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भगवान जन्म(अवतार) क्यों लेते है? निष्कर्ष

भगवान् के अवतार
अस्तु, अवतार लेने में जो कारण बताया गया जो वेद, भागवत और गीता में भगवान ने कहा हैं। ठीक है! लेकिन इससे अच्छा कारण सुनो, कुंती ने कहा "भगवान आप परमहंसो को श्री परमहंस बनाने आते हैं।" श्री(भक्त प्रेम ) परमहंस मतलब परमहंस से भक्त बनाने के लिए आप आते है। परमहंस जो निर्गुण निर्विशेष निराकार ब्रह्म के उपासक को प्रेम रास में सराबोर करने के किये भगवान का अवतार होता हैं। ये बात जमती है! क्योंकि उन लोगों को कभी नहीं मिलता प्रेमानंद, क्योंकि वे मुक्त होने पर ब्रह्म में लीन हो जाते। और भगवान ने वाकई किया भी है जनक, सनक और सुखदेव ये परमहंस थे। जनक जी निराकार ब्रह्म के उपासक थे, रामचरितमानस, बालकाण्ड-२१६/५ "इनहिं विलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहिं मनु त्यागा।।" जब स्वयंवर में राम को आते देखा! तो जनक देखते रह गए और बरबस ब्रह्म सुख त्यागा। तो जनक अब परमहंस तो नहीं रहे।
परमहंस को कोई भी कहे, की साकार ब्रह्म होता है, वो कभी इस बात को नहीं मानते। तो अब जब लोगो ने देखा की जनक का ये हाल हुआ, तो लोग कहने लगे की राम ब्रह्म से भी बड़े है। तो इसलिए भगवान जन्म लेते है और अपना प्रेम दान करते है ये कुंती ने कहा।
लेकिन! ये भी कुछ खास जमी नहीं, क्यों! भगवान से प्रेमानंद नहीं मिलता क्योंकि जब किसी रसिक भक्त गुरु की कृपा परमहंश पर होती है, तब उनको प्रेमानंद मिल सकता है। राम कृष्ण प्रेमानंद नहींदे सकते। अरे! देखो! उद्धव परमहंस को श्री कृष्ण प्रेम नहीं देसके, उद्धव को गोपियो को आचार्या मानना पड़ा तब प्रेमानंद मिला और तो और परमहंस है कितने, कलयुग में तो १० भी नहीं हैं और बाकि सभी युगों में जो हैं, जैसे जनक! तो उनके सामने गए और चले आये। एक मिनट में काम हो गया जनक के पास राम ११००० वर्ष तो रहे नहीं। तो इस लिए भगवान का अवतार लेना कुछ जमता नहीं।
वेदव्यास ने एक बात कही, "जिव पर कृपा के लिए उपकार के लिए भगवान का अवतार होता है।" अर्थात जीवो पर मायाधीन पर कृपा करने के लिए भगवान जन्म(अवतार) होता है। हाँ! ये बात जमती है।
लेकिन, हमने जितने भी कारण अबतक बताये ये सारे सही है, लेकिन जो वेदव्यास जी ने कहा वो मुझे अधिक प्रिय है।

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