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माया और योग माया

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माया और योग माया में क्या अंतर है? सबसे पहले यह समझ लीजिए कि माया और योगमाया यह दोनों भगवान की शक्ति है। जैसा की हम जानते हैं कि शक्ति और शक्तिमान से पृथक नहीं हो सकती। उदाहरण से समझिए आग और आग में जलाने की शक्ति। आग में जलाने की शक्ति होती है। तो आग को अलग कर दो और जलाने की शक्ति बची रहे ऐसा तो हो नहीं सकता। इसी प्रकार माया और योग माया दोनों भगवान की शक्ति है। योग माया शक्ति क्या है? योग माया भगवान की अंतरंग शक्ति है। यह भगवान की अपनी शक्ति है। भगवान के जितने भी कार्य होते हैं वह योग माया से होते हैं। जैसे भगवान जो भी लीला करते हैं वह योग माया के द्वारा करते हैं। भगवान जो कुछ भी सोचते हैं वह योग माया तुरंत उस चीज को कर देती है। जैसे कि आपने सुना होगा कि कृष्ण जब जन्म लिए तो द्वारपा सो गए, द्वार अपने आप खुल गए, यमुना ने मार्ग दे दिया, यह सब योग माया से होता है। योग माया की पहचान। जब भी भगवान की कोई चीज या कार्य असंभव हो और वह संभव हो रही है। तो आप समझ लीजिये की यह योग माया के द्वारा हुआ है। जैसे वेदों ने कहा कि भगवान स्वतंत्र हैं वह किसी के अधीन नहीं है। और वह यशोदा मैया के डंडे से ड…

क्यों वेदव्यास जी ने श्रीमद्भागवत पुराण लिखा? भागवत पुराण लिखने की कथा।

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वेदव्यास जी ने समस्त पुराण, वेदांत और वेदों को विभाजन करने के बाद श्रीमद्भागवतपुराण लिखा। सबसे पहले वेदव्यास जी ने १ लाख श्लोक का महाभारत फिर ७०० श्लोक की गीता लिखा फिर ५५५ सूत्रों का ब्रह्मसूत्र लिखा फिर १७ पुराण लिखा। फिर भी परेशान थे, अशांत थे। श्रीमद्भागवतपुराणम् माहात्म्य २.७२ - वेदान्तवेदसुस्नाते गीताया अपि कर्तरि ।
परितापवति व्यासे मुह्यत्यज्ञानसागरे ॥ ७२ ॥ भावार्थ :- पूर्व काल में जिस समय वेद वेदान्त के पारगामी और गीता की भी रचना करने वाले भगवान् व्यासदेव खिन्न होकर अज्ञानसमुद्रमें गोते खा रहे थे। अर्थात् व्यास जी यह तमाम ग्रंथ लिख कर के भी परेशान है, सोच रहे है कि क्या बात है? शांति नहीं मिल रही है इतने ग्रंथ लिखे मैंने? लगभग चार लाख श्लोक लिखे मैंने, ओह! ऐसा लगता है भागवत १.४.३१ - प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ।
तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ॥ १.४.३१ ॥ भावार्थ :- अवश्य ही अब तक मैंने भगवान् को प्राप्त कराने वाले धर्मों (लीलाओं) का प्रायः निरूपण नहीं किया है। वे ही धर्म (लीला) परमहंसों को प्रिय हैं और वे ही भगवान् को भी प्रिय हैं (हो-न-हो मेरी अपूर्णता …

क्या है वास्तविक वेदान्त का भाष्य? - वेदव्यास द्वारा

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हमारे हिन्दू धर्म में लगभग सभी जगतगुरुओं ने वेदांत पर भाष्य लिखा है और जितने भी ज्ञानी जान है उन्होंने भी वेदान्त पर भाष्य लिखा है। लेकिन वर्तमान काल के मूल जगतगुरु श्रीकृपालु जी महाराज और चैतन्य महाप्रभु ने कहा (चैतन्य चरितामृत मध्य २५.१४३-१४४) कि ये आश्चर्य की बात है जब वेदव्यास द्वारा रचित गरुण पुराण में, वेदव्यास ने लिखा की श्रीमद्भागवतपुराण वेदांत का भाष्य है। तो फिर इन लोगों ने क्यों भाष्य लिखा? ये आश्चर्य है। गरुण पुराण १०.३९४-३९५ में वेदव्यास जी ने कहा है - अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां, भारतार्थ विनिर्णयः।
गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थ परिबृंहणः ॥
पुराणानां साररूपः साक्षाद् भगवतोदितः।
द्वादशस्कन्धसंयुक्तः शतविच्छेदसंयुतः ॥
ग्रन्थाऽष्टादशसाहस्रः श्रीमद्भागवताभिधः॥ भावार्थ :- यह श्रीमद्भागवत पुराण ब्रह्मसूत्र और समस्त उपनिषदों का तात्पर्य है तथा यह अष्टादश संज्ञक ग्रन्थ गायत्री का भाष्यस्वरूप है। अतएव वेदव्यास जी कहते है कि हमने जो वेदान्त (ब्रह्मसूत्र) लिखा है उसका अर्थ हम जानते है। आप लोग बाद में कोई भाष्य मत लिखना। क्योंकि वास्तविक भाष्य हम जानते है और हम लिख दे रहे है - १८००० श…

