, और जो योगी लोग सिद्ध हो गए हैं उनके लिए भी यही तीन साधना हैं।" ज्ञानी और योगी को मोक्ष मिलेगा नहीं, बिना भक्ति के। ये पृथ्वी जल ताजे वायु आकाश और अहंकार को तो ज्ञानीजन पार कर लेते हैं। लेकिन उसके आगे प्रकृति उसको पार नहीं कर पाते इसलिए उन्हें भक्ति करनी पड़ती हैं। अगर राम, श्याम की भक्ति नहीं किये तो कोई भी हो विश्व में हो, वो माया को जीत नहीं सकता। तो भगवान की भक्ति करनी पड़ेगी। क्या भक्ति वही जो शुकदेव परमहंस न कहा "श्रवण, स्मरण और कीर्तन"
शुकदेव परमहंस ने कहा था मुझे देख, जो मैं शुकदेव परमहंस आत्माराम निष्काम परमहंस समाधि में था, मैं भी! एक श्लोक सुनकर अपनी निर्विकल्प समाधि को छोड़कर और भक्ति के मार्ग पर चल पड़ा. ये श्रोताभ्य(श्रवण) का परिणाम था! वह श्लोक था भागवत १.७.१० : "जिस पूतना में अपने स्तनों में जहर लगा के कृष्ण हो पिलाया उसको भी ठाकुर जी ने अपना गोलोक दे दिया, ऐसा दयालु कौन होगा।" ये श्लोक को सुनने के बाद मैं अपनी निर्विकल्प समाधि समाप्त कर ली और पूछा! कि यह श्लोक किसने लिखा मुझे उसके पास ले चलो। भागवत १.४.४ आत्माराम लोग! आत्माराम लोग वो होते हैं जो अपने आप में रमण करने वाले लोग जो परिपूर्ण तृप्ति होते हैं जिनको बाहर से कुछ नहीं चाहिए। आत्माराम को श्रीकृष्ण की भक्ति करनी पड़ती है। क्योंकि! सगुन सविशेष साकार ब्रह्म में ऐसा वैलक्षण है, की वो लोग अपनी निर्गुण निर्विशेष निराकार समाधि को भूल जाते हैं।
तो चाहये मनुष्य अकाम हो निष्काम हो या सकाम हो सब के लिए हैं, यहाँ तक की जो मुक्ति हो गयेथे, वो भी श्रवण, स्मरण और कीर्तन हैं। मुक्त किसे कहते हैं?जिसको ब्रह्मज्ञान हो गया और वो मर गया फिर वो भगवान में मिलगये वे भी! आते हैं भक्ति करने के लिए। तो जब मुक्त भक्ति करता है, तो जीवन मुक्त करेगा ही, रामचरितमानस सप्तम सोपान (उत्तर काण्ड) : श्री राम जी का प्रजा को उपदेश: "जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥" जीवन मुक्त उसे कहते हैं जो ज्ञानी अभी मरा नहीं है और प्रारब्ध भोग रहा है और अभी उसे ब्रह्म का अनुभव अन्तः कारण की उपाधि पर होता हैं पूर्ण ब्रह्म का अनुभव मरने के बाद जब भगवान में मिल जायेगा, तब होगा। अन्तः कारण की उपाधि पर निर्विकल्प समाधि का उसको आनंद मिलता है उसको जीवन मुक्त कहते हैं, उसका प्रारब्ध रहता है और जब मरने के बाद प्रारब्ध भी समाप्त हो जाता है! तब वो मुक्त कहलाता हैं।
तो जीवन मुक्त भी, मुक्ति भी साधक भी सिद्ध भी योगी भी, सबकेलिये ३ साधना। आगे फिर कहते है शुकदेव परमहंस भागवत २.२.३३ : "वेदों में कोई और मार्ग नहीं है इन तीन मार्गों के अलावा" और मैं ही नहीं बोलरहा हू, ब्रह्मा ने तीन बार वेदों को मथा और संसार वालो को कहा "श्रोतव्य, कीर्तितव्य स्मर्त्तव्यो" ये तीन; एक मात्र मार्ग है। ये वही मार्ग ब्रह्मा भी कहते है जो शुकदेव परमहंस जी कहते हैं।
फिर शुकदेव परमहंस ने बोला भागवत २.२.३६ "सर्वत्र और सर्वदा, श्रवण स्मरण और कीर्तन करो" हमलोग १ घंटे श्रवण स्मरण और कीर्तन करते है, और उसके बाद संसार का श्रवण स्मरण और कीर्तन करने लगते हैं। एक बात याद रखे केवल २ जगह हैं, भगवान और संसार, अब आप भगवान का श्रवण स्मरण और कीर्तन करें या संसार का करें। नारद भक्ति सूत्र १९ में नारद जी कहते है भक्त को दो काम करना चाहिए "भगवान का सदा स्मरण और भगवान का विस्मरण होने पर वकुल हो कर उसका स्मरण करें"
निष्कर्ष:- मनुष्य का क्या कर्तव्य है? श्रवण, स्मरण और कीर्तन। मनुष्य क्या करें? सर्वत्र और सर्वदा स्मरण भगवान का। और क्या नहीं करें भगवान का विस्मरण न होने पाए।

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