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कामना क्या है, उसके प्रकार, कहाँ रहती है?

कामना वेदों के अनुसार।

कामना कुल पाँच प्रकार की होती है?

  1. देखने की कामना।
  2. सुनने की कामना।
  3. सूंघने की कामना।
  4. रस लेने की कामना।
  5. स्पर्श करने की कामना।
ये पाँच ज्ञान इन्द्रयों के कामना का नाम कामना और इन पाँचो से संबाद है मन, जो इनका शासक है। मन का एक स्वरूप है बुद्धि। अनंत जन्म बीत गए इन पाँचो कामनाओ को पूरा (तृप्त) करने में। हम लोग अनंत बार स्वर्ग गए, मृतुलोक गए, नर्क गए, किन्तु ये कामनाये बढ़ती गयी। वही रुकी है, ऐसा भी नहीं। जितना इनको (कामनाको) सामान दिया जाता है, ये उतनी ही बढ़ती है। जैसे अग्नि में जितना घी पड़ेगा, उतनी ही आग बढ़ती जाएगी। ईश्वरी कामना जल है। उससे आग बुझती है और संसारी कामना घी है उससे आग बढ़ती है। १ लाख मिला! १ करोड़ की कामना। १ करोड़ मिला तो १ अरब की कामना। एक इंद्रिय की कामना के मारे जीव परेशान है, कभी तृप्त नहीं हो सका! ना हो सकेगा। फिर पाँच-पाँच इन्द्रियाँ है।
भागवत में बड़ा सुन्दर निरूपण किया है। एक पति (आत्मा) है, उसकी पाँच पत्नियाँ (इन्द्रियाँ) है। ये पाँचो पत्नियाँ अपनी-अपनी ओर खींच रही है। एक कहती है हमारी सुनो, दूसरी कहती है हमारी सूनो तीसरी कहती है हमारी सुनो। पाँच ओर पाँचो खींच रही है। ये पाँचो सौते देहपति जीव को परेशान कर रही है। एक ही को ले लो आँख! आँख क्या चाहती है? देखना। क्यों? देखने से आनंद मिलेगा। हममें से बहुत लोग है जिनको देखने की बहुत इच्छा है। हमने मुम्बई नहीं देखा, कलकाता, वाराणशी, दिल्ली, आगरा नही देखा, ये गाँव के लोग सोचते है। जिन्होंने देखा है! यार इनलैंड जाना चाहिए, कनाडा, लंदन, कनाडा, अमेरिका जाना चाहिए। ये लो और आगे बीमारी बढ़ गई।
कितना देखोगे? तुमारा जीवन, शक्ति, समय कितना है की तुम ये सब देखोगे। अरे कितने तो मर गए पहाड़ चढ़ने में, फिर भी हम देखेंगे ये हमारी जींद है। और फिर ये पृथ्वी है कितनी है! ७९१३ मील। हम ये ही नहीं देख सकते। इस पृथ्वी के आगे इतना बड़ा आकाश-गंगा है, आकाश-गंगा से सूरज तक प्रकाश आने में २५ हजार वर्ष लगता है, ये सूर्य-मंडल आकाश गंगा का ५ आरब ५१ करोड़ एक चाकर लगता है, और उसके आगे इतना बड़ा ब्रह्माण्ड है। कितना देखोगे। अरे चलो आपकी उम्र अनंत काल के लिए बना भी दी जाये। तो क्या करोगे? घूमते रहो एक गृह से दूसरे गृह। अगर कामना पूरी हो जाये, तो चलो यही किया जाये।
लेकिन! अनंत काल तक देखने पर भी, कामना की पूर्ति नहीं हो सकती, ये कामना और बढ़ती जायेगी। "ब्राह्मण पदम् याचते" स्वर्ग सम्राट इंद्र ब्रह्मा का पद की कामना लगा के बैठा है। ऐसे ही सुनने की, सूंघने की, रस लेने की, स्पर्श करने की कामना आपने आप-आप लोग लगा लेना।

कामना कहाँ रहती है?

कामनाये केवल मन में रहती है। इन्द्रियाँ एक साधन मात्र है। जोभी हमको महसूस होता है। सबसे पहले मन को होता है। जब मन को महसूस होता है तो वो भाव इन्द्रियों से प्रतक्ष दिखाए पड़ती है। जैसे भीतर सुख मिला तो आँख खिलगयी। आँख खिलगयी फिर सुख मिला ऐसा नहीं होता। आँख देखती है, क्या देखती है, ये नही देखती की क्या देखा। मन आता है अब, मन उस का चिंतन करता है, की ये स्त्री है या पुरुष। निर्णय के लिए फिर बुद्धि आया, बुद्धि फैसला दिया की ये पुरुष है।
आपका कान भी नहीं निर्णय करता है। आप सो रहे है, और बगल में बीबी फ़ोन पर बात कर रही है। आप को कुछ नहीं सुनाई पड़ रहा है। तो ये मन में प्रत्येक इन्द्रियाँ होती है। जब आप लोग सपना देखते है, तब आप को एहसास होता है, देखने का सुनने का बोलने काभी होता है, यहाँ तक की स्पर्श का भी एहसास होता है। आत्मा और इन्द्रियाँ ये अकर्ता है। केवल मन ही एक मात्र करता है, जो कुछ भी करना हो।
ये कामनाओ की बीमारी हम सब में क्यों है? और सब की अलग-अलग कामना क्यों है? यह जानने के लिए अवश्य पढ़े ❛सबकी कामना अलग-अलग क्यों है?❜ और ❛वेद - भगवान के प्रमुख आठ गुण कौन से हैं?❜

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