आत्मा और भगवान में भेद है या अभेद है या दोनों है?

आत्मा और भगवान में अभेद?
सर्व प्रथम यह समझ लीजिये कि शक्ति और शक्तिमान में भेद भी है अभेद भी है। इसीलिए वेद में दोनों प्रकार के मंत्र है। 'जीव-आत्मा और भगवान में भेद है' ये भी लिखा है, और 'जीव-आत्मा और भगवान में भेद नहीं है' ये भी लिखा है। इसलिए बहुत से अपने को ज्ञानी मानने वाले आचार्य लोग ऐसे है जिन्होंने लिखा है "भेद ही नहीं है" यानि जीव (आत्मा) और भगवान एक है। और कुछ आचार्य ने लिखा है कि जीव (आत्मा) और भगवान से भेद ही है।
देखिये दोनों लोग ही शब्द लगा रहे है। एक कहता है भेद ही है और दूसरा कहता है अभेद ही है। ये दोनों भेले है। और आपस में लड़ते है। इसी के कारण इतिहास में भी लड़िया हुए है और आगे भी होगी।
अस्तु, जो इस लड़ाई से बचना चाहते है, वो समझ ले की दोनों बात सही हैं। भेद भी है और अभेद भी है। शक्ति से शक्तिमान में अभेद है। ये बात आप लोग जानते ही है। कैसे जानते है? देखिये, आग है। हाँ! आग की शक्ति क्या है? जलाना, प्रकाश करना। हाँ! तो कोई आग की शक्ति को आग से अलग कर सकता है? जलाने को अलग कर दे और आग बची रहे ऐसा कोई कर नहीं सकता। क्योंकि फिर आग ही नहीं रहेंगी वो। तो शक्ति शक्तिमान से अलग हो ही नहीं सकता।
तो कुछ विषयो में जीवात्म और परमात्मा (भगवान) में अभेद है। जैसे दोनों चेतन है। एक वेद मंत्र है, बड़ा सुन्दर श्वेताश्वतरोपनिषद ४.६ ये मंत्र कह रहा है " २ व्यक्तित्व है अलग अलग। एक का नाम जीव या आत्मा और एक का नाम ब्रह्म (भगवान) " और दोनों की जाती एक है। क्या है जाती? दोनों चेतन है। और जो तीसरी चीज है माया वो चेतन नहीं है, वो जड़ है, जैसे एक तौलिया।
तो आत्मा और परमात्मा (भगवान) में भेद नहीं है, ये भी सही है, और अभेद है ये भी सही। इसीलिए वेदों में लिखा है कि आत्मा भगवान है। और ये भी लिख दिया है कि आत्मा और भगवान में बहुत अंतर है। वेद और वेदांत में आत्मा और परमात्मा में भेद और अभेद दोनों के मंत्र व सूत्र है।

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