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वसंत पंचमी या श्रीपंचमी क्यों मनाते है?

सरस्वती

वसंत पंचमी क्या है? - आध्यात्मिक

हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल माघ महीने में शुक्ल की पंचमी को विद्या और बुद्धि की देवी माँ सरस्वती की उपासना होती है। इस पर्व को आम भाषा में वसंत पंचमी कहा जाता है। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है। ज्ञान और कला की देवी माँ सरस्वती का जन्मदिवस को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माँ शारदे (सरस्वती) की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं।

ज्ञानवान या बुद्धिमान कौन हैं?

भागवत ११.१९.४२ मे भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव से कहा था कि "मुर्ख वो है जो अपने आप को शरीर (मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ) मानता है।" तो इस आधार से ज्ञानवान या बुद्धिमान वो है जो अपने आप को सदा आत्मा माने।
भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता १०.३५ में कहा कि ऋतुओं में वसन्त ऋतु मैं हूँ।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर: ॥
भावार्थ :- गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छन्दों में गायत्री छन्द हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसन्त मैं हूँ।
ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
भावार्थ :- हे परम चेतना, सरस्वती के रूप में आप हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार आप ही हैं। आपकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।
पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी।
पतंगबाज़ी का वसंत (श्रीपंचमी) से कोई संबंध नहीं है। पतंग उड़ाने का रिवाज़ साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा हैं।

बसन्त पंचमी कथा

प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। ब्रह्मा जब संसार में देखते तो उन्हें चारों ओर सुनसान निर्जन ही दिखाई देता था। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। जैसे किसी की वाणी ना हो। भगवान विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। उन जलकणों के पड़ते ही पेड़ों से एक शक्ति उत्पन्न हुई जो दोनों हाथों से वीणा बजा रही थी और दो हाथों में पुस्तक और माला धारण की हुई जीवों को वाणी दान की, इसलिये उस देवी को सरस्वती कहा गया। जलधारा में ध्वनि व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से जाना जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी (श्रीपंचमी) के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।

वसंत पंचमी मनाने का उद्देश्य

भागवत एकादश स्कंध मे भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव से कहा था कि "मुर्ख वो है जो अपने आप को शरीर (मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ) मानता है।" तो इस आधार से ज्ञानवान या बुद्धिमान वो है जो अपने आप को सदा आत्मा मने। और माँ सरस्वती वंदना में कहा गया "शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमाम् आद्यां जगद् व्यापिनीम्। वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्" भावार्थ :- आदिशक्ति परब्रह्म (भगवान) के विषय मे किए गये विचार एंव चिन्तन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली।" अतएव भगवान के विषय का ज्ञान (वेद का ज्ञान) हमें करना चाहिए। क्योंकि माँ सरस्वती उसकी ज्ञान को धारण करती है। तो चुकी वसंत पंचमी माँ सरस्वती का जन्मदिवस तो इस दिन हम माँ से ये आराधना करे कि "हे मेरी माँ तू मुझे इतना ज्ञान दे की मैं सदा अपने आप को आत्मा मानूं।" अगर कोई अपने आप को सदा आत्मा माने तो वो परमात्मा (भगवान) को पा लेगा। तो जब हम भगवान को प्राप्त कर लेंगे तब वसंत पंचमी (श्रीपंचमी) का उद्देश्य पूरा होगा। और यही वसंत पंचमी मनाने का उद्देश्य है।

वसंत पंचमी क्या है? - भौतिक

हिन्दू धर्म में पूरे साल को छह मौसमों में बाँटा जाता है, उनमें वसंत मौसम है। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं तो यह वसंत ऋतू कहा जाता है।

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