× Subscribe! to our YouTube channel

वेद, भागवत - धर्म अधर्म क्या है?

धर्म का शब्द अर्थ

धर्म का शाब्दिक अर्थ

धर्म एक संस्कृत शब्द है। संस्कृत में (धातु) धा + ड (विशेषण) से इसका अर्थ है "धारण करना" अतएव जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़े धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है?

धर्म अधर्म - वेद अनुसार

भागवत ६.१.४० में लिखा है कि जो वेद में कहा गया है ये करो ये करो वो धर्म है और जो कहा गया कि ये न करो ये न करो उसका नाम अधर्म। जैसे वेद ने कहा तैत्तिरीयोपनिषत् १.११ "सत्यं वद । धर्मं चर ।" अर्थात् सत्य बोलों वर्णाश्रम धर्म का पालन करो - ये धर्म है। अधर्म क्या है? इसका उल्टा! झूठ न बोलो पापा मत करो। इसी को वेद में कहते है विधि और निषेध। विधि मने ये करो ये करो। निषेध मानें ये न करो। यही है धर्म और अधर्म।
तो जो वेद में लिखा है! इसी का नाम धर्म अधर्म। ८०,००० कुल वेद की ऋचाएं है अर्थात् वेद मंत्र है धर्म अधर्म की। इनको पढ़ना समझना, इस कलयुग वाले मनुष्य की बुद्धि के लिए असंभव सा है। भागवत ११.२७.६ में भगवान कृष्ण उद्धव से कह रहे है कि "कर्म काण्ड (कर्म धर्म) का अंत नहीं है उद्धव।" भागवत ६.३.१९ वेदव्यास जी कह रहे है कि "कर्म-धर्म को कोई नहीं जान सकता भले ही वो ऋषि मुनि हो या देवता हो क्योंकि कर्म-धर्म भगवान का स्वरूप है।"
भागवत ११.२१ .१५ में ६ नियम है बताये गए है धर्म में। उनका पालन कोई करे तो वो धर्म का पालन करने वाला माना जायेगा और धर्मी कहलायेगा।। जैसे यज्ञ करना वेद का प्रमुख धर्म है। वेदों में यज्ञ को प्रमुख धर्म बताया है। तो यज्ञ में छह शर्ते है। इन छह नियम को कोई पालन ठीक ठीक करें तो उसे यश, मान-सम्मान, कीर्ति धन की प्राप्ति होगी और मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा। अर्थात् धर्म का पालन पुण्य होता है। जितना पुण्य कर्म धर्म हमने किया उतने देर स्वर्ग में रहना होता है। भागवत ११.१०.२६ "जब तक पुण्य है, तब तक स्वर्ग में रहेगा। पुण्य समाप्त होते ही स्वर्ग से नर्क या तो मृत्युलोक भेज दिया जाता है।" मुण्डकोपनिषद १.२.१० में कहा कि स्वर्ग के बाद हीन (निमन) शरीर मिलता है।

You Might Also Like

सबसे बड़े भगवान कौन है, राम कृष्ण शंकर या विष्णु?

क्या राम और कृष्ण एक ही हैं?

राजा नृग को कर्म-धर्म का फलस्वरूप गिरगिट बनना पड़ा।

गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है?

धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है?

वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है।

कर्म-धर्म का पालन करने का फल क्या है?