वासुदेव और देवकी के पूर्व जन्म की कथा। - भागवत पुराण

वासुदेव देवकी पूर्व जन्म की कथा।

श्री कृष्ण जन्म के वक्त पहले भगवान विष्णु के रूप में माता देवकी तथा वासुदेव जी के समक्ष प्रकट हुए। तब सर्वपर्थम वासुदेव जी ने भगवान की स्तुति की फिर माता देवकी ने भगवान की स्तुति की। स्तुति करने के बाद भगवान ने वासुदेव और देवकी के तीन पूर्व जन्मों के बारे में बताया जिसमे वो उनके पुत्र बने थे। वो तीन जन्म जिसमे भगवान वासुदेव और देवकी के पुत्र बने थे वो इस प्रकार है -

१. पृश्नि और सुतपा जन्म कथा

श्रीभगवानुवाच।
त्वमेव पूर्वसर्गेऽभूः पृश्निः स्वायंभुवे सति।
तदायं सुतपा नाम प्रजापतिः अकल्मषः॥३२॥
युवां वै ब्रह्मणाऽऽदिष्टौ प्रजासर्गे यदा ततः।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं तेपाथे परमं तपः॥३३॥
वर्षवाता-तप-हिम घर्मकालगुणाननु।
सहमानौ श्वासरोध विनिर्धूत-मनोमलौ॥३४॥
शीर्णपर्णा-निलाहारौ उपशान्तेन चेतसा।
मत्तः कामान् अभीप्सन्तौ मद् आराधनमीहतुः॥३५॥
एवं वां तप्यतोस्तीव्रं तपः परमदुष्करम्।
दिव्यवर्षसहस्राणि द्वादशेयुः मदात्मनोः॥३६॥
- भागवत पुराण १०.३.३२-३६

भावार्थ:- श्री भगवान ने कहा - देवि! स्वायम्भुव मन्वन्तर में जब तुम्हारा पहला जन्म हुआ था, उस समय तुम्हारा नाम था पृश्नि और ये वसुदेव सुतपा नाम के प्रजापति थे। तुम दोनों के हृदय बड़े शुद्ध थे। जब ब्रह्मा जी ने तुम दोनों को संतान उत्पन्न करने की आज्ञा दी, तब तुम लोगों ने इन्द्रियों का दमन करके उत्कृष्ट तपस्या की। तुम दोनों ने वर्षा, वायु, घाम, शीत, उष्ण आदि काल के विभिन्न गुणों को सहन किया और प्राणायाम के द्वारा अपने मन के मैल धो डाले। तुम दोनों कभी सूखे पत्ते खा लेते और कभी हवा पीकर ही रह जाते। तुम्हारा चित्त बड़ा शांत था। इस प्रकार तुम लोगों ने मुझ से अभीष्ट वस्तु प्राप्त करने की इच्छा से मेरी आराधना की। मुझ में चित्त लगाकर ऐसा परम दुष्कर और घोर तप करते-करते देवताओं के बारह हज़ार वर्ष बीत गये।

तदा वां परितुष्टोऽहं अमुना वपुषानघे।
तपसा श्रद्धया नित्यं भक्त्या च हृदि भावितः॥३७॥
प्रादुरासं वरदराड् युवयोः कामदित्सया।
व्रियतां वर इत्युक्ते मादृशो वां वृतः सुतः॥३८॥
अजुष्टग्राम्यविषयौ अनपत्यौ च दम्पती।
न वव्राथेऽपवर्गं मे मोहितौ देवमायया॥३९॥
गते मयि युवां लब्ध्वा वरं मत्सदृशं सुतम्।
ग्राम्यान् भोगान् अभुञ्जाथां युवां प्राप्तमनोरथौ॥४०॥
अदृष्ट्वान्यतमं लोके शीलौदार्यगुणैः समम्।
अहं सुतो वामभवं पृश्निगर्भ इति श्रुतः॥४१॥
- भागवत पुराण १०.३.३७-४१

