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सभी मायाधीन मनुष्य (स्त्री-पुरुष) में चार दोष हैं।

मायाधीन मनुष्य चार दोष हैं।
हर व्यक्ति जो ❛माया❜ के आधीन है उसमे चार दोष होते ही हैं। तो अब प्रश्न यह है कि क्यों ये दोष होते हैं? इसका कारण है माया। ❛माया❜ की वजह से, हम माया आधीन जीव अथवा मनुष्य अथवा स्त्री-पुरुष में चार दोष होते हैं। कुछ मनुष्य तो मायातीत (माया से मुक्त) भी होते हैं उनमें नहीं यह दोष नहीं होते। जैसे तुलसीदास, सूरदास, मीरा, वेद व्यास, आदि। जो मायातीत (माया से मुक्त) होते हैं, उनको महापुरुष, गुरु, रसिक, महात्मा व संत कहते है। जो माया के आधीन रहते है उनको मायाधीन मनुष्य कहते हैं।

मायाधीन मनुष्य (स्त्री-पुरुष) में चार दोष।

१. भ्रम
२.प्रमाद
३. विप्रलिप्सा
४. कर्णापाटव

भ्रम किसे कहते हैं?

भ्रम कहते हैं किसी वस्तु को न पहचान करके दूसरा रूप समझना। जैसे मैं आत्मा हूँ परन्तु अज्ञान (भ्रम) के कारण अपने को देह मानता हूँ। एक पीतल की चैन (chain) है, उसको एक व्यक्ति सोने की चैन समझता है। एक वस्तु को सही रूप में न पहचान कर गलत रूप में निर्णय करना यह भ्रम है। भागवत में कहा गया है, विपर्यय, मति विपर्यय इसको भ्रम कहते हैं। अर्थात बुद्धि नहीं समझ सके, किसी व्यक्ति-वस्तु का सही रूप और उसका उल्टा समझे यह भ्रम है।

प्रमाद किसे कहतें हैं?

मन की असावधानी, लापरवाही को प्रमाद कहते हैं। आप लोग समझदार व्यक्ति है। आपको गलती नहीं करना चाहिए। लेकिन कुछ मस्ती में कुछ लापरवाही में गलत बोल गए। फिर कहते हैं कि 'वो बात मुँह से निकल गया, माफ़ कीजिये।' ऐसा बोलते हैं हम लोग। निकल गया? अरे कोई बात स्वाभाविक(नेचुरल) निकलता है बिना सोचे-विचारे। हाँ! लापरवाही से ऐसा होता है। बड़े-बड़े बुद्धिमानों से होता है। तो मन की असावधानी, ये प्रमाद है।

विप्रलिप्सा किसे कहतें हैं?

विप्रलिप्सा कहते हैं अपने दोष को छुपाना। हर चीज में दखल देने का अहंकार। कोई चीज़ छेड़ दो कहीं पर, उसका ज्ञान हो चाहे न हो बोल पड़ते है सभी लोग। जिस विषय में बड़ी-बड़ी उपाधि (डिग्री) लिए रहतें हैं, उसमें भी वो सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) नहीं है। कौन डॉक्टर गलती नहीं करता। मरीज को पचास प्रकार से जाँच किया, समझा, दवा किया, नहीं फायदा हुआ। तब वो कहता है दवा बदल दो। अरे तेरी खोपड़ी बदल पहले। तूने समझा नहीं की क्या बीमारी है और इलाज शुरू कर दिया। तो डॉक्टर कहता है कि 'भई मैं कोई अन्तर्यामी हूँ, यह लक्षण इस बीमारी में भी होतें हैं, इस बीमारी में भी होतें हैं। तो मैंने समझा यह बीमारी है।' हम लोग अपने दोष को छुपाते हैं, संसार के सब लोग छुपाते हैं। यह सबमें बीमारी है। तो यह विप्रलिप्सा जो है। वो हम सब लोगों को घेरे हुयें हैं। हम लोग अपने दोष को छुपाते हैं, संसार के सब लोग छुपाते हैं। यह सबमें दोष है।

कर्णापाटव

कर्णापाटव कहते है, अनुभवहीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना। हमको एक विषय का भी अनुभव नहीं है। और अगर मान भी ले की एक विषय में कोई सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) भी है, तो सैंकड़ों विषय है और उन विषयो में वह व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं है। वो इंजिनियर नहीं है। इंजिनियर है तो डॉक्टर नहीं है। डॉक्टर है तो वकील नहीं है। अब ऐसा कौन आदमी है जो सब में परिपूर्ण हो ये सौ वर्ष की उम्र में। तो अनुभवहीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना यह कर्णापाटव है।
तो यह चारों दोष मायाधीन मनुष्य में होते ही हैं। किसी में कम किसी में ज्यादा होता है। लेकिन यह चारों दोष होते हैं।

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