× Subscribe! to our YouTube channel

कर्म-धर्म का पालन करने का फल क्या है?

धर्म का फल
वेद कहता है मुण्डकोपनिषद १.२.७ "कर्म-धर्म को कोई विधिवत भी पालन करेगा, तो उसका फल जो मिलेगा वो नश्वर (नाश होनेवाला) है।" जैसे एक बड़ा कमजोर पुल है, जिसके ऊपर पैर रखा और गिर गया और गया पाताल में। १८ प्रकार के यज्ञ होते है, सबका यही है, सब नश्वर (नाश होनेवाला) है। मुण्डकोपनिषद १.२.८ इस मंत्र का भवार्थ यह है कि "कर्म धर्म का पालन करने वाला ८४ लाख के शरीर में घूमता रहता है। न तो उसे मोछ मिलेगा, न भगवान मिलेंगे, न आनंद मिलेगा, न तो दुःख जायेगा।"
मुण्डकोपनिषद १.२.९ "जो लोग अपने आप को बड़ा बुद्धिमान मानने वाले, जो कर्म-धर्म का पालन करते है ये कुछ के लिए नश्वर (नाश होनेवाला) स्वर्ग में जाते है फिर स्वर्ग से निचे गिरा दिए जाते है अर्थात् मृत्यु लोक या नर्क में भेज दिए जाते है।" जैसे एक प्रधान मंत्री ५ साल तक सत्ता में रहा फिर बाद में इलेक्शन में हार जाने से वो बिचारा एक कोने में चुचाप बैठा रहता है। अब उसको कोई नहीं पूछता।
तो! यह तो काम से काम मनुष्य बना है, काम से काम रोटी दाल खा रहा है। लेकिन जब स्वर्ग वाले निचे आते है उसका क्या हल होता है? मुण्डकोपनिषद १.२.१० "स्वर्ग के बाद वो लोग स्वर्ग से निचे आते है तो कुत्ते बिल्ली गधे की निम्न योनि में या नर्क में डाल दिए जाते है।"
स्वर्ग में किसी को भूख प्यास नहीं लगती, वो जो चाहे है वैसे ही तुरंत पूरी हो जाती है जो उनके लोक का सामान है। स्वर्ग में रहने वाले लोगों के शरीर से खुशबू निकलती है, उनकी पालक नहीं भजति। लेकिन द्वेष काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष एवं भय है अर्थात् माया है। अपने से आगे वाले स्वर्ग लोक (११ प्रकार के लोक) के सुख को देख कर जलन है।
तो कर्म-धर्म का ये फल है कि कठोपनिषद् १.१.२६ "थोड़े दिन को स्वर्ग मिलता है वहाँ भी माया का आधिपत्य (कब्ज़ा) है, तो क्यों उसके लिए प्रयत्न (कोशिश) करते हो, मनुष्यों।" प्रश्नोपनिषद् ३.७ "अगर पुण्य करोगे धर्म का पालन करोगे शुभ कर्म करोगे तो स्वर्ग मिलेंगे। पाप करोगे अधर्म का पालन करोगे अशुभ कर्म करोगे तो नर्क मिलेगा। पुण्य-पाप दोनों करोगे तो मृत्युलोक (पृथ्वी) पर आओगे। इन तीनों लोक (स्वर्ग, नर्क और मृत्युलोक) में दुःख अशांति माया है।

You Might Also Like

सबसे बड़े भगवान कौन है, राम कृष्ण शंकर या विष्णु?

क्या राम और कृष्ण एक ही हैं?

राजा नृग को कर्म-धर्म का फलस्वरूप गिरगिट बनना पड़ा।

गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है?

धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है?

वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है।

क्या प्रारब्ध (भाग्य) अनुसार ही हमारे कर्म होते हैं? कर्म के प्रकार।