संध्या क्यों करते हो? जब भगवान् का स्मरण करने से सब पाप नष्ट हो जाता है।

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जितने भी कर्मकांड करने वाले संसार में पंडित हैं। हम उनसे एक बात पूछना चाहते हैं कि जब वह कर्मकांड प्रारंभ करते हैं, चाहे वह सत्यनारायण की कथा हो, चाहे वह बड़े-बड़े यज्ञ हो, शादी ब्याह हो कुछ भी हो। पहले वे पंडित यजमान से कहते हैं - 'हाथ में पानी लेकर और अपने ऊपर छिड़को' उसी वक्त पंडित जी पद्म पुराण का श्लोक बोलते हैं - ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ भावार्थ:- चाहे अपवित्र हो (कितना भी गंदा हो चाहे वो पाखाना लपेटे हो) या चाहे पवित्र हो (गंगा स्नान करके आया हो) या किसी भी अवस्था में हो, जो पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) भगवान् (श्री कृष्ण, राम, शिव आदि किसी भी भगवान्) का स्मरण कर ले (मन से) तो अन्दर (अंतःकरण जिसे मन भी कहते है) और बाहर (शरीर) से पवित्र (शुद्ध) हो जाये। अब संध्या करने वाले पंडित जी इससे आगे संध्या क्यों करते हैं? अरे जब भगवान् का स्मरण करने से अंदर-बाहर दोनों की शुद्धि हो गई तो संध्या क्यों करते हो। कोई भी साधारण पंडित यजमान से यह नहीं कहते कि भगवान्का स्मरण करो। सब बस श्लोक पढ़ने में लगे है। इसके बाद पंडित ल…

क्या भगवान श्री राम का शरीर प्रकृति मनुष्य का शरीर था या दिव्य था?

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भगवान श्रीराम का शरीर प्राकृत शरीर नहीं था। वह प्राकृत मानव की तरह नहीं बने थे। इस का प्रमाण वाल्मीकि रामायण था रामचरितमानस में मिलता है। अतः हम उन प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध होता है कि भगवान राम का शरीर हमारी तरह पंचमहाभूत (जल तेज वायु अग्नि और आकाश) का बना हुआ नहीं है। राम जी का शरीर दिव्य है। इस बारे में सर्वप्रथम वाल्मीकि जी ने लिखा वाल्मीकि रामायण - उत्तरकाण्ड सर्ग ९०६ अदृश्यं सर्वमनुजैः सशरीरं महाबलम्।
प्रगृह्य लक्ष्मणं शक्रो दिवं सम्प्रविवेश ह॥७.१०६.१७॥ भावार्थ:- महाबली लक्ष्मण अपने शरीर के साथ ही सब मनुष्यो की द्रष्टि से ओझल हो गये। उस समय देवराज इंद्र उन्हें साथ लेकर स्वर्ग में चले गये। ७.१०६.१७- यह श्लोक में वाल्मीकि जी कहते है कि लक्ष्मण अपने शरीर के साथ ही सब मनुष्यो की द्रष्टि से ओझल हो गये। अतएव लक्ष्मण जी मरे नहीं है वो शरीर सहित स्वर्ग में चले गये। स्वर्ग में कोई भी व्यक्ति मनुष्य शरीर के साथ नहीं जा सकता। उसको दिव्य शरीर चाहिए तभी वो स्वर्ग जा सकता है। अतएव यहाँ पर यह भी सिध्य हो जाता है की लक्ष्मण जी मानव (मनुष्य) की भाती दीखते थे परन्तु वो दिव्य शरीर वाले है। पिता…

भगवान श्री राम जी की मृत्यु कैसे हुई? राम कथा

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भगवान श्री राम की मृत्यु कैसे हुई? मृत्यु का अर्थ है समाप्ति। क्योंकि भगवान और आत्मा की मृत्यु नहीं होती। अतएव यह प्रश्न करना गलत हो गया की 'श्री राम की मृत्यु कैसे हुई?' लेकिन यह प्रश्न मन में जरूर उठता है की भगवान राम यह संसार से कब और कैसे अलक्षित (आँखों से ओझल) हो गए या भगवान श्री राम ने अयोध्या छोड़ कर वैकुण्ठ लोक कैसे गये या भगवान राम ने प्रस्थान कैसे किया? तो इस बारे में वाल्मीकि रामायण में विस्तार पूर्वक वर्णित है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार यमराज ऋषि का भेष बनाकर राम से एकांत में वार्ता करने की इच्छा प्रकट की और यह शर्त भी रखा की जो भी व्यक्ति उनकी (राम और ऋषी के बिच की) बात सुनेगा उसे मृत्यु दंड दिया जाये। किन्तु लक्ष्मण जी दुर्वासा जी के श्राप के भय से ऋषि (यमराज) के शर्त को भंग कर श्री राम के पास महर्षि दुर्वासा की सुचना दी। इसलिए राम ने शर्त के अनुसार लक्ष्मण जी का त्याग कर दिया। विस्तार पूर्वक पढ़े भगवान लक्ष्मण जी की मृत्यु कैसे हुई? श्री राम की मृत्यु कैसे हुई? वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग १०७ से सर्ग ११० तक विस्तार से राम की मृत्यु (प्रस्थान) के बा…

