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वेद - भगवान के प्रमुख आठ गुण कौन से हैं?

भगवान के आठ गुण कौन से हैं?
छान्दोग्योपनिषद् ८.१.५ "आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो" इस मंत्र में भगवान के प्रमुख ८ गुण बताये गए हैं।

भगवान के प्रमुख आठ गुण हैं

१. अपहतपाप्मा

यानी धर्म अधर्म दोनों भगवान को छू नहीं सकती। भगवान कुछ करे भी तो वो धर्म नहीं कहलाता। क्योंकि भगवान धर्म अधर्म से परे है। धर्म अधर्म माया बाध्य जीव पर लागु होता है। जो माया से परे है उन पर धर्म अधर्म दोनों ही नहीं छू सकता।

२. विजरो

भगवान को बुढ़ापा नहीं होता। लीला में भगवान बूढ़े बन जाते है, परन्तु भगवान बूढ़े नहीं होते। जैसे एक २५ वर्ष का अभिनेता, बूढ़े व्यक्ति की भूमिका करता है, लेकिन वास्तव में वो २५ वर्ष का है। ऐसे ही लीला में भगवान बूढ़े व्यक्ति बन जाते है। लेकिन उनका रूप सदा १६ वर्ष के बच्चे जैसी होती है। १६ वर्ष के आगे भगवान की उम्र आगे नहीं बढ़ती।

३. विमृत्यु

भगवान की मृत्यु नहीं होती। जब १६ वर्ष के आगे उम्र बढ़ती नहीं तो मृत्यु का तो सवाल ही नहीं बचता।

४. र्विशोको

भगवान शोक रहित है। भगवान के सब जीव प्रलय में महोदर में चले जाते है। परन्तु भगवान हँसता रहता है। भगवान किसी बात का शोक नहीं मनाते।

५. विजिघत्सो

भगवान को भूख नहीं लगती। लीला में भक्तों के प्रेम के कारण भगवान रोते गाते नाचते है माखन खाने के लिए। लीला में ये सब कुछ होता है। परन्तु भगवान भूख नहीं लगती। हम लोगों को भूख लगती है शरीर चलने के लिए। परन्तु भगवान को हम लोगों की तरह भूख नहीं लगती।

६. अपिपासः

भगवान को प्यास भी नहीं लगती।

७. सत्यकामः

भगवान सत्य काम है। जो कामना की वो पूरी होगी।

८. सत्यसंकल्पो

सत्य संकल्प है भगवान। ये विरोधी गुण भगवान में है। सत्य संकल्प मने भगवान ने जो सोचेंगे वो हो जाएगी।
ध्यान दें जैसे एक गुलाब में दो विरोधी गुण है, अच्छी सुगंध और काटे। ऐसे ही भगवान भी दो विरोधी गुण है। एक तरफ तो वेदों में कहा जाता है कि भगवान इच्छा नहीं करते और दूसरी तरफ वही ❛वेद❜ कहता है कि भगवान इच्छा करते हैं। ये दोनों ❛वेद❜ मन्त्र आपको पढ़ने को मिलेंगे। इसलिए भगवान में २ विरोधी गुण हैं। वैसे तो भागवत १.१८.१४ ‘नान्तं गुणानामगुणस्य जग्मुः।’ अनंत गुण हैं, अनंत नाम हैं। परन्तु यह आठ गुण उनमें से प्रमुख है।

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