कामना क्या है, उसके प्रकार, कहाँ रहती है?

कामना वेदों के अनुसार।

संसार का प्रत्येक व्यक्ति एक बीमारी से ग्रसित है वो है कामनाओं की बीमारी या इच्छाओं की बीमारी। इस बीमारी पर हमें विचार करना चाहिए क्योंकि महाभारत शांतिपर्व २५१.७ ने कहा ‘कामबंधनमेवैकं नान्यदस्तीय बंधनम्।’ अर्थात् संसार में कामना ही एक बंधन है, कोई और बंधन नहीं। इस बीमारी की गंभीरता पर महाभारत शांतिपर्व २७७.१२ ने कहा ‘अनवाप्तेषु कामेषु मृत्युरभ्येति मानवम्।’ अर्थात् कामनाऐं पूरी नहीं होती कि मौत मनुष्य को आ घेरती है। यानी ये कामनाओं को पूरा करते-करते पूरा जीवन बीत जाता है लेकिन मनुष्य की इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं। दूसरें शब्दों में महाभारत शान्तिपर्व १७७.२२ ने कहा ‘न पूर्वे नापरे जातु कामनामंतमाप्नुवन्।’ अर्थात् तीनों कालों में लोगों ने कभी कामनाओं का अंत नहीं पाया। इसलिए इस कामना पर प्रमाणों द्वारा विचार करेंगे और इससे कौन-कौन से रोग उत्पन्न होते है, वो रोग क्या है और कितने प्रकार के है इस पर हम विस्तार से इस लेख में जानेंगे।

कामना के प्रकर

महाभारत शांतिपर्व १६७.३४ ‘नास्ति नासीन्नाभविष्यद् भूतं कामात्मकात् परम्।’ अर्थात् कामना से रहित प्राणी न कहीं है न था और न होगा ही। फिर महाभारत शांतिपर्व २५१.७ ने कहा कि ‘कामबंधनमुक्तो हि ब्रह्मभूयाय कल्पते’ अर्थात् जो कामना के बंधन से छूट जाता है, वह ब्रह्मभाव प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। इस प्रकार की दो विरोधी बाते महाभारत में क्यों कहा गया? इसका उत्तर यह है कि कामना २ प्रकार की होती है - १. भौतिक और २. आध्यात्मिक। वास्तव में भौतिक कामना को कामना कहा गया है परन्तु आध्यात्मिक कामना को भक्ति, प्रेम आदि नामों से कहा गया है। इसीलिए महाभारत शांतिपर्व १६७.३४ ‘नास्ति नासीन्नाभविष्यद् भूतं कामात्मकात् परम्।’ अर्थात् कामना से रहित प्राणी न कहीं है न था और न होगा ही।

दूसरे शब्दों में जो कामना हम भौतिक जगत में करते है वही आध्यात्मिक जगत में भी करते है। जैसे संसार में लोग अमुक व्यक्ति सम्बन्धीत चीजों को देखना, सुनना जानना चाहते है यही कामना भक्त लोग भी करते है वो लोग भगवान सम्बन्धीत चीजों को देखना, सुनना, जानना चाहते है। इसीलिए महाभारत उद्योगपर्व ४२.१८ ने कहा ‘अनीह आयाति परं परात्मा।’ अर्थात् कामनारहित मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। यानी भौतिक कामनाओं का त्याग कर दो तो मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। क्योंकि भौतिक कामनाओं का त्याग करके व्यक्ति आध्यात्मिक कामना ही करेगा और ऐसा करने से वो परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। इस बात को गीता ने इस प्रकार कहा -

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥
- गीता ८. १४

अर्थात् :- हे पार्थ अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्यनिरन्तर स्मरण करता है उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभता से प्राप्त हो जाता हूँ।

यानी अनन्यचित्तवाला अर्थात् जिसका चित्त (मन) अन्य किसी भी विषयका चिन्तन नहीं करता। ऐसा जो व्यक्ति नित्यनिरन्तर भगवान का स्मरण करता है तो भगवान में मन का लगाव हो जाता है। ऐसा व्यक्ति भगवान को सुलभता से प्राप्त कर लेता है।

भौतिक कामना की उत्पत्ति कैसे होती है?

