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अगर भगवान आनंद है, तो हम संसार में आनंद क्यों मानने लगे?

संसार
हम ने अब तक अपने २ लेख में ये समझा की आनंद क्या है, हम आनंद क्यों चाहते हैं? और ❛आनंद ही भगवान है, आनंद की परिभाषा?❜ और यह भाव हमारे आत्मा के कारण है। अधिक जानने के पढ़ें ❛आत्मा का क्या स्वभाव है?❜ अगर आप ने नहीं पढ़ा तो एक बार पढ़ले।
अस्तु, हम संसार(माता-पिता बेटा, रसगुल्ला आदि) में आनंद क्यों मानने लगे, जबकि आनंद तो भगवान है! आनंद भगवान का नाम है। तो फिर हम संसार में आनंद क्यों मानने लगे। इसको एक उदाहरण से समझे। अगर आप एक लड़के है तो एक लड़की(श्वेता) का नाम सोचिए और अगर आप लड़की है तो एक लड़के(ऋषभ) का नाम सोचिए।
"❛माया❜ २ प्रकार की होती हैं, गुण माया और स्वरूप माया।" श्वेता नाम की एक लड़की है, जो चेतन(जीवित) है, वह हम लोग की तरह है, उसके हात पाव मुँह है और आप, उससे प्यार करते है। लेकिन गुण माया ने श्वेता के गुणों को भुला दिया और स्वरूप माया ने श्वेता का स्वरूप भुला दिया। तो आप अब न तो श्वेता के गुणों को जानते है और न तो स्वरूप को जानते है। लेकिन गुण और स्वरूप भूलने के बाद भी, आप उसे नहीं भूल पाये। अर्थात श्वेता को चाहने अथवा मिलने की प्यास को ये माया नहीं भुला सकी। इसलिए हमें बस इतना याद है, की हम श्वेता को चाहते हैं। परन्तु, कैसी दिखती है, क्या उसके गुण है सब भूल गए! माया के कारण।
जैसे एक पागल आशिक अपनी प्रेमिका को, कभी तो किसी व्यक्ति में उसको मनलेता है, तो कभी उसको किसी वस्तु में मान लेता हैं। वैसे ही, आप कभी श्वेता को किसी व्यक्ति(अपने माँ, बेटा, पिता) में मान कर उसको पाने की कोशिश करते है, तो कभी किसी वस्तु(रसगुल्ला आदि) में मानकर उसको पाने की चाहत है। आप कहेगे, अरे! श्वेता माँ बाप कैसे हो गयी? वो तो एक लड़की है? ध्यान दीजिये, गुण और स्वरूप माया ने उसका(श्वेता का) गुण और स्वरूप दोनों भुला दिया है ना! हाँ! तो श्वेता लड़की है ये आप भूले हुए है। इसलिए माँ में पिता में रसगुल्ला में मानते है और उसे पाने की इच्छा रकते है।

अस्तु, अब श्वेता को भगवान मानो। तो अब सब समझ जायेंगे। भगवान को हम(जीवात्मा) प्यार करते है। लेकिन गुण माया ने और स्वरूप माया ने सब कुछ भुला दिया। भगवान(आनंद) कैसे दिखते है, और उनका क्या गुण है। जब ये सब हम भूल गये, तो माँ बाप और रसगुल्ला में आनंद(भगवान) को मानने लगे।
अस्तु, अब जब भी आपको किसी व्यक्ति-वस्तु को पाने की इच्छा हो, या आप ये सोचे की अरबपति हो जाये तब तो आनंद ही आनंद है, तब आप इस बात पर ध्यान दीजियेगा। आनंद तो भगवान है, यह आनंद रसगुल्ले में या अरबपति बनने में नहीं हो सकता। क्योंकि आनंद तो भगवान(श्वेता के उद्धरण को याद करिये) है। श्वेता चेतन है भगवान की तरह; वह किसी व्यक्ति-वस्तु में नहीं हो सकती। अब प्रश्न यह है, की जो हमे खुशी का अनुभव होता है, वो आनंद नहीं है तो क्या है, हम तो उस भाव को चाहते है किसी भगवान को नहीं। इसका समाधान किसी और पृष्ठ में करेंगे। परन्तु आपके कुछ प्रश्नों का उत्तर इस पृष्ठ में मिल जायेगा ❛कामना क्या है, उसके प्रकार, कहाँ रहती है?❜

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