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ब्रह्मा जी का उपदेश, देवता, दानव और मानव के लिए। - बृहदारण्यकोपनिषद् कथा

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बृहदारण्यकोपनिषद् की कथा है जिसमें ब्रह्मा के पास देवता, दानव और मानव तीनों पुत्र गये उपदेश लेने। ब्रह्मा द्वारा देवता को उपदेश। त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति॥१॥
- बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ५, ब्राह्मण २ भावार्थ:- देव, मनुष्य और असुर - इन प्रजापति (ब्रह्मा जी) के तीन पुत्रों ने पिता प्रजापति (ब्रह्माजी) के यहाँ ब्रह्मचर्यवास किया। ब्रह्मचर्यवास कर चुकनेपर देवोंने कहा, ‘आप हमें उपदेश कीजिये।’ प्रजापति ने ‘द’ अक्षर कहा और पूछा ‘समझ गये क्या?’ इस पर उन्होंने कहा, ‘समझ गये, आपने हमसे दमन करो ऐसा कहा है।’ तब प्रजापति ने कहा, ‘ठीक है, तुम समझ गये’ ॥१॥ दमन करो अर्थात् इन्द्रिय निग्रह करो, क्योंकि देवता का स्वभाव से अदान्त (अजितेन्द्रिय) होते है, इसलिए दमनशील बनो। ब्रह्मा द्वारा मनुष्य को उपदेश। अथ हैनं मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज…

कर्मयोग से श्रेष्ठ केवलाभक्ति क्यों है? सूतजी के अनुसार - पद्म पुराण।

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आपने अबतक कर्मयोग क्या है और कैसे किया जाता है? - पद्म पुराण अनुसार। लेख में कर्मयोग के बारे में पढ़ा होगा तथा यह भी ज्ञात हो गया होगा की कर्म योग से श्रेष्ठ भक्ति है। सूतजी ने इसी प्रकरण में आगे ऋषियों से कहते है कि कर्मयोग से श्रेष्ठ केवलाभक्ति (केवल भक्ति) है। केवलाभक्ति की के बारे में सूतजी संकेत देते हुए कहते है कि जिसने श्रीहरि की भक्ति कर ली, उनको कर्म-धर्म का पालन करने की क्या आवश्यकता है। सूतजी कहते है ऋषियों से - रहस्यं तत्र वक्ष्यामि शृणुत द्विजसत्तमाः॥३॥
ये चात्र कथिता धर्मा वर्णाश्रमनिबंधनाः।
हरिभक्तिकलांशांश समाना न हि ते द्विजाः॥४॥
- पद्म पुराण खण्ड ३ (स्वर्गखण्ड) अध्याय ६१ संक्षिप्त भावार्थ:- सूतजी ने कहा - अब इस विषय में आप लोगों को रहस्य की बात बताता हूँ, सुनिये। यहाँ (जो व्यासजी ने बताया) वर्ण और आश्रम से सम्बन्ध रखने वाले जो धर्म बताये गये है, वे सब हरि-भक्ति की एक काल के अंश के भी समानता नहीं कर सकते। (अर्थात् वर्णआश्रम धर्म की बराबरी हरि-भक्ति से नहीं की जा सकती क्योंकि हरि-भक्ति वर्णआश्रम धर्म से श्रेठ है।) हरिभक्तिसुधां पीत्वा उल्लंघ्यो भवति द्विजः।
किं जपैः श्…

कर्मयोग क्या है और कैसे किया जाता है? - पद्म पुराण अनुसार।

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पद्म पुराण ३ (स्वर्गखण्ड) अध्याय ५१ में कर्मयोग के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है। जिसमे सूतजी ने कर्मयोग क्या है, कैसे किया जाता है, जिसके द्वारा आराधना करने पर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते है? इसका उत्तर व्यासजी के माध्यम से बताया है। ऋषय ऊचु-
कर्मयोगः कथं सूत येन चाराधितो हरिः।
प्रसीदति महाभाग वद नो वदतां वर॥१॥
येनासौ भगवानीशः समाराध्यो मुमुक्षुभिः।
तद्वदाखिललोकानां रक्षणं धर्मसंग्रहम्॥२॥
तं कर्मयोगं वद नः सूत मूर्तिमयस्तु यः।
इति शुश्रूषवो विप्रा भवदग्रे व्यवस्थिता॥३॥
- पद्म पुराण ३ (स्वर्गखण्ड) अध्याय ५१ संक्षिप्त भावार्थ:- ऋषियों ने पूछा- सूतजी! कर्मयोग कैसे किया जाता है, जिसके द्वारा आराधना करने पर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते है? महाभाग! आप वक्ताओं में श्रेठ हैं; अतः हमें यह बात बताइये। जिसके द्वारा मुमुछु (मोक्ष की कामना करनेवाला) पुरुष सबके ईश्वर भगवान् श्री हरि की आराधना कर सकें, वह समस्त लोको की रक्षा करने वाला धर्म क्या वस्तु है? उसका वर्णन कीजिये। उसके श्रवण की इच्छा से ब्राह्मण लोग आपके सामने बैठे हैं। सूत उवाच-
एवमेव पुरा पृष्टो व्यासः सत्यवतीसुतः।
ऋषिभिरग्निसंकाशैर्…

