Posts

× Subscribe! to our YouTube channel

Featured post

संध्या क्यों करते हो? जब भगवान् का स्मरण करने से सब पाप नष्ट हो जाता है।

Image
जितने भी कर्मकांड करने वाले संसार में पंडित हैं। हम उनसे एक बात पूछना चाहते हैं कि जब वह कर्मकांड प्रारंभ करते हैं, चाहे वह सत्यनारायण की कथा हो, चाहे वह बड़े-बड़े यज्ञ हो, शादी ब्याह हो कुछ भी हो। पहले वे पंडित यजमान से कहते हैं - 'हाथ में पानी लेकर और अपने ऊपर छिड़को' उसी वक्त पंडित जी पद्म पुराण का श्लोक बोलते हैं - ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ भावार्थ:- चाहे अपवित्र हो (कितना भी गंदा हो चाहे वो पाखाना लपेटे हो) या चाहे पवित्र हो (गंगा स्नान करके आया हो) या किसी भी अवस्था में हो, जो पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) भगवान् (श्री कृष्ण, राम, शिव आदि किसी भी भगवान्) का स्मरण कर ले (मन से) तो अन्दर (अंतःकरण जिसे मन भी कहते है) और बाहर (शरीर) से पवित्र (शुद्ध) हो जाये। अब संध्या करने वाले पंडित जी इससे आगे संध्या क्यों करते हैं? अरे जब भगवान् का स्मरण करने से अंदर-बाहर दोनों की शुद्धि हो गई तो संध्या क्यों करते हो। कोई भी साधारण पंडित यजमान से यह नहीं कहते कि भगवान्का स्मरण करो। सब बस श्लोक पढ़ने में लगे है। इसके बाद पंडित ल…

भगवान् के माता-पिता कौन हैं? - वेद, गीता, भागवत के अनुसार

Image
हम सभी के माता-पिता होते हैं। प्रत्येक मनुष्य के कोई न कोई माता-पिता तो होते हैं। तो फिर भगवान् के माता-पिता भी होंगे? ऐसे विचित्र प्रश्न वेदों को न जानने वाले व्यक्ति के मन में आते है। आध्यात्मिक लोग जिन्होंने वेद शास्त्र ढंग से नहीं पड़ा वो इसका उत्तर विचित्र ही देते है। वे भोले लोग कहते है कि देखों शास्त्रों में भगवान् से बड़ा भक्त (गुरु, संत) को कहा गया है। जैसे कबीर जी ने कहा 'बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।' अर्थात् भगवान् ने गुरु को नमन करने को कहा।' भगवान् ने कहा भागवत ९.४.६३ 'अहं भक्तपराधीनो' अर्थात् मैं मेरे भक्त के आधीन हूँ। लेकिन, उपर्युक्त प्रमाणों से ये भोले लोग नहीं सिद्ध कर पते कि भगवान् के पिता संत अथवा गुरु है। हाँ! उपर्युक्त दिए प्रमाण से यह जरूर सिद्ध होता है कि जब भक्त भगवत प्राप्ति कर लेता है तो वो भगवान् को अत्यंत प्रिय हो जाता है। इसलिए वे कहते है कि मैं मेरे भक्त के आधीन हूँ। भगवान् के माता-पिता कौन हैं? भगवान् श्रीकृष्ण कहते है गीता १५.७ 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' अर्थात् आत्मा मेरा ही सनातन अंश है। यहाँ पर ध्यान दीजिय…

मन और शरीर पर खाना खाने का क्या प्रभाव पड़ता है? - वेदों के अनुसार

Image
जो हम खाना खाते है, उसका प्रभाव हमारे मन और शरीर पर पड़ता है। चुकी मन पर प्रभाव पड़ता है इसलिए हमारे स्वभाव पर भी पड़ता है। छान्दोग्योपनिषत् ने विस्तारपूर्वक कहा अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो
धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्माꣳसं
योऽणिष्ठस्तन्मनः॥
- छान्दोग्योपनिषत् ६.५.१ भावार्थ :- खाया हुआ अन्न तीन भागों में विभक्त हो जाता है। उसका जो अत्यंत स्थूल भाग होता है वह मल बन जाता है, जो मध्य भाग है वह रस बन जाता है, जो सूक्ष्म भाग है वह मन बन जाता है। अन्नमय हि सौम्ममन:।
- छान्दोग्योपनिषत् ६.५.४ भावार्थ :- मन अन्नमय (अन्न से बना) है। अर्थात् जो भोजन आप खाएंगे उसका प्रभाव मन पर पड़ेगा। इसलिए अन्न की शुद्धता से मन की शुद्धता होती है। आहार का उद्देश्य मन को, स्वादेन्द्रिय को तृप्त करना नहीं है, वरन् उसका जीवन की गतिविधियों से गहरा सम्बन्ध है। जिस व्यक्ति का जैसा भोजन होगा उसका आचरण भी तदनुकूल होगा। आहार शुद्धि की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुये छान्दोग्योपनिषत् में लिखा है - आहार सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा
स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष:
- छान्दोग्योपनिषद्‌ …

शाकाहार या मांसाहार? वेद और गीता में भोजन के बारे में क्या कहा?

