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क्या 'मैं' आत्मा, मन-बुद्धि या शरीर हूँ?

आत्मा
आत्मा को ही जीव कहते है और जीव को ही जीवात्मा कहते है। जीव या जीवात्मा या आत्मा क्या है? या मैं कौन हूँ? इस प्रश्न का समाधान हम दो तरह से करेंगे।
१. तर्क से और २. वेद, उपनिषद, गीता, भागवत, वेदांत और अन्य ग्रंथों द्वारा करेंगे।

सर्वप्रथम हम 'तर्क' से जानने की चेष्टा करेंगे।

हम लोग संसार में कुछ शब्दो का प्रयोग करते। जैसे,
१. "मैंने देखा, मैंने सुना, मैंने सुंघा, मैंने रास लिया, मैंने स्पृश्य किया, मैंने सोचा, मैंने जाना" और ऐसा भी बोलते है,
२. "मेरी आँख ने देखा, मेरे कान ने सुना, मेरे मन ने सोचा"
तो इन दोने में सही कौन है? अगर 'तुमारा मन है,' तो तुम मन नहीं हो। अगर 'तुम्हारीं आँख है,' तो तुम आँख नहीं हो। अगर तुमारा शरीर है, तो तुम शरीर नहीं हो। दुसरे तरह से समझे तो 'मेरी आँख' सही वाक्य है या 'मैं आँख' सही वाक्य है? 'मेरा मन' सही वाक्य है या 'मैं मन' सही वाक्य है? 'मेरे हाथ' सही वाक्य है, या 'मैं हाथ' सही वाक्य है? 'मेरा पेट' सही वाक्य है, या 'मैं पेट' सही वाक्य है? 'मेरा माकन' सही वाक्य है, या 'मैं माकन' सही वाक्य है? 'मेरे १० लाख रूपये' सही वाक्य है, या 'मैं १० लाख रूपये' सही वाक्य है। 'मेरा मोबाइल' सही वाक्य है, या 'मैं मोबाइल' सही वाक्य है।
अग्रेजी में भी 'My mind' or 'I mind', 'My eye' or 'I eye', 'My hand' or 'I hand', 'My home' or 'I home'. मेरा आशय यह है, कि 'मैं मन' वाक्य सही वाक्य नहीं है 'मेरा मन' यह सही वाक्य है। 'मैं हाथ' वाक्य गलत वाक्य नहीं है, 'मेरे हाथ' यह सही वाक्य है। संसार के सभी भाषा में 'मैं (I)' और 'मेरा (My)' जैसे शब्द हैं। किसी व्याकरण (grammar) के विद्वान से पूछियेगा, तो वे कहेंगे, मैं (I) अलग है मेरा (My) से। जैसे 'मेरा माकन' यह वाक्य यह दर्शाता है, कि मैं का माकन है। मैं का अर्थ है "जो मेरा नहीं हो।" अथवा "जो मेरे से प्रथक (अलग) कोई वास्तु हो" वो मैं है। तो अगर हम व्याकरण से 'मैं' को समझे तो बस इतना समझ सकते हैं कि 'मेरा' 'मैं' नहीं हो सकता।' या 'मैं' का कोई वस्तु व्यक्ति मेरा होता है। जैसे 'मेरा नाम' यह 'मैं' का नाम है। हमारा प्रश्न तो यह हैं यह 'मैं कौन हैं।'
संसार में आप किसी से पूछे!
आप:- आप कौन है? अमुक व्यक्ति:- मैं कलेक्टर साहब?
आप:- मैंने आपका पद नहीं पूछा है। अमुक व्यक्ति:- मैं अंकित मिश्रा।
आप:- मैं आपका नाम नहीं पूछ रहा हूँ। अमुक व्यक्ति:- मैं मनुष्य हूँ।
आप:- मनुष्य! यह तो शरीर का नाम है। आप कौन है? हम तो आपका परिचय पूछ रहे हैं।
अब वह अमुक व्यक्ति चुप हो जायेगा। क्यों? इसलिए क्योंकि शरीर के आगे हम लोगों ज्ञान नहीं हैं, क्योंकि हम अपने आप को शरीर मानते है। और शरीर में भी हम और निचे चले जाते है, हम भारतीय हैं, हम पंजाबी-मद्रासी हैं, हम ब्राह्मण-छत्रिय हैं, हम स्त्री-पुरुष हैं। इतना निचे गिरे जा रहे हैं। अतएव गंभीर विचार करना आवश्यक है कि 'मैं कौन हूँ?'