भगवान् का नाम लेने की विधि? नाम का जप मन या जीभा से? - रामायण, दोहावली के अनुसार।

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भगवान् का नाम कैसे लेना चाहिए तथा क्या मन से नाम का जप करे यह केवल जीभा से जप करने से ईश्वरीय जगत का फल हमे मिल जायेगा? कुछ लोग रामायण तथा अन्य महापुरुषों के कथनानुसार कहते है कि "राम का नाम किसी भी प्रकार से लेना चाहिए, उसमें चाहे मन का लगाव हो या न हो सब चलेगा।" उदाहरण देते है - भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
- श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भावार्थ:- अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥
- श्रीरामचरितमानस अयोध्याकांड भावार्थ:- जगत जानता है कि उलटा नाम (मरा-मरा) जपते-जपते वाल्मीकिजी ब्रह्म के समान हो गए। राम नाम जपि जीहँ जन भए सुकृत सुखसालि।
- दोहावली भावार्थ:- जीभ से रामनाम का जप करके लोग पुण्यात्मा और परम सुखी हो गये। अबतक के प्रमाणों से यह लगता है कि किसी भी प्रकार से रामनाम लिया जाये अथवा जप किया जाये तो कल्याण होता है। हाँ! यह बात सत्य है कि कल्याण होता है लेकिन परम् कल्याण नहीं होता। अर्थात् कल्याण केवल इतना होता है कि जहा …

हरि नाम संकीर्तन कैसे करना चाहिये? मन या इन्द्रियों से - पुराण और रामायण के अनुसार।

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जैसा की हमने अपने भगवान् के नाम की महिमा - वेद, पुराण और रामायण के अनुसार। लेख में बताया कि भगवान् ने अपने अनेक नामों में अपनी शक्ति भर दी है, नाम संकीर्तन भजन तीर्थों से भी अधिक पावन तीर्थ कहा गया है एवं जिससे जीवों का उद्धार बड़ा सहज में हो जाता है। तो अब यह प्रश्न शेष रह जाता है कि नाम संकीर्तन कैसे करना चाहिए? क्योंकि अगर सही ढंग से कोई कार्य नहीं किया तो उसका फल सही नहीं मिलता। अतएव केवल इन्द्रियों से नाम संकीर्तन हो? मन से नाम संकीर्तन हो? या मन और इन्द्रियों के साथ नाम संकीर्तन हो? केवल इन्द्रियों से नाम संकीर्तन हो? बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि किसी भी प्रकार से भगवान् का नाम लिया जायेगा तो उसका फल भगवान् की कृपा है और ऐसा तुलसीदास जी ने कहा है - भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
- श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भावार्थ:- अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। परन्तु, इस चौपाई को पूरा पढ़ें तो सत्य का बोध हो जायेगा। भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम…

भगवान् के नाम की महिमा - वेद, पुराण और रामायण के अनुसार।

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भगवान् के नाम की महिमा का प्रचार बहुत से संतों ने तथा वेद, पुराण और रामायण तक ने किया है। कुछ लोग ऐसा सोचते है कि केवल कलियुग में ही भगवान् के नाम की महिमा है, शेष ३ युग में बिना नाम के ही सब कुछ मिल जाता था? परन्तु ऐसा बिलकुल नहीं है। जो नियम आज है वो पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। अतएव तुलसीदास जी ने कहा श्रीरामचरितमानस बालकाण्डचहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥ भावार्थ:- (केवल कलियुग की ही बात नहीं है,) चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। भगवान् के नाम की महिमा चारों युगों में है। उदाहरण के तोर पर नारदजी तथा प्रह्लादजी नारायण नारायण किया करते है। वास्तव में सतयुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुग में क्रमशः नारायण, नरसिंह तथा राम नाम की महिमा विशेष रूप से थी। जब श्री कृष्ण गये तब द्वापरयुग का अंत हुआ और कलियुग का प्रारम्भ हुआ इसलिए कृष्ण नाम भी मिल गया। अतएव कलियुग में श्री हरि के नामों तथा लीलाओं का भंडार जीवों को मिल गया। तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या बात है भगवान् के नाम में? इस पर गौरांग महाप्रभुजी ने कहा - पूर्ण शुद्धो न…

क्यों तुलसीदास जी ने लिखा ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी? क्या सही अर्थ है?