भगवान लक्ष्मण जी की मृत्यु कैसे हुई? राम कथा

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लक्ष्मण जी की मृत्यु कैसे हुई? मृत्यु का अर्थ है समाप्ति। क्योंकि भगवान और आत्मा की मृत्यु नहीं होती। अतएव यह प्रश्न करना गलत हो गया की 'लक्ष्मण जी की मृत्यु कैसे हुई?' लेकिन यह प्रश्न मन में जरूर उठता है की लक्ष्मण जी यह संसार से कैसे अलक्षित (आँखों से ओझल) हो गए या लक्ष्मण जी ने अयोध्या छोड़ कर वैकुण्ठ लोक कैसे गये या लक्ष्मण जी ने प्रस्थान कैसे किया? तो इस बारे में वाल्मीकि जी ने रामायण में विस्तार पूर्वक बताया है। लक्ष्मण की मृत्यु कैसे हुई? वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार यमराज ब्रह्मा जी का संदेश लेकर यमराज एक ऋषि का भेष बनाकर राम से एकांत में वार्ता करने की इच्छा प्रकट की और यह शर्त भी रखा की जो भी व्यक्ति उनकी (राम और ऋषी के बिच की) बात सुनेगा उसे मृत्यु दंड दिया जाये। इस शर्त को राम स्वीकार कर ऋषि के साथ एकांत कमरे में वार्तालाप करने लगे और लक्ष्मण को आज्ञा दी की द्वार से कोई आने न पाये। उसी समय महर्षि दुर्वासा राज महल में आये और लक्ष्मण से कहा कि श्री राम से कहो की महर्षि दुर्वासा उनसे भेठ करना चाहते है। लक्ष्मण जी ने अनेक बार उनको कुछ देर रुकने को कहा। परन्तु महर्…

राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न विष्णु ही थे - रामायण प्रमाण

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राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न यह चारों भगवान विष्णु ही थे यह बात वाल्मीकि रामायण द्वारा प्रमाणित भी है। वाल्मीकि रामायण बाल काण्ड सर्ग १५ में विस्तारपूर्वक से कहा गया है कि देवता लोग रावण के अत्याचार से परेशान होकर ब्रह्मा जी के पास जाते है और रावण के अत्याचार के बारे में बताते हैं। फिर ब्रह्मा जी सोच करके कहते हैं कि 'हमें रावण को मारने का उपाय मिल गया है, उसने वर मांगते समय यह कहा था कि मैं गंधर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसों के हाथों से नहीं मारा जाऊँ। मैंने भी "तथास्तु" कह कर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। लेकिन मनुष्यों को वह तुच्छ समझता था। इसलिए उसने वर में मनुष्य के हाथों ना मारे जाने का वर नहीं माँगा। इसलिए मनुष्य के हाथ से ही उसका वध होगा, मनुष्य के सिवा कोई दूसरा उसकी मृत्यु का कारण नहीं है।' ब्रह्मा जी का कथन सुन देवता व ऋषि गण प्रसन्न हुए। एतस्मिन् अनन्तरे विष्णुः उपयातो महाद्युतिः।
श्ङ्ख चक्र गदा पाणिः पीत वासा जगत्पतिः॥१-१५-१६॥
वैनतेयम् समारूह्य भास्कर तोयदम् यथा।
तप्त हाटक केयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः॥१-१५-१७॥
ब्रह्मणा च समागम्य तत्र तस्थौ समाहितः। भाव…

भगवान श्री राम जी का जन्म कैसे हुआ? रामचरितमानस अनुसार राम जन्म कथा

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भगवान राम ने कैसे अवतार लिया अथवा कैसे जन्म लिया? कुछ लोग ऐसा सोचते है कि भगवान श्री रामचंद्र हमारे जैसे माँ के पेट से पैदा हुए और हमारे जैसे मानव (मनुष्य) थे। परन्तु वास्तविकता यह नहीं है। जन्म शब्द बनता है जनि धातु से, और जनि का अर्थ है प्रादुर्भाव। प्रादुर्भाव माने प्रकट होना या दोबारा नये सिरे से अस्तित्व में आना। जैसे हम आत्मा माँ के पेट में प्रकट होते है उसी को हम जन्म कहते है। आत्मा किसी दिन नहीं बनती है। आत्मा नित्य है। अस्तु! हम (आत्मा) माँ के पेट में प्रकट होते है। तो प्रकट होने को जन्म लेना कहते है। भगवान श्री राम ने जन्म कैसे लिया? भगवान श्री राम ने जन्म कैसे लिया इस बारे में तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में बहुत ही सुन्दर निरूपण किया है, हम वही राम जन्म की कथा को आपको बतायेगें। तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड में लिखते है- भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥1॥ भावार्थ:- दीनों पर दया करने वाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट ह…