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नामापराध क्या है, क्यों ये सबसे बड़ा अपराध है?

सबसे बड़ा अपराध।
नमापराध (आध्यात्मिक अपराध) का अर्थ है भगवान, भगवान का नाम, भगवान की लीला, भगवान के दिव्य निवास, या भगवान के संतों के बारे में कोई भी नकारात्मक सोच। नामापराध हो सकता है, या तो कुछ नकारात्मक कह कर, नकारात्मक को सुनना, नकारात्मक कुछ पढ़ना।
अगर आप नामापराध से बचना चाहते है तो, एक शर्त है उसको याद कर लीजिये। शर्त यह है कि, "संसार के प्रति उदासीन हो जाओ। उदासीन मतलब किसी से न प्रेम और न द्वेष या दुर्भावन। और भगवान या भगवान के जान के प्रति सदा प्रेम हो लेकिन दुर्भावन नहीं हो।" अस्तु, अगर संसार के प्रति उदासीन रहेंगे तो कोई भी व्यक्ति हो, चाहे वह भगवान का भक्त हो यानि भगवान की प्राप्ति (दर्शन) नहीं हुआ है उनकी माया अभी है, लेकिन भगवान की भक्ति कर रहे है और चाहे देवी देवता लोग हो। ये संसार के ११ श्रेणी है। अधिक जानने के लिए पढ़े ❛सुख की श्रेणी, माया जगत में सबसे बड़ा सुख क्या है?❜
भगवान के जन का मतलब स्वयं भगवान, उनका नाम, उनका रूप, उनकी लीला, उनके धाम, उनके संत या महापुरुष या गुरु, इनके प्रति सदा प्रेम हो लेकिन दुर्भावन नहीं हो। तो आप नामापराध से बचे रहेंगे। भागवत ३.१५.२५ में विस्तृत रूप से १० नामापराध का वर्णन है। इन अपराधों को क्रम से समझिये, भागवत ३.१५.२५ के अनुसार।

पहला नामापराध

"उन व्यक्तियों के प्रति दुर्भावना (निंदा) करना जो अपने जीवन में भगवान की महिमा का प्रचार करने का प्रयत्न कर रहे हैं।" अर्थात वे लोग वास्तविक महापुरुष अथवा गुरु अथवा संत नहीं है अर्थात वो माया से मुक्त नहीं हुए, परन्तु फिर भी वो भगवान की महिमा का प्रचार करने का प्रयत्न कर रहे हैं।

दूसरा नामापराध

"भगवान का पवित्र नाम अति-शुभकारी है, एवं उनकी लीलाओं एवं नाम में कोई भेद नहीं है। यदि कोई सोचता है कि भगवान के नाम और अन्य देवी-देवताओं के नाम एवं क्रियाएँ एक ही स्तर पर हैं या भगवान के पवित्र नाम भौतिक शब्द-ध्वनि के समान है, तो यह दूसरा अपराध है।" अर्थात भगवान और यह स्वर्ग के देवी वेवताओ में अनेक अंतर है। जानने के लिए पढ़े ❛देवी-देवता और भगवान में क्या अंतर है?❜


तीसरा नामापराध

"भगवान की महिमा का प्रचार करने वाले गुरु को एक साधारण व्यक्ति के समान समझना तीसरा अपराध है।" अर्थात अगर भगवान की महिमा का प्रचार करने वाले व्यक्ति माया मुक्त न भी हुए तो उनके प्रति भी हमे उदासीन रहना चाहिए। परन्तु अगर कोई वास्तविक गुरु अथवा महापुरुष है जिसने भगवान का दर्शन किया है तो उसके प्रति प्रेम हो लेकिन द्वेष (दुर्भावना) न हो।

चौथा नामापराध

"वैदिक ग्रंथों जैसे पुराण या अन्य दिव्य-प्रकट शास्त्रों को सामान्य (सांसारिक पुस्तकों के) ज्ञान की पुस्तक के समान समझना।" अर्थात संसार की जितनी भी पुस्तके है, उनको शास्त्र, वेद, पुराण के सामान मानना और उनके ज्ञान को भी संसार के पुस्तक के ज्ञान के सामान मानना अपराध है। शास्त्र, वेद, पुराण ये सब भगवान की वाणी है। यहाँ तक की रामायण, महाभारत और रामचित मानस भी। हमें यह लगता है की इसमें ये गलत बात लिखी है। परन्तु वास्तविक संत या महापुरुष के पास जायेगे तो वो कहते है कि, 'यह आपके दृष्टिकोण से लग रहा है। परन्तु वस्तुतः बात कुछ और है। जब आप महापुरुष बन जाये गए तब पता चलेगा।'

पांचवां नामापराध

"यह सोचना है कि भक्तों ने पवित्र नामों को कृत्रिम (झूठी) महत्वत्ता दी हुयी है।" शास्त्र वेद कहते है कि, "नाम्नामकारि बहुधा निज सर्वशक्तिसुतखार्पिला नियमित: स्मरणे न काल:" अर्थात प्रत्येक भगवन नाम में भगवान स्वयं बैठे है और उनकी प्रत्येक (सभी) शक्तियाँ निहित (बैठी) है। तो आप ये न सोचे कि 'ये भक्त लोग झूठ बोलते है, भगवान के नाम में भगवान बैठा है।' यह सत्य वचन है, भगवान के नाम में भगवान बैठे है।

छठवां नामापराध

"भगवान के नाम पर मनगढ़न्त व्याख्या करना छठवां अपराध है।"

सातवाँ नामापराध

"भगवान के नाम के बल पर पापपूर्ण कार्यों में संलिप्त होना सातवाँ अपराध है।"
अर्थात अमूमन यह समझा जाता है कि भगवान के नाम के जप से सभी पापकर्मों के फल से छुटकारा पाया जा सकता है, परन्तु यदि कोई यह सोचे कि अब उसे किसी भी पापकर्म में लिप्त होने की छुट है, तो यह अपराध के लक्षण हैं।

आठवां नामापराध

"'हरे राम हरे कृष्ण' या 'श्री कृष्ण शरणम ममः' या 'गोविन्द जय जय गोपाल जय जय' महान्त्र को अन्य आध्यत्मिक क्रियाओं जैसे ध्यान, आत्मसंयम, तप या यज्ञ के समान समझना आठवां अपराध है।" यह इसलिए अपराध में आते है, क्योंकि ये मंत्र भगवान के प्रेम प्रति के है। और तप या यज्ञ अन्य मंत्र है वो संसार का फल देने वाले है। भगवान का प्रेम दिव्य है, और संसार के वस्तु माया के बने है। अतएव ये दोनों की तुलना नहीं की जासकती। इसलिए ये अपराध है।

नौवां नामापराध

"ऐसे व्यक्ति जिन्हें नाम के प्रति कोई रूचि नहीं है, उनके समक्ष भगवन्नाम की महिमा का विशेष रूप से व्याख्यान करना, नौवां अपराध है ।"

दसवाँ नामापराध

"आध्यात्मिक प्रगति की प्रक्रिया का पालन करते हुए यह समझना की मैं यह शरीर हूँ और उस से सम्बंधित वस्तुओं के प्रति आसक्ति बनाये रखना दसवाँ नाम-अपराध है।"

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