राम गीता: केवल एक बार राम ने प्रजा को उपदेश दिया था।

रामगीता
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रामचरितमानस उत्तरकाण्ड ४२ "एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥ बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन ॥1॥" भावार्थ:-एक बार श्री रघुनाथजी के बुलाए हुए गुरु वशिष्ठजी, ब्राह्मण और अन्य सब नगर निवासी सभा में आए। जब गुरु, मुनि, ब्राह्मण तथा अन्य सब सज्जन यथायोग्य बैठ गए, तब भक्तों के जन्म-मरण को मिटाने वाले श्री रामजी वचन बोले।
राम बोले "हे नगर निवासियों! मेरी बात सुनिए। यह बात मैं हृदय में कुछ ममता लाकर नहीं कहता हूँ और न अनीति(अधर्म) की बात कहता हूँ और न इसमें कुछ प्रभुता ही है, इसलिए संकोच, भय छोड़कर, ध्यान देकर, मेरी बातों को सुन लो और यदि तुम्हें अच्छी लगे, तो उसके अनुसार करो! वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई! यदि मैं कुछ गलत बात कहूँ तो बेखटके मुझे रोक देना।"

मनुष्य शरीर की विशेषता।

राम जी फिर बोले "बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं के शरीर से भी दुर्लभ है और यह मनुष्य शरीर बड़ी कठिनता से मिलता है। यह स्वर्ग,, नर्क, पृथ्वी का धाम और मोक्ष का दरवाजा है।

स्वर्ग दुखदाई है।

इसे(मनुष्य शरीर) पाकर भी जो स्वर्ग जाते है, वह स्वर्ग में दुःख पाता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है और अपना दोष न समझकर काल पर, कर्म पर और ईश्वर पर मिथ्या(जूठा) दोष लगाता है। इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषयभोग(संसार भोग) नहीं हैं। स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अंत में दुःख देने वाला है।

जो मनुष्य शरीर का दुरुपयोग करते है।

अतः जो लोग मनुष्य शरीर पाकर विषयों में मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृत को बदलकर विष ले लेते हैं। जो पारसमणि(मनुष्य शरीर) को खोकर बदले में घुँघची (एक प्रकार की जंगली बेल जिसमें लाल लाल रंग के छोटे छोटे बीज होते हैं।) ले लेता है, उसको कभी कोई भला (बुद्धिमान) नहीं कहता।

मनुष्य शरीर दुरूपयोग करने का परिणाम।

यह अविनाशी जीव (अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज) चार खानों और चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाता रहता है। माया की प्रेरणा से काल, कर्म, स्वभाव और गुण से घिरा हुआ (इनके वश में हुआ) यह सदा भटकता रहता है।

ईश्वर मानव शरीर क्यों देते है, सद्गुरु एवम ईश्वर की महिमा मनुष्यों पर।

बिना ही कारण स्नेह करने वाले ईश्वर कभी विरले (विरला) ही दया करके इसे मनुष्य का शरीर देते हैं। यह मनुष्य का शरीर भवसागर (संसार) से तारने के लिए जहाज है। सद्गुरु इस मजबूत जहाज के कर्णधार(जहाज चलाने वाले) खेने वाले हैं। इस प्रकार कठिनता से मिलने वाले साधन सुलभ होकर भगवत्कृपा से सहज ही उसे प्राप्त हो गए हैं, जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागर से न तरे, वह कृतघ्न (धन्यवाद पाने के अयोग्य) और मंद बुद्धि वाले है और आत्महत्या करने वाले की गति को प्राप्त होता है।

अगर सुख आनंद चाहते तो तो ये काम करो।

यदि सुख चाहते हो, तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हृदय में दृढ़ता से पकड़ रखो। हे प्रजा! यह मेरी भक्ति का मार्ग सुलभ और सुखदायक है, पुराणों और वेदों ने इसे गाया है।

ज्ञानो को सन्देश।

ज्ञान दुर्गम है और उसकी प्राप्ति में अनेकों विघ्न हैं। उसका साधन कठिन है और उसमें मन के लिए कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करने पर कोई उसे पा भी लेता है, तो वह भी भक्तिरहित होने से मुझको प्रिय नहीं होता।

भक्ति की महिमा।

भक्ति स्वतंत्र है और सब सुखों की खान है, परंतु संतों के संग के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते और पुण्य समूह (अर्थात् भगवान् भक्ति) के बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति (संतों का संग) ही जन्म-मरण के चक्र का अंत करती है।

पुण्य क्या है।

जगत्‌ में पुण्य एक ही है, (उसके समान) दूसरा नहीं। वह है- मन, कर्म और वचन से ब्राह्मणों(संतों) के चरणों की पूजा करना। जो कपट का त्याग करके ब्राह्मणों(संतों) की सेवा करता है, उस पर मुनि और देवता (भगवान) प्रसन्न रहते हैं।

शंकरजी के भक्त ही मेरे भक्त है।

एक गुप्त मत है, मैं उसे सबसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि शंकरजी के भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पाता।

भक्ति की प्रशंसा, भक्ति के अधिकारी, भक्ति कैसे करे।

भक्ति मार्ग में कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योग की आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवास की! बस सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसी में सदा संतोष रखें। न किसी से वैर (दुश्मनी) करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे। उसके लिए सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं। जो कोई भी आरंभ (फल की इच्छा से कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घर में ममता नहीं है), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो (भक्ति करने में) निपुण और विज्ञानवान्‌ है। संतजनों के सत्संग से जिसे सदा प्रेम है, जिसके मन में सब विषय यहाँ तक कि स्वर्ग और मुक्ति तक (भक्ति के सामने) तृण के समान हैं, जो भक्ति के पक्ष में हठ करता है, पर (दूसरे के मत का खण्डन करने की) मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब कुतर्कों को दूर बहा दिया है। जो मेरे गुण समूहों के और मेरे नाम में मगन है, एवं ममता, मद और मोह से रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो (परमात्मारूप) परमानन्दराशि को प्राप्त है।

वशिष्ठजी, ब्राह्मण और अन्य सब नगर निवासी ने रामचन्द्रजी से कहा।

श्रीरामचन्द्रजी के अमृत के समान वचन सुनकर सबने कृपाधाम (राम) के चरण पकड़ लिए (और कहा-) हे कृपानिधान! आप हमारे माता, पिता, गुरु, भाई सब कुछ हैं और प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। और हे(राम) शरणागत के दुःख हरने वाले रामजी! आप ही हमारे शरीर, धन, घर-द्वार और सभी प्रकार से हित करने वाले हैं। ऐसी शिक्षा आपके अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता।

वशिष्ठजी, ब्राह्मण और प्रजा ने सबको स्वार्थ कहा, निःस्वार्थ दो ही हैं।

माता-पिता (हितैषी हैं और शिक्षा भी देते हैं) परन्तु वे भी स्वार्थपरायण (मतलबी) हैं (इसलिए ऐसी परम हितकारी शिक्षा नहीं देते) हे असुरों के शत्रु! जगत्‌ में बिना हेतु के (निःस्वार्थ) उपकार करने वाले तो दो ही हैं- एक आप, दूसरे आपके सेवक। जगत्‌ में (शेष) सभी स्वार्थ के मित्र हैं। हे प्रभो! उनमें स्वप्न में भी परमार्थ का भाव नहीं है। सबके प्रेम रस में सने हुए वचन सुनकर श्री रघुनाथजी हृदय में हर्षित हुए। फिर आज्ञा पाकर सब प्रभु की सुन्दर बातचीत का वर्णन करते हुए अपने-अपने घर गए।

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