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भगवान से हमारा (जीव या आत्मा का) चार सम्बन्ध है।

भगवान से हमारा सम्बन्ध है?
गीता ९.१८ "गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।" अर्थात भगवान हमारे सबकुछ है। "त्वमेव माता च पिता त्वमेव...त्वमेव सर्वम् मम देव देव ॥" अर्थात भगवान ही हमारे सब कुछ है। सम्बन्ध का अर्थ, भगवान या संसार कौन हमारा सम्बन्धी है? इस लेख में हमने बताया कि हमारा सम्बन्ध केवल भगवान से ही है।

भगवान से हमारा चार सम्बन्ध

१. साजात्य सम्बन्ध
२. सख्य सम्बन्ध
३. सादेश्य सम्बन्ध
४. सायुज्य सम्बन्ध
यह चारों सम्बन्ध भगवान और जीव का गहरे-गहरे सम्बन्ध है।

साजात्य सम्बन्ध

साजात्य सम्बन्ध मतलब एक जाति। तो भगवान और आत्मा (हम) एक जाति के हैं। क्यों? इसलिए क्योंकि भगवान भी चेतन और हम (आत्मा) भी चेतन। भगवान हमारा अंशी या ऐसा कहे हम (आत्मा) उसके अंश।

सख्य सम्बन्ध

भगवान हमारा सखा है। क्यों? इसलिए क्योंकि एक सखा सदा हमारे साथ रहता है और हमारी मदद करता है। वैसे ही भगवान सदा हमारे साथ रहते है। हम जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ भगवान साथ रहते है।बृहदारण्यकोपनिषद् ४.३.३५ 'भगवान हमारे साथ जाते है जहाँ-जहाँ यह आत्मा जाती है।' हम मरने के बाद कुत्ते-गधे बने तो भगवान भी हमारे साथ-साथ आया, साथ रहा। और हमको (आत्मा को) सदा शक्ति देता है जीवित रहनेका। हमारे इन्द्रिय मन बुद्धि मे हमारी तत् तत् कर्म करने की शक्ति देते है भगवान। आँख कान मरने के बाद भी रहते हैं। परन्तु यह भगवान की शक्ति पा कर ये इन्द्रियाँ ये मन ये बुद्धि वर्क करते हैं। भगवत १०.१३.५५ में भी यही कहा कि भगवान इन्द्रियाँ मन बुद्धि में शक्ति देते हैं।

सादेश्य सम्बन्ध

सादेश्य सम्बन्ध माने, हमारे ह्रदय में एक ही स्थान पर हम (जीव/आत्मा) और हमारा पालक भगवान (हमरे पिता) दोनों एक स्थान पर रहते है। वेद कहता है श्वेताश्वतरोपनिषद ४.६ और ऋग्वेद १.१६४.२० "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते" अर्थात दो पक्षी सुंदर पंखों वाले, साथ-साथ जुड़े हुए, एक दूसरे के सखा हैं। यह आत्मा और परमात्मा ये दो पक्षी है।

सायुज्य सम्बन्ध

"य आत्मनि तिष्ठति" हम उसी के भीतर रहते है। सुबालोपनिषत्य ७.१ "स्याक्षरं शरीरं" हम भगवान के शरीर है, भगवान हमारी आत्मा है। जैसे हम शरीर की आत्मा है, ऐसे हम भगवान की शरीर है और भगवान हमारी आत्मा है। मोटी बात से कहे तो, आत्मा (हम) की आत्मा (भगवान) है जीने हम परमात्मा कहते है। आत्मा की आत्मा परमात्मा। भगवत १०.१४.५५ इसमें कहा गया कि कृष्ण हमारी आत्मा है।
ये जो ४ सम्बन्ध बताये आपको यह प्रमुख है। परन्तु वास्तविकता यह है की भगवान और हमारा (जीव/आत्मा) का भगवान से अनंत सम्बन्ध है। उन सम्बन्ध को गिनना संभव नहीं हैं।

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