Image
विश्व में सभी लोग इस बात पर चर्चा करते है कि शाकाहारी रहना सही है, मांसाहारी रहना सही है या दोनों? वेद क्या कहता है और गीता में कृष्ण ने क्या कहा शाकाहारी और मांसाहारी भोजन के बारे में? त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥
- गीता १७.२ भावार्थ :- श्री कृष्ण ने कहा - देहधारी जीव द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है - सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी। यह संसार भी इन तीन गुण की माया (त्रिगुणात्मक माया) से बना है। अतएव इस संसार में तीन प्रकार के भोजन भी होंगे। आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥
- गीता १७.७ भावार्थ :- श्री कृष्ण ने कहा - यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति जो भोजन पसन्द करता है, वह भी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का होता है। यही बात यज्ञ, तपस्या तथा दान के लिए भी सत्य है। अब उनके भेदों के विषय में सुनो। सात्विक आहार आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
- गीता १७.८ भावार्थ :- श्री कृष्ण ने कहा - जो भोज…

दान कितने प्रकार के होते? किस दान का क्या फल मिलता हैं?

Image
दान के चार प्रकार होते है। अगर सही जगह दान नहीं किया जाये, तो उसका फल नर्क भी हो सकता है। दान मनुष्य को नर्क, मृत्युलोक, स्वर्ग और भगवान् की कृपा प्रदान करा सकता है। दान चार प्रकार के होते है। आप संछेप में दान के दो प्रकार भी कह सकते है, एक तो माया के निमित किया गया दान और दूसरा भगवान् के निमित किया गया दान। लेकिन विसरतार पूर्वक दान के चार प्रकार है। क्योंकि एक तो माया है जिसके ३ गुण है और एक भगवान् है। दान के प्रकार हैं -

१. सात्विक
२. राजस
३. तामस
४. हरि (भगवान्) और हरिजन (संत, महात्मा, महापुरुष, भक्ति जिन्होंने भगवान् के दर्शन कर लिया हो जैसे तुलसीदास, सूरदास, मीरा, तुकाराम इत्यादि) १. सात्विक : - अगर सात्विक व्यक्ति को दान करोगे, तो स्वर्ग मिलेगा। २. राजस :- अगर राजसी व्यक्ति को दान करोगे तो राजसी फल मिलेगा। ३. तामस :- अगर तामसी व्यक्ति को दान करोगे तो नर्क मिलेगा। कयोंकि उस व्यक्ति ने उस पैसे का दुरुपयोग किया तो आप भी उस अपराध में भागीदारी हुए। यह तीनों दान नश्वर है। ४. हरि और हरिजन :- अगर भगवान् के निमित्त दान करोगें तो भगवत कृपा मिलेगी, भगवान् की वस्तु मिलेगीं। यानि दिव्य…

दान का महत्व क्या है? - वेद, भागवत और महाभारत अनुसार।

Image
दान का महत्व वेद अनुसार श्रद्धया देयम्‌। अश्रद्धयाऽदेयम्‌। श्रिया देयम्‌। ह्रिया देयम्‌। भिया देयम्‌। संविदा देयम्‌।
- तैत्तिरीयोपनिषद्, शिक्षावल्ली, एकादशोऽनुवाकः भावार्थ - श्रद्धा से, लज्जा से, भय से भी कोई दान करो तो फल मिलेगा। कुछ लोग भय से दान करते है। जो भय दान करते है वो अपने परमार्थ की चिंता करते है अर्थात् उनको यह भय रहता है कि अगर हम दान नहीं करेगें तो मरने के बाद क्या होगा? इस बारे में वेदव्यास जी ने महाभारत में कहा दान का महत्व महाभारत अनुसार अदतदानात् च भवेत् दरिद्रो दारिद्र्य दोषेण करोति पापम्।
पापप्रभावात् नरकं प्रयाति पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी॥
- महाभारत भावार्थ:- दारिद्र्य दोष से पाप होता है। पाप के प्रभाव से नरक में जाता है; फिर से दरिद्री और फिर से पाप होता है। अर्थात् अगर आपने दान नहीं किया मानव देह में और बल-बच्चों के लिए इकठा कर गये, तो तुम चोर हो। दान का महत्व भागवत अनुसार यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दंडमर्हति ॥
- श्रीमद्भागवत पुराण ७.१४.८ भावार्थ :- मनुष्य को चाहिए कि उतनी ही संपत्ति के स्वामित्व का दावा करें जितन…