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥६२॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥६३॥
- गीता २.६२-६३

अर्थात् :- विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना (इच्छा) उत्पन्न होती है और फिर कामना से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) और सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से वह मनुष्यका पतन हो जाता है।

विषय कुल पाँच प्रकार के होते है - १. गंध २. रस ३. रूप ४. स्पर्श ५. शब्द। ये पाँच प्रकार के विषय इसलिए है क्योंकि कुल पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ होती है - १. नासिका २. जिव्हा ३. आँख ४. त्वचा ५. कान। अब एक-एक विषय के अनेकों कामनायें है। उदाहरण के तौर पर देखने के विषय अनेक है जैसे घूमना, मान सम्मान। ये सब हम देखते है कि समाज में हमारा कितना मान सम्मान है। इत्यादि आप सभी विषयों के बारे में विचार कर लीजियेगा।

तो गीता २.६२-६३ के अनुसार व्यक्ति इन विषयों का जितना चिंतन करता है, उतना ही उसमें आसक्त हो जाता है। जैसे किसी ने मान-सम्मान के बारे में खूब चिंतन किया, किसी ने बड़ा व्यक्ति बनने के बारे में खूब चिंतन किया, किसी ने पिजा खाने का चिंतन किया, किसी ने अमुक पुरुष या स्त्री के बारे में चिंतन किया। अब जिसने जितनी बार चिंतन किया, बस उतना ही उसमें आसक्ति हो जाती है तथा जितना चिंतन और अधिक करेगा उतनी आसक्ति और अधिक बढ़ती रहेगी।

अब उन विषयों में आसक्ति हुई की आसक्ति से कामना उत्पन्न हो गया। अर्थात् आसक्ति के कारण उस व्यक्ति को वो वस्तु या व्यक्ति चाहिए, यह कामना उत्पन्न हो गयी। अब अगर वो पूर्ण हुआ तो लोभ और नहीं पूर्ण हुआ तो क्रोध उत्पन्न होगा। तो क्रोध का मूल कारण स्वयं की कामना की अपूर्ति है। जब क्रोध-मोह में व्यक्ति होता है तो स्मृति भ्रष्ट हो जाती है अर्थात् क्रोध-मोह के वक्त क्या उचित है क्या अनुचित है इसका ख्याल नहीं रहता। क्योंकि उस वक्त धर्म अधर्म का ध्यान नहीं होता इसलिए व्यक्ति पक्षपात करता है। महाभात इसका साक्षात उदाहरण है, पुत्र मोह में क्या धर्म (उचित) अधर्म (अनुचित) है इस पर ध्यान नहीं देने के कारण इतन बड़ा युद्ध हुआ।

तो जब क्रोध-मोह से स्मृति भ्रष्ट होती है फिर बुद्धि का भी नाश होता है यानी क्रोध-मोह में बुद्धि भी काम नहीं करती, उसवक्त क्या निर्णय लेना है वो निर्णय हमारा सही नहीं होता क्योंकि बुद्धि का नाश हो जाता है। और फिर बुद्धि का नाश होने से वह मनुष्य का पतन हो जाता है।

अतएव विषयों में आसक्ति के कारण कामना उत्पन्न होती है। जो क्रोध, लोभ, मोह आदि का कारण है।

कामनायें कहाँ रहती है?

कामनाओं का स्थान मन में होता है। इसलिए कामना मन में रहती है। इन्द्रियाँ तो केवल साधन है उन कामनाओं को पूरा करने का। दूसरे शब्दों में मन में कामनाओं का उदय होने पर व्यक्ति उन कामनाओं को पूरा करने के लिए अपने इन्द्रियों का प्रयोग करता है। अतएव मन में कामना रहती है।

एक और उदाहरण से समझें तो आपका कान अमुक संगीत को सुनने की कामना नहीं करता, आपका मन करता है। आप सो रहे है, और बगल में कोई फ़ोन पर बात कर रहा है। आप को कुछ नहीं सुनाई पड़ रहा है। ये इसलिए क्योंकि मन द्वारा इन्द्रि कार्य करती है। इन्द्रियाँ अकर्ता है। केवल मन ही एक मात्र करता है, जो कुछ भी करना हो।

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