सभी लोग स्वार्थी है, क्यों और कैसे?

सभी लोग स्वार्थी है।

वेद बृहदारण्यकोपनिषद् २.४.५ और यह शतपथब्राह्मणम् १४.५.४.[५] में भी है, "स होवाच: न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति ... आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥" पति को पत्नी इसलिए नहीं प्रिय है क्योंकि वह प्रिय है। पति को पत्नी इसलिए प्रिय है क्योंकि वह अपने आप से प्रेम करता है। पत्नी को पति इसलिए नहीं प्रिय है क्योंकि वह प्रिय है। पत्नी को पति इसलिए प्रिय है क्योंकि वह अपने आप से प्रेम करती है। इसी प्रकार न पुत्र, न धन, न भाई, न बहन आदि चीजे इसलिए नहीं प्रिय है क्योंकि वो प्रिय हैं। वह इसलिए प्रिय है क्योंकि हम अपने आप से प्रेम करते हैं। भावार्थ यह है की हम जितने भी कामनाये बनाते है, वह इसलिए नहीं बनाते है की वह प्रिय व्यक्ति/वस्तु है। हम इसलिए सभी कामनाये बनाते है क्योंकि हम अपने आपसे प्रेम करते है।

दूसरे शब्दों में कहें तो 'पैसा हमें इसलिए नहीं प्रिय है क्योंकि वह प्रिय वस्तु है, वह इसलिए प्रिय है क्योंकि उस पैसे से संसारी सामान मिलेगा तो उससे हमे सुख मिलेगा।' दूसरे शब्दों में कहें तो हम किसी ऐसे व्यक्ति का संघ नहीं चाहते जो हमें दुःख दे, हम ऐसे व्यक्ति का संघ चाहते हैं जो हमे सुख दे।

अतएव क्योंकि हम अपने सुख के लिए किसी व्यक्ति या वस्तु का संघ चाहते हैं, और उसी के साथ रहना पसंद करते हैं, क्योंकि उससे हमे सुख मिलेगा। इसलिए आप स्वार्थी हैं, हम स्वार्थी हैं, पूरा विश्व स्वार्थी हैं। गीता ३.५ "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्" अर्थात् कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्मा नहीं रह सकता। अर्थात् बिना कर्म किये नहीं रह सकता। कोई हो, कुत्ता, बिल्ली, गधा, मनुष्य, देवता, राक्षस कोई हो। प्रत्येक जीव हर क्षण कर्म कर रहा है। अगर हम देखें कि एक व्यक्ति सोया है, तो सोना भी एक कर्म है। सो नहीं रहा, कुछ कर भी नहीं रहा, तो सोच रहा है कुछ न कुछ, ये सोचना भी कर्म है। ❛संसार में प्रतेक व्यक्ति आनंद ही चाहता है।❜ हम अपने प्रतेक कर्म इसी लिए करते हैं, क्योंकि हमे सुख चाहिए। अतएव सभी वस्तु और व्यक्ति की हम जो कामना करते है वो अपने सुख के लिए करते है। इसलिए हम स्वार्थी है, पूरा विश्व स्वार्थी है।

लेना-लेना स्वार्थी कहलाता है, लेना-देना व्यापार कहलाता है और देना-देना प्रेम कहलाता है। क्योंकि हम आनंद (खुशी, सुख, शांति) लेना चाहते वोभी अपने लिए। इसलिए हम स्वार्थी है, पूरा विश्व स्वार्थी है। इसी प्रकार माता-पिता भी स्वार्थी हैं। क्योंकि वोभी अपने सुख के लिए किसी का संग चाहते है। जैसे आप अपने सुख के लिए प्रतेक छण कर्म कर रहे हैं। वैसे ही वो भी अपने सुख के लिए प्रतेक छण कर्म कर रहे हैं।

आपको यह बात सही नहीं लग रही होगी की माता पिता स्वार्थी है। इस बात को हम आपकों विस्तार में बताते हैं। एक लड़की व लड़का एक दूसरे से प्रेम करते है, और दोनों शादी करना चाहते हैं। परन्तु दोनों के माता-पिता को ये मंजूर नहीं होता। क्यों? इसलिए क्योंकि उनके सम्मान की बात है। मेरा बेटा मेरी बेटी मेरे अपने मन से इतना बड़ा निणय ले लिया। और अगर लड़की या लड़के की शादी का ज़बान पिता ने माता ने किसी को दे दिया। तब तो और कांड खड़ा हो जायेगा। अब तो माता-पिता के समाज में इज्जत की बात आ जाएगी। क्योंकि सब लोग आपने आपको शरीर मानते है। इसलिए शरीर सम्बन्धी चीजों में अपना सुख मानते हैं इसलिए ये मान-सम्मान में भी सभी लोग सुख मानते हैं। इसी प्रकार माता-पिता मान-सम्मान में सुख मानते हैं।

एक और उदाहरण से समझे, जब तक आप माता-पिता के अनुसार आप चलते गये तब तक उनका स्वार्थी सिद्ध होता हैं। कैसा स्वार्थ? उन्होंने अपने आप को शरीर मन लिया हैं। इसलिए वो मान-सम्मान, पैसा, इज्जत यह सारी बातें मान रखा है और इनमे सुख माना है। अगर आप इनमे से एक भी काम नहीं कर पाए तो, उनका स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा, तो आप उनके लिए नालायक हो जायेंगे। जैसे एक बेटा बाबा या संत या कोई भी ऐसा कार्य जिसके लिए माँ बाप को छोड़ना अथवा त्यागना पड़े तो वो (माँ बाप) नहीं त्यागने देंगे। क्योंकि उन्होंने अपना स्वार्थ आपमें मान रखा हैं। आप चले जाये गए तो उनका स्वार्थ सिद्ध कैसे होगा। ठीक इसी प्रकार हम भी माँ पिता दोस्त आदि से ऐसे ही स्वार्थी सिद्धि करते है।

तो क्योंकि माँ-पिता आनंद अपने लिए चाहते है जैसे हम लोग आनंद अपने लिए चाहते है इसलिए माँ-पिता, हम, संसार के सभी व्यक्ति स्वार्थी है। अतएव सब स्वार्थी हैं और सबका स्वार्थ है आनंद खुशी शांति। परन्तु ❛सभी व्यक्ति अपने सभी कार्य से आनंद ही चाहता हैं।❜ यह आश्चर्य की बात है।

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