ब्रह्मा जी का उपदेश, देवता, दानव और मानव के लिए। - बृहदारण्यकोपनिषद् कथा

Image
बृहदारण्यकोपनिषद् की कथा है जिसमें ब्रह्मा के पास देवता, दानव और मानव तीनों पुत्र गये उपदेश लेने। ब्रह्मा द्वारा देवता को उपदेश। त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति॥१॥
- बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ५, ब्राह्मण २ भावार्थ:- देव, मनुष्य और असुर - इन प्रजापति (ब्रह्मा जी) के तीन पुत्रों ने पिता प्रजापति (ब्रह्माजी) के यहाँ ब्रह्मचर्यवास किया। ब्रह्मचर्यवास कर चुकनेपर देवोंने कहा, ‘आप हमें उपदेश कीजिये।’ प्रजापति ने ‘द’ अक्षर कहा और पूछा ‘समझ गये क्या?’ इस पर उन्होंने कहा, ‘समझ गये, आपने हमसे दमन करो ऐसा कहा है।’ तब प्रजापति ने कहा, ‘ठीक है, तुम समझ गये’ ॥१॥ दमन करो अर्थात् इन्द्रिय निग्रह करो, क्योंकि देवता का स्वभाव से अदान्त (अजितेन्द्रिय) होते है, इसलिए दमनशील बनो। ब्रह्मा द्वारा मनुष्य को उपदेश। अथ हैनं मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज…

क्यों वेदव्यास जी ने श्रीमद्भागवत पुराण लिखा? भागवत पुराण लिखने की कथा।

Image
वेदव्यास जी ने समस्त पुराण, वेदांत और वेदों को विभाजन करने के बाद श्रीमद्भागवतपुराण लिखा। सबसे पहले वेदव्यास जी ने १ लाख श्लोक का महाभारत फिर ७०० श्लोक की गीता लिखा फिर ५५५ सूत्रों का ब्रह्मसूत्र लिखा फिर १७ पुराण लिखा। फिर भी परेशान थे, अशांत थे। श्रीमद्भागवतपुराणम् माहात्म्य २.७२ - वेदान्तवेदसुस्नाते गीताया अपि कर्तरि ।
परितापवति व्यासे मुह्यत्यज्ञानसागरे ॥ ७२ ॥ भावार्थ :- पूर्व काल में जिस समय वेद वेदान्त के पारगामी और गीता की भी रचना करने वाले भगवान् व्यासदेव खिन्न होकर अज्ञानसमुद्रमें गोते खा रहे थे। अर्थात् व्यास जी यह तमाम ग्रंथ लिख कर के भी परेशान है, सोच रहे है कि क्या बात है? शांति नहीं मिल रही है इतने ग्रंथ लिखे मैंने? लगभग चार लाख श्लोक लिखे मैंने, ओह! ऐसा लगता है भागवत १.४.३१ - प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ।
तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ॥ १.४.३१ ॥ भावार्थ :- अवश्य ही अब तक मैंने भगवान् को प्राप्त कराने वाले धर्मों (लीलाओं) का प्रायः निरूपण नहीं किया है। वे ही धर्म (लीला) परमहंसों को प्रिय हैं और वे ही भगवान् को भी प्रिय हैं (हो-न-हो मेरी अपूर्णता …

क्या है वास्तविक वेदान्त का भाष्य? - वेदव्यास द्वारा

Image
हमारे हिन्दू धर्म में लगभग सभी जगतगुरुओं ने वेदांत पर भाष्य लिखा है और जितने भी ज्ञानी जान है उन्होंने भी वेदान्त पर भाष्य लिखा है। लेकिन वर्तमान काल के मूल जगतगुरु श्रीकृपालु जी महाराज और चैतन्य महाप्रभु ने कहा (चैतन्य चरितामृत मध्य २५.१४३-१४४) कि ये आश्चर्य की बात है जब वेदव्यास द्वारा रचित गरुण पुराण में, वेदव्यास ने लिखा की श्रीमद्भागवतपुराण वेदांत का भाष्य है। तो फिर इन लोगों ने क्यों भाष्य लिखा? ये आश्चर्य है। गरुण पुराण १०.३९४-३९५ में वेदव्यास जी ने कहा है - अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां, भारतार्थ विनिर्णयः।
गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थ परिबृंहणः ॥
पुराणानां साररूपः साक्षाद् भगवतोदितः।
द्वादशस्कन्धसंयुक्तः शतविच्छेदसंयुतः ॥
ग्रन्थाऽष्टादशसाहस्रः श्रीमद्भागवताभिधः॥ भावार्थ :- यह श्रीमद्भागवत पुराण ब्रह्मसूत्र और समस्त उपनिषदों का तात्पर्य है तथा यह अष्टादश संज्ञक ग्रन्थ गायत्री का भाष्यस्वरूप है। अतएव वेदव्यास जी कहते है कि हमने जो वेदान्त (ब्रह्मसूत्र) लिखा है उसका अर्थ हम जानते है। आप लोग बाद में कोई भाष्य मत लिखना। क्योंकि वास्तविक भाष्य हम जानते है और हम लिख दे रहे है - १८००० श…