× Subscribe! to our YouTube channel

जीव आत्मा का क्या आकार है? विभु, शरीराकार या अणु?

जीव आत्मा विभु, शरीराकार या अणु?
इस जीव का आयतन क्या है? यानि परिमाण क्या है? यानि आकार क्या है? तो तीन बातें हो सकती है! जीव आत्मा
१. या तो विभु होगा। विभु मतलब सर्वव्यापक (सब जगह रहने वाला)
२. या तो शरीराकार होगा। शरीराकार मतलब शरीर के आकार का होगा।
३. या तो अणु होगा। अणु मतलब अति सूक्ष्म (छोटा होगा)
और चौथी कोई बात हो नहीं सकती। इसलिए इन तीनों में क्या है, इस पर विचार कर लेते है।

विभु

यह जीवात्मा अथवा आत्मा विभु नहीं है। सर्वव्यापक (सब जगह रहने वाला) नहीं है। क्योंकि ये सबको अनुभव हो रहा है कि, हम लोग शरीर के अंदर हैं! परन्तु बाहर नहीं हैं। यह तो सबका अपना-अपना अनुभव है! क्योंकि कोई व्यक्ति अपने आपको शरीर के बाहर नहीं महसूस करता। वेदों भी यही कहता है। कौषीतकि उपनिषद् ३.४ और १.२ यह मंत्र कह रहा है कि, जब जीव (आत्मा) निकल कर जाता है तो वह चंद्र लोक होकर जाता है। और बृहदारण्यकोपनिषद् ४.४.६ यह मंत्र कह रहा है कि, जीव परलोक (दूसरे लोक) से लौट कर फिर आता है और शरीर धारण करता है। इसका मतलब की जीव आत्मा शरीर से निकल कर जाता है, और फिर लौटकर आता है शरीर धारण करने। जो वेदों ने कहा यही बात वेदान्त भी कहती है वेदान्त २.३.१९ "उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्"।
अगर हम आत्मा को विभु (सर्वव्यापक) माने, तो आत्मा यही पर मिल जाती। जैसे घडा (मटकी) में जो आकाश (घडा का खली जगह) है। और हमने घडा को फोड़ दिया। तो घडा का आकाश संसार के आकाश में मिल गया। परन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि वेद और वेदान्त कह रहे है, आत्मा जाता है और फिर आता है। शंकराचार्य जी भी कहते है:- "पुनरपि जननम पुनरपि मरणम, पुनरपि जननी जठरे शयनम।"  अर्थात बार जन्म लेना, बार-बार मरना, फिर से जन्म लेना और फिर से मर जाना। अतएव निष्कर्ष यह है कि, जीव आत्मा विभु नहीं है।

शरीराकार

वेदव्यास ने ३ वेदान्त सूत्रों से सिद्ध किया की जीव आत्मा शरीराकार नहीं हैं। वेदान्त २.२.३२ सूत्र "एवं चात्माकात्स्यम्" अर्थात जीव आत्मा शरीर के आकार का नहीं हो सकता। क्योंकि अगर शरीर के आकार का मानोंगे तो चींटी की आत्मा हाथी में कैसे समाएगी और हाथी की आत्मा चींटी में कैसे जाएगी। देखिये, हम भी जब १ साल के थे तब हम कितने छोटे थे १ फुट के और आज (१८ वर्ष में) हम कितने बड़े हो गए ६ फुट के । तो क्या हमारी आत्मा १ फुट से ६ फुट हो गई? परन्तु! आत्मा तो बढ़ी नहीं है। गीता २.२३ शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते अग्नि इसको जला नहीं सकती जल इसको गीला नहीं कर सकता। अतएव आत्मा का आकार घटा बढ़ता नहीं। क्योंकि वेदान्त २.२.३३ घटने-बढ़ने वाली वस्तु एक दिन नश्वर (नष्ट) हो जाती है। वेदान्त २.२.३४ प्रारम्भ में अंत में मोक्ष में सदा आत्मा एक जैसी ही होती है। और गीता २.२४ कहती है, आत्मा नित्य है। अतएव निष्कर्ष यह है कि, जीव आत्मा शरीराकार नहीं है।

अणु

अब शरीराकर तो होगा ही। वेदव्यास ने १० वेदान्त सूत्रों से सिद्ध किया की जीवात्मा अणु है। वेदान्त २.३.१९ "उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्"अर्थात जीव आत्मा का उत्क्रमण (ऊपर जाना) गमन (प्रस्थान) और आगमन (आना) होता है। वेदान्त २.३.२० गमना-आगमन ये दो वास्तु सिद्ध करती है की आत्मा अणु है। औरनाणु वेदव्यास शंका करते है कि, अणु नहीं है। क्योंकि वेदान्त २.३.२१ अणु नहीं क्योंकि वेद कह रहा है कि,आत्मा विभु है। और इसी सूत्र में वेदव्यास जबाब देते है, जो वेद में लिखा है कि, आत्मा विभु है, वो परमात्मा (भगवान) के लिए लिखा है। अर्थात वेदव्यास ने वेदान्त २.३.२१ में कहा की आत्मा शब्द जीव के लिए भी वेदों में प्रयोग हुआ है। और आत्मा शब्द भगवान (परमात्मा) के लिए भी प्रयोग हुआ है।
जैसे कठोपनिषद् २.१.४ यहाँ पर आत्मा शब्द परमात्मा के लिए प्रयोग हुआ है। और आत्मा वारे दृष्टव्य श्रोतिव्य निदिधिस्यातिव्य यहाँ पर भी आत्मा शब्द परमात्मा के लिए प्रयोग हुआ है। बृहदारण्यकोपनिषद् ४.४.२२ यहाँ पर आत्मा शब्द परमात्मा के लिए प्रयोग हुआ है। तो वेदान्त २.३.२१-२९ इन १० सूत्रों से वेदव्यास ने सिद्ध किया की जीवात्मा अणु है। अतएव निष्कर्ष यह है कि, जीव आत्मा अणु है।

You Might Also Like

सबसे बड़े भगवान कौन है, राम कृष्ण शंकर या विष्णु?

क्या राम और कृष्ण एक ही हैं?

धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है?

राजा नृग को कर्म-धर्म का फलस्वरूप गिरगिट बनना पड़ा।

गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है?

कर्म-धर्म का पालन करने का फल क्या है?

वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है।

वेद, भागवत - धर्म अधर्म क्या है?