या तो मैं इन्द्रिय हूँ? या तो मैं बुद्धि हूँ? या तो मैं शरीर हूँ? या तो मैं सूक्ष्म (अणु से भी छोटा) शरीर हूँ? मैं क्या हूँ? अगर यह माने की मैं शरीर हूँ! तो शरीर पंचतत्व (पृथ्वी (ठोस), आप (जल, द्रव), आकाश (शून्य), अग्नि और वायु (गैस) ) से बना हैं। यह बात तो विज्ञान भी मनाता है। तो हमारा शरीर पंचतत्व का है तो 'हमें फिर काम क्रोध लोभ मोह क्यों कष्ट देते है?' यह कष्ट तो शरीर का नहीं हैं। शरीर की बीमारी तो ज्वर (बुखार), टी.बी. कैंसर आदि कष्ट दे तो ठीक हैं। लेकिन ये काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष एवं भय यह सब हमें क्यों कष्ट दे रहे हैं? और अगर हम ये कहें की हम मन है? तो शरीर के रोग हमें क्यों कष्ट दे रहे हैं? आज ज्वर (बुखार) शरीर बीमारी हो गयी कल कुछ और शरीर की बीमारी हो गयी।
हम जब सो जाते है। तो सपने में यही सब कुछ देखते सुनते सुंघते रास लेते स्पर्श करते सोचते जानते हैं जैसे हम जाग्रत अवस्था में करते हैं। यह हमारा शरीर तो खाट पर पड़ा है, तो यह सब सोते वक्त कौन कर रहा हैं? उत्तर है 'मन'। और जब आप गहरी नींद में सो जाते हैं! तो मन भी कुछ नहीं करता। गहरी नींद (सुषुप्ति अवस्था) वो अवस्था होती है जब हम लोग सपना भी नहीं देखते। इस गहरी नींद में हमारा मन कुछ नहीं करता। लेकिन उस गहरी नींद में भी हम रहते हैं। हम मर नहीं जाते गहरी नींद में! मन का काम केवल बंद हो जाता हैं। तो फिर 'मैं' मन भी नहीं।
जब हम सो के उठते है गहरी नींद से! तो हम लोग कहते हैं 'आज बड़े आनंद से सोया। आज सपना-वपना नहीं आया।' यानि केवल उस (गहरी नींद) में मैं था। अतएव इसका मतलब मैंन देह नहीं इन्द्रिय नहीं, मन बुद्धिं नहीं! मैं कुछ और हूँ। जब कोई व्यक्ति मर जाता हैं। "आज रमेश सुबह ४ बजे संसार से चला गया।" आप कहाँ जा रहे है? हम उसके पास जा रहे हैं। अरे वो तो चला गया ४ बजे और आप ५ बजे जा रहे हैं उसके पास। तो आप कहेंगे "मैं उसके शरीर के पास जा रहा हूँ। शव (Dead body) यात्रा में जा रहे हैं वो शव हैं" तो वो कौन हैं, जो चला गया सुबह ४ बजे। इतने सालो तक तो आप लोग और रमेश खुद को शरीर कह रहा था। 'रमेश इंदौर आया और दिनेश इंदौर नहीं आया।' ये वाकय शरीर को कहते हैं। आज जब वह मर गया तो, आप किसके लिए कह रहे हैं कि वो चला गया? शरीर तो लेटा हैं। तो इसका मतलब मैं कोई और है। तो 'मैं' कौन है?
कौन जाता है शरीर छोड़ने पर? आप कहेंगे 'मैं (आत्मा)'। संसार में लोग कहते हैं कि, "मरने के बाद शरीर से केवल मैं (आत्मा) जाती हैं।" यह बात लोग गलत बोलते हैं। मरने के बाद केवल आत्मा नहीं जाती उसके साथ भी कुछ जाता हैं। शरीर से क्या जाता हैं मरने के बाद? यह जानने के लिए पढ़े ❛आत्मा क्या है? क्या केवल आत्मा शरीर से जाती है? उसके साथ कौन जाता हैं?❜

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