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सभी व्यक्ति अपने सभी कार्य से आनंद ही चाहता हैं।

आनंद
गीता ३.५ का एक सिद्धांत है - "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्" अर्थात् कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्मा नहीं रह सकता। यानी बिना कर्म किये नहीं रह सकता। कोई हो, कुत्ता, बिल्ली, गधा, मनुष्य, देवता, राक्षस कोई हो। प्रत्येक जीव हर क्षण कर्म कर रहा है। अगर हम देखें कि एक व्यक्ति सोया है, तो सोना भी एक कर्म है। सो नहीं रहा, कुछ कर भी नहीं रहा, तो सोच रहा है कुछ न कुछ, यह सोचना भी कर्म है। अतएव हर व्यक्ति कुछ न कुछ करेगा, करना पड़ेगा, नियम है, सिद्धांत है। एक छण को भी चुप (बिना कर्म किये) नहीं रह सकता। कर्म के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़े ❛कर्म किसे कहते हैं? कर्म, क्रिया और कार्य में क्या भेद हैं?❜ संसार में सभी मनुष्य के शरीर अलग-अलग है, अंगूठा निशानी अलग-अलग है, आँखो की रेटिना निशानी अलग-अलग है, जबान की निशानी अलग-अलग है, सभी लोग अलग-अलग धर्म के हैं, सभी लोग अलग-अलग लय से बोलते हैं, सभी लोग अलग-अलग माहौल में रहते हैं, कुत्ते बिल्ली आदि भी मनुष्य से अलग-अलग है, सभी के अलग-अलग सोच अथवा विचार है, सभी लोग का अलग-अलग चीजों में दिलचस्पी हैं, सभी लोग ने अपने जीवन का अलग-अलग उद्देश बनाया है। विश्व में सभी लोग की बुद्धि अलग-अलग है।
परन्तु न जाने क्या बात है की सभी लोग इतना अलग-अलग होने पर भी केवल आनंद चाहते है, सुख चाहते है, शांति चाहते है। विश्व में सभी लोग की बुद्धि अलग-अलग होने पर भी आनंद चाहते हैं। वो व्यक्ति किसी भी देश धर्म सम्प्रदाय या धर्मनिरपेक्षता वाला ही क्यों न हो। परन्तु आनंद सुख शांति चाहता है, चाहे वो भगवान को मानने वाला हो या भगवान को न मानने वाला हो।

परन्तु आश्चर्य तो इस बात है कि विपरीत कार्य में भी आनंद चाहता है। विपरीत कार्य जैसे उठना और बैठना। एक व्यक्ति उठा, क्यों उठा? आनंद के लिए। बैठे-बैठे पैर में दर्द होने लगा तो खड़ा हो गया। हम किसी को रोते देखते हैं, तो भला वह आनंद के लिए कैसे रोयेगा? हाँ रोता है, आनंद के लिए ही रोता है कोई भी। रोना दुःख में होता है, किसी को दुःख मिलता है तो जब सहा नहीं जाता तो रो देते हैं लोग। किसी को दुःख है और वो रोये भी! रोने से उसका दुःख कम होता है, इसलिए रोता है। रोकर अपने दुःख को जितना जितना निकालता है, उतना उसको आनंद की अनुभूति होती है। इसी प्रकार कोई भी विरोधी कर्म हम देखें, सोना-जागना, उठना-बैठना, चलना-रुकना ये सब विरोधी कर्म हैं लेकिन सब हम आनंद के लिए ही करते हैं। तभी तक करते हैं, जब तक आनंद की अनुभूति हमको होती है। किसी को सोने में सुख मिल रहा है तो लगातार सोता ही नहीं रहता, आठ घंटे, दस घंटे सोया फिर उठना ही पड़ता है। क्योंकि अब उसे सोने में सुख नहीं मिल रहा है। तो आनंद के लिए ही कोई जीव कोई कर्म करता है। एक कुत्ते को अगर एक चप्पल मार दे कोई तो दूर भाग जाता है। उसको भी कष्ट नहीं चाहिए। पेड़-पौधों आदि पर चोट करो या अगर उन्हें जल आदि न मिले तो वे भी मुरझा जाते हैं। वर्षा होने पर लहलहा उठते हैं। उन्हें भी आनंद ही चाहिए।
यह बात हमें हमारे माता पिता ने भी नहीं सिखाई कि "बेटा तुम आनंद चाहा करो, दुःख मत चाहो। दुःख बुरी चीज है।" ऐसा किसी माता-पिता ने नहीं सिखाया। पैदा होते ही हमने आनंद मांगा। पैदा होते वक्त माँ और बच्चे को बहुत कष्ट होता है, जब माँ उस कष्ट को सह नहीं पाती तो बेहोश हो जाती है। वैसे ही जब बच्चा उस कष्ट को सह नहीं पाता तो बेहोश हो जाता है। और जब होश में आता है तो वो शरीर के कष्ट से बच्चा रोने लगता है। वह बच्चा रोता है, क्यों रोता है? हमें जो दुःख मिल रहा है वो रो कर निकलता है। हम लोग भी रो कर अपने दुःख को निकलते है।
हमने आपको बताया गीता के द्वारा की "कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्मा नहीं रह सकता।" अतएव हर कार्य और हर क्षण एक मात्र आनंद चाहते हैं। क्योंकि सब आनंद चाहते है सभी कर्म से इसलिए सबका उदेश्य/लक्ष केवल आनंद है। परन्तु हमें पता नहीं हम आनंद क्यों चाहते हैं? यह जानने के लिए पढ़े ❛आनंद क्या है, हम आनंद क्यों चाहते हैं?❜

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