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गुरु कौन है, अथवा गुरु क्या है?

गुरु कौन है?
महापुरुष ही को गुरु कहते है। गुरु शब्द का अर्थ अद्वय तारका उपनिषद् १६ कहता है,"गु मतलब अंधकार (अज्ञान) और रु मतलब निकलने वाला।" अतएव गुरु वो है जो आनंद देने वाला है और माया को समाप्त कर देने वाला है। अथवा अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला है। तो ऐसा कोई हो उसको गुरु कहते है। अस्तु, गौरांग महाप्रभु कहते है "तार वाक्य क्रिया मुद्रा विज्ञे न बुझये" अर्थात गुरु के वाक्य, उनका क्रिया, उनका रहने का तरीका, जानने की कोशिश करने पर भी नहीं जान सकते। जैसे भगवान के बारे में आपने सुना पढ़ा होगा की वे अलौकिक (दिव्य) है अर्थात इन्द्रिय मन बुद्धि से परे है, वैसे ही गुरु भी अलौकिक (दिव्य) है अर्थात इन्द्रिय मन बुद्धि से परे है।
गुरु हमारा (साधक अथवा भक्त का) मार्ग दर्शक होता है। वो हमारा एक मात्र हितैषी होते है। क्योंकि गुरु को कुछ चाहिए नहीं। गुरु तो केवल जीवों पर उपकार करते है। उनके कर्म और हमारे कर्मों में जमीन आसमान का भेद है, ये जानने के लिए पढ़े महापुरुष भगवान और हमारे(माया आधीन) के कर्मों में भेद?
गुरु मतलब भगवत प्राप्त संत या श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु, यह दो गुण होते है गुरु में। श्रोत्रिय (सिद्धांत) मतलब शास्त्रों वेदों पुराणों का ज्ञाता। वो चाहें अंगूठा छाप व्यक्ति हो, लेकिन भगवत प्राप्ति होने के बाद, समस्त शास्त्रों वेदों का ज्ञान भगवान गुरु को दे देते है। उनको शास्त्रों वेदों पड़ना नहीं पड़ता। और ब्रह्मनिष्ठ मतलब भगवत प्राप्ति (भगवान का दर्शन, प्रेम, भगवान की सारी शक्तियाँ, भगवान के पास जो कुछ है उसकी प्राप्ति) गुरु को होती है। छान्दोग्योपनिषद् ८.१.५ और ८.७.१ में कहा है कि, "भगवान के पास प्रमुख रूप से आठ गुण है। यह आठ गुण भगवान के गुरु को दे देते है।
अतएव श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ होने के कारण, गुरु ही भक्त अथवा साधक के शंकाओ का समाधान करते है। वेदों ने कहा योगशिखोपनिषत् ५.५८ "गुरुस्तथैवेशो यथैवेशोस्तथा गुरुः" और ब्रह्मविद्या उपनिषद् ३० कहते है कि, "गुरु और भगवान एक होते है, ये छोटे बड़े नहीं होते।" इसलिए आप इनको छोटा बड़ा मत मानना। यद्यपि अगर बारीकी से सोचें तो एक नहीं है। क्योंकि वेदान्त ४.४.१७ "जगद्धयापारवर्ज" अर्थात भगवान अपनी सारी शक्तियाँ दे देते है, परन्तु जगत का काम (संसार बनाना, सबके कर्म और मन के बातों का हिसाब किताब रखना और उनके अनुसार फल देना) यह गुरु को नहीं देते। तो अगर इन कामों को निकल दिया जाये तो भगवान और गुरु में भेद नहीं रह जाता। वह एक की हो जाते है। और वास्तविक गुरु तो कहते है, "अच्छा हुआ नहीं दिया ये काम, नहीं तो सबके गंदे-गंदे विचारों का हिसाब किताब हमको रखना पड़ता।"
श्वेताश्वतरोपनिषद ६.२३ "गुरु ही भक्त या साधक को दिव्य भक्ति (प्रेमानंद, दिव्यानंद) प्रदान करता है।" अर्थात गुरु के माध्यम से ही दिव्य भक्ति (प्रेमानंद, दिव्यानंद) मिलता है। वेद कहता है ब्रह्मविद्या उपनिषद् ३१ "केवल गुरु की भक्ति करने पर लक्ष (प्रेमानंद, दिव्यानंद) की प्राप्ति हो जाती है।"
भागवत १०.८०.३४ कृष्ण उद्धव से कहते है "उद्धव! मैं कोई भी कर्म-धर्म(वर्णाश्रम धर्म) हो, उससे मैं प्रसन्न (खुश) नहीं होता। गुरु का जो व्यक्ति भक्त बन जाता है मैं उससे प्रसन्न होता हूँ। चाहें वह भक्त मेरा एक बार भी नाम न लेता हो।" यहाँ तक की भागवत ११.१४.१५-१६ कृष्ण उद्धव से कहते है "उद्धव मैं मेरे बेटे ब्रह्मा, शंकर मेरी पत्नी लक्ष्मी और मेरी आत्मा से मैं भी प्यार नहीं करता।" और फिर भगवान कहते है भागवत ११.२६.३४ "गुरु मेरा इष्ट देव है, मेरा बंधु है मेरी आत्मा है, वह मैं ही हूँ और मैं गुरु की भक्ति करता हूँ।" तो ऐसे है गुरु।

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