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ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥ का सही अर्थ क्या है? इस लेख को धैर्य पूर्वक पढ़े हम सभी शंकाओं का समाधान इस लेख में करने वाले है। अस्तु, गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का पारायण हम बचपन से ही करते आ रहे हैं। लेकिन समय-समय पर इसके तमाम अंशो पर सवाल उठाये जाते रहते हैं। इसमें से एक चौपाई जिसका सबसे ज्यादा उल्लेख होता है वह है :- प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
- श्रीरामचरितमानस सुंदरकाण्ड अक्सर इस चौपाई को लेकर दलित संगठन, महिला संगठन तथा कभी-कभी मानवाधिकार संगठन भी अपना आक्रोश जताते हैं। कुछ लोग इसे रामचरितमानस से निकालने की मांग करते हैं। कभी मानस की प्रतियां जलाते हैं। तुलसीदास को प्रतिगामी दलित, महिला विरोधी बताते हैं। मैं कोई मानस मर्मज्ञ तो हूँ नहीं जो इसकी कोई अलौकिक व्याख्या कर सकू। लेकिन फिर भी मानव बुद्धि द्वारा भी यह सोचने वाली बात है कि जो तुलसीदासजी ‘बंदउँ संत असज्जन चरना।’ लिखकर मानस की शुरुआत करने वाले, ‘बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥’ सीताजी रामज…

भगवान् निराकार और साकार दोनों है? - वेदों के प्रमाणों द्वारा।

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हमने अबतक आपको वेद के अनेक प्रमाणों द्वारा यह बताया है कि भगवान् निराकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा। और भगवान् साकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा। तो अब मन में यह शंका होती है की क्या भगवान् निराकार और साकार दोनों है? अगर है तो कैसे? क्या वेदों में कोई प्रमाण है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर वेद के द्वारा देंगे। वेदों के उत्तर भाग और अंतिम भाग को उपनिषद् से जानन जाता है। यह ध्यान रहे की उपनिषद् वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं, अतएव यह वेद का ही अंश है। उपर्युक्त प्रश्नों का उत्तर निम्नलिखित वेद मन्त्रों द्वारा कुछ इस प्रकार है - य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद् वरणाननेकान् निहितार्थो दधाति।
विचैति चान्ते विश्वमादौ च देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् ४.१ भावार्थ:- जो रंग रूप आदि से रहित होकर भी छिपे हुए प्रयोजनवाला होने के कारण विविध शक्तियों के संबंध से सृष्टि के आदि में अनेक रूप-रंग धारण कर लेता है तथा अन्त में यह सम्पूर्ण विश्व (जिसमें) विलीन भी हो जाता है, वह परमदेव (परमात्मा) एक (अद्वितीय) है, वह हम लोगों को शुभ बुद्धि से संयुक्त करें। अर्थात् जो भगवान् निराका…

भगवान् साकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा।

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हमने अबतक आपको वेद के अनेक प्रमाणों द्वारा यह बताया है कि भगवान् निराकार है - वेदों के प्रमाणों द्वारा। अब हम आपको वेदों के प्रमाणों द्वारा बतायेगें कि वेदों में भगवान् के साकार स्वरूप का वर्णन है। यह प्रमाण वेदों के उत्तर भाग और अंतिम भाग उपनिषदों का है। यह ध्यान रहे की उपनिषद् वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं, अतएव यह वेद का ही अंश है। अब हम आपको निम्नलिखित वेद मन्त्रों द्वारा भगवान् के साकार स्वरूप का वर्णन करेंगे - अणोरणीयान्महतो महीयानात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥
- कठोपनिषद् १.२.२० भावार्थ:- इस जीवात्मा के हृदयरूप गुफा में रहने वाला परमात्मा सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म और महान से भी महान है। परमात्मा की उस महिमा को कामनारहित और चिन्तानरहित (कोई विरला साधक) सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से ही देख पता है। विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सं बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् ३.३, यजुर्वेद १७.१९, अतर्ववेद १३.२६ और ऋग्वेद १०.८१.३ में भी इसी प्रकार है। भावार्थ :- सब …