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सुख की श्रेणी, माया जगत में सबसे बड़ा सुख क्या है?

माया जगत में सबसे बड़ा सुख
सुख क्या है, हम सुख क्यों चाहते हैं। जानने के लिए इस पृष्ठ पर जाये आनंद क्या है, हमें आनंद क्यों चाहते हैं। वैसे तो हमने आपको शास्त्र-वेदों के अनुसार यह बताया कि आनंद ही भगवान है। तो प्रश्न यह उठता है कि, "सुख(आनंद) के प्रकार(श्रेणी) कहाँ से आगये?"
यहाँ पर हम जो सुख संसार में चाहते हैं:- मान सम्मान वैभव वाले, इस सुख के बारे में बात करने वाले है। दरअसल इसे सुख नहीं कहना चाहिए, इसे हमे अपनी कामना कहना चाहिए, परन्तु, चुकी हम इन्हें सुख मानते हैं। तो हमारे माने गए आनंद अथवा सुख के आधार पर, सुख के ११ श्रेणी(कक्षा) हैं। इसका उल्लेख तैत्तिरीयोपनिषद २.८ में है। तो तैत्तिरीयोपनिषद २.८ के अनुसार सुख के ११ श्रेणी हैं।

१. सारे संसार का! यानी सारे मर्त्यलोक का केवल एक राजा हो। मतलब लगभग १९५ देश है उन सभी का एक राजा हो, युवा अवस्था हो, स्वस्थ हो, विद्वान हो, सदाचारी हो, रूपवान, गुणवान, बलवान, बुद्धिमान हो, और प्रजा भी उसके अनुकूल हो। यानि सारे बातें अछी-अछी हो तो हमारे मर्त्यलोक में सबसे बड़ा सुखी माना जायेगा।
२. ऐसे सैकड़ों राजाओं के बराबर, एक मनुष्य-गन्धर्व लोक का सुख।
३. ऐसे सैकड़ों मनुष्य-गन्धर्व लोक के सुख के बराबर, एक देव-गन्धर्व लोक का सुख।
४. ऐसे सैकड़ों देव-गन्धर्व लोक के सुख के बराबर, एक पितृलोक का सुख।
५. ऐसे सैकड़ों पितृलोक के सुख के बराबर, एक आजानज देव का सुख।
६. ऐसे सैकड़ों आजानज देव के सुख के बराबर, एक कर्मदेव का सुख।
७. ऐसे सैकड़ों कर्मदेव के सुख के बराबर, एक देवता का सुख।
८. ऐसे सैकड़ों देवताओं के सुख के बराबर, एक इन्द्र देव का सुख।
९. ऐसे सैकड़ों इन्द्र देव के सुख के बराबर, एक बृहस्पति का सुख।
१०. ऐसे सैकड़ों बृहस्पति के सुख के बराबर, एक प्रजापति का सुख।
११. ऐसे सैकड़ों प्रजापति के सुख के बराबर, एक ब्रह्म लोक का सुख।


मनुष्य-गन्धर्व लोक से स्वर्ग का प्रारंभ है और ब्रह्म लोक स्वर्ग का अंतिम लोक है। लेकिन, इन सब लोकों में काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष है। अर्थात! माया स्वर्ग में भी है। जैसे एक गरीब को साइकिल मिल जाए तो बहुत खुश होता है, फिर जब किसी मोटरसाकल वाले को देखकर सोचता है, "साइकिल भी कोई चीज है! मोटर साइकिल मिल जाये", फिर मोटर साइकिल मिल गया तो किसी कार वाले को देखकर सोचता है, "मोटर साइकिल भी कोई चीज है! कार मिल जाये"
तो बस इसी तरह इन स्वर्ग के १० लोकों का हाल हैं। मनुष्य-गन्धर्व वाले लोग, देव-गन्धर्व लोक के सुख को देखकर सोचते है, "मनुष्य-गन्धर्व लोक भी कोई लोक है! देव-गन्धर्व लोक मिल जाये" और देव-गन्धर्व वाले लोग, पितृलोक लोक के सुख को देखकर सोचते है, "देव-गन्धर्व लोक भी कोई लोक है! पितृलोक लोक मिल जाये" अस्तु, ऐसे करते-करते यह प्रजापति के लोक तक यही हाल है।
और! संसार में आप लोग देख ही रहे है, सब लोग एक से एक अमीर बनना चाहते है। 

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