भावार्थ:- (श्री भगवान ने कहा-) पुण्यमयी देवि! उस समय मैं तुम दोनों पर प्रसन्न हुआ। क्योंकि तुम दोनों ने तपस्या, श्रद्धा और प्रेममयी भक्ति से अपने हृदय में नित्य-निरन्तर मेरी भावना की थी। उस समय तुम दोनों की अभिलाषा पूर्ण करने के लिए वर देने वालों का राजा मैं इसी रूप से तुम्हारे सामने प्रकट हुआ। जब मैंने कहा कि ‘तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो’, तब तुम दोनों ने मेरे जैसा पुत्र माँगा। उस समय तक विषय-भोगों से तुम लोगों का कोई सम्बन्ध नहीं हुआ था। तुम्हारे कोई सन्तान भी न थी। इसलिए मेरी माया से मोहित होकर तुम दोनों ने मुझ से मोक्ष नहीं माँगा। तुम्हें मेरे जैसा पुत्र होने का वर प्राप्त हो गया और मैं वहाँ से चला गया। अब सफल मनोरथ होकर तुम लोग विषयों का भोग करने लगे। मैंने देखा कि संसार में शील-स्वभाव, उदारता तथा अन्य गुणों में मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है, इसलिए मैं ही तुम दोनों का पुत्र हुआ और उस समय मैं ‘पृश्निगर्भ’ के नाम से विख्यात हुआ।

२. अदिति और कश्यप जन्म कथा

तयोर्वां पुनरेवाहं अदित्यामास कश्यपात्।
उपेन्द्र इति विख्यातो वामनत्वाच्च वामनः॥४२॥
- भागवत पुराण १०.३.४२

भावार्थ:- (श्री भगवान ने कहा -) फिर दूसरे जन्म में तुम हुईं अदिति और वसुदेव हुए कश्यप। उस समय भी मैं तुम्हारा पुत्र हुआ। मेरा नाम था ‘उपेन्द्र’। शरीर छोटा होने के कारण लोग मुझे ‘वामन’ भी कहते थे।

३. देवकी और वासुदेव जन्म कथा

तृतीयेऽस्मिन् भवेऽहं वै तेनैव वपुषाथ वाम्।
जातो भूयस्तयोरेव सत्यं मे व्याहृतं सति॥४३॥
एतद् वां दर्शितं रूपं प्राग्जन्म स्मरणाय मे।
नान्यथा मद्‍भवं ज्ञानं मर्त्यलिङ्गेन जायते॥४४॥
युवां मां पुत्रभावेन ब्रह्मभावेन चासकृत्।
चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यास्येथे मद्‍गतिं पराम्॥४५॥
- भागवत पुराण १०.३.४३-४५

भावार्थ:- (श्री भगवान ने कहा -) सती देवकी! तुम्हारे इस तीसरे जन्म में भी मैं उसी रूप से फिर तुम्हारा पुत्र (कृष्ण) हुआ हूँ। मेरी वाणी सर्वदा सत्य होती है। मैंने तुम्हें अपना यह रूप इसलिये दिखला दिया है कि तुम्हें मेरे पूर्व अवतारों का स्मरण हो जाय। यदि मैं ऐसा नहीं करता, तो केवल मनुष्य-शरीर से मेरे अवतार की पहचान नहीं हो पाती। तुम दोनों मेरे प्रति पुत्रभाव तथा निरन्तर ब्रह्मभाव रखना। इस प्रकार वात्सल्य-स्नेह और चिन्तन के द्वारा तुम्हें मेरे परम पद की प्राप्ति होगी।

ध्यान दे - भगवान ने विचार किया कि मैंने इनको वर तो यह दे दिया कि मेरे सदृश (समान) पुत्र होगा, परन्तु इसको मैं पूरा नहीं कर सकता। क्योंकि वैसा कोई है ही नहीं। (भगवान के सामान कोई नहीं है।) इसलिए किसी को कोई वस्तु देने की प्रतिज्ञा करके पूरी न कर सके तो उसके समान तिगुनी वस्तु देनी चाहिये। मेरे सदृश पदार्थ के समान मैं ही हूँ। अतएव मैं अपने को ही तीन बार इनका पुत्र बनाऊँगा।

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