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भगवान में आनंद है या भगवान ही आनंद है?

भगवान में आनंद है?
हमने आपको अब तक वेदों-शास्त्रों के प्रमाणों द्वारा बताया कि ❛सभी व्यक्ति अपने सभी कार्य से आनंद ही चाहता हैं।❜ और फिर हमने बताया ❛आनंद क्या है, हम आनंद क्यों चाहते हैं?❜ और बताया ❛आनंद ही भगवान है और आनंद की परिभाषा क्या है?❜ और फिर बताया ❛अगर भगवान आनंद है, तो हम संसार में आनंद क्यों मानने लगे?❜ तो इन सभी लेखों का सारांश यह है कि हम आनंद चाहते है। और जब तक हमें आनंद नहीं मिल जाता तब तक आनंद चाहेंगे। जो हम आनंद चाहते है वो आनंद भगवान ही है। हम भगवान को चाहते है, परन्तु अज्ञान के कारण हम संसार में आनंद ढूढ़ रहे है।
अस्तु, अब एक प्रश्न रह जाता है कि भगवान में आनंद है या भगवान ही आनंद है?
उत्तर है भगवान ही आनंद है। ये तो लोग समझाने के लिए बोल देते है कि भगवान में आनंद है। वेद कहता है तैत्तिरीयोपनिषद ३.६.१"आनंद ही ब्रह्म (भगवान) है।" तैत्तिरीयोपनिषद २.७.२ "रसो वै सः।" अर्थात् वो आनंद है। (वेद में रस को आनंद भी कहते है।) इस वेद मन्त्र में ये नहीं लिखा है कि "रसो वै तस्मिन्" अर्थात् 'उसमे रस है।' ऐसा नहीं लिखा है। "रसो वै सः।" अर्थात् 'वो आनंद है।' यह लिखा है। फिर वेद कहता है छान्दोग्योपनिषद् १.१.३ "वो आनंद है।" तैत्तिरीयोपनिषद २.४ और २.९ में भी है "आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्‌।" वही अर्थ है 'आनंद ब्रह्म (भगवान) है।' तैत्तिरीयोपनिषद २.७.२ "को ह्येवान्यात् कः प्राण्यात्‌। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्‌।" अर्थात्  'आनंद ब्रह्म है।' महोपनिषद २.९ वही अर्थ है 'आनंद ब्रह्म (भगवान) है।' कठरुद्रोपनिषद २७ "वोह सुख है।"
अस्तु, ये सब वेद मन्त्र कह रहे है 'वो आनंद है।' और भागवत भी कह रही है भागवत ३.९.३, १०.४८.७, १०.३.१३ और १०.१३.५४ इन सब में कहा गया वोह आनंद है, वोह रस है, वोह सुख है। तो ये सब वेद भागवत कह रहे है कि भगवान ही आनंद है।
फिर भी अगर हम तर्क से कहे कि उसमे आनंद है तो फिर भगवान और हो जायेगा, आंनद कुछ और चीज हो जायेगी। जैसे एक मकान में हम बैठे हैं, तो हम अलग है मकान अलग है। रसगुल्ले में २ चीज होती है न! एक रस और एक गुल्ला। छेने वाला गुल्ला और चीनी का तरल रस। तो रस गुल्ला हो गया।
परन्तु वेद शास्त्र कहते है की ऐसा नहीं है। भगवान ही आनंद है ऐसा कहते है। चाहते आनंद कहो चाहे भगवान कहो। चाहे भगवान भगवान कहो चाहे या आनंद आनंद कहो, दोनों का मंतलब भगवान। हम जीव(आत्मा) भगवान के अंश हैं। इसलिए आंनद ही चाहेंगे, चाहना पड़ेगा। गीता ३.५ "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्" अर्थात् कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्मा नहीं रह सकता। इसलिए प्रतेक छण उसी आनंद (भगवान) की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना पड़ेगा। जब तक हमें भगवान (आनंद) नहीं मिल जायेगा। तब तक हम आनंद (भगवान) को चाहेंगे। अगर हम आनंद संसार में मानेंगे तो अनंत काल तक आनंद नहीं मिलेगा। परन्तु अगर हम भगवान को आनंद मानेंगे तो एक जन्म न सही तो हजार जन्म में आनंद मिल जायेगा। क्योंकि भगवान ही आनंद है। ❛अवश्य पढ़े क्या राम और कृष्ण एक ही हैं?❜

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