दुर्गा, नारायणि, सनातनि, जया और सर्वमंगला का अर्थ। - ब्रह्मा द्वारा, ब्रह्मवैवर्त पुराण

दुर्गा, नारायणि, सनातनि, जया और सर्वमंगला नाम का अर्थ। - ब्रह्मा जी के द्वारा, ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्म वैवर्त पुराण अनुसार ब्रह्मा जी ने दुर्गा, नारायणि, सनातनि, जया और सर्वमंगला नाम का अर्थ अपने स्तोत्र में बताया है।

दुर्गा नाम का अर्थ

ब्रह्मोवाच।
दुर्गे शिवेऽभये माये नारायणि सनातनि।
जये मे मङ्गलं देहि नमस्ते सर्वमङ्गले॥१७॥
दैत्यनाशार्थवचनो दकारः परिकीर्तितः।
उकारो विघ्ननाशार्थं वाचको वेदसंमतः॥१८॥
रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापघ्नवाचकः।
भयशत्रुघ्नवचनश्चाकारः परिकीर्तितः॥१९॥
स्मृत्युक्ति स्मरणाद्यस्या एते नश्यन्ति निश्चितम्।
अतो दुर्गा हरेः शक्तिर्हरिणा परिकीर्तिता॥२०॥
विपत्तिवाचको दुर्गश्चाकारो नाशवाचकः।
दुर्गं नश्यति या नित्यं सा दुर्गा परिकीर्तिता॥२१॥
दुर्गो दैत्येन्द्रवचनोऽप्याकारो नाशवाचकः।
तं ननाश पुरा तेन बुधैर्दुर्गा प्रकीर्तिता॥२२॥
- ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्ड) अध्याय २७

संक्षिप्त भावार्थः - ब्रह्मा बोले– दुर्गे! शिवे! अभये! माये! नारायणि! सनातनि! जये! मुझे मंगल प्रदान करो। सर्वमंगले! तुम्हें मेरा नमस्कार है। दुर्गा का ‘दकार’ दैत्यनाशरूपी अर्थ का वाचक कहा गया है। ‘उकार’ विघ्ननाशरूपी अर्थ का बोधक है। उसका यह अर्थ वेद सम्मत है। ‘रेफ’ रोगनाशक अर्थ को प्रकट करता है। ‘गकार’ पापनाशक अर्थ का वाचक है। और ‘आकार’ भय तथा शत्रुओं के नाश का प्रतिपादक कहा गया है। जिनके चिन्तन, स्मरण और कीर्तन से ये दैत्य आदि निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं, वे भगवती दुर्गा श्रीहरि की शक्ति कही गयी हैं। यह बात किसी और ने नहीं, साक्षात श्रीहरि ने ही कही है। ‘दुर्ग’ शब्द विपत्ति का वाचक है और ‘आकार’ नाश का। जो दुर्ग अर्थात विपत्ति का नाश करने वाली हैं, वे देवी सदा ‘दुर्गा’ कही गयी हैं। ‘दुर्ग’ शब्द दैत्यराज दुर्गमासुर का वाचक है और ‘आकार’ नाश अर्थ का बोधक है। पूर्वकाल में देवी ने उस दुर्गमासुर का नाश किया था, इसलिये विद्वानों ने उनका नाम ‘दुर्गा’ रखा।

नारायणि नाम का अर्थ

नारायणार्धाङ्गभूता तेन तुल्या च तेजसा।
सदा तस्य शरीरस्था तेन नारायणी स्मृता॥२९॥
- ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्ड) अध्याय २७

संक्षिप्त भावार्थः - वे देवी भगवान नारायण आधार अंग हैं। उन्हीं के समान तेजस्विनी हैं और उनके शरीर के भीतर निवास करती हैं, इसलिये उन्हें ‘नारायणी’ कहते हैं।

सनातनि नाम का अर्थ

निर्गुणस्य च नित्यस्य वाचकश्च सनातनः।
सदा नित्या निर्गुणा या कीर्तिता सा सनातनी॥३०॥
- ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्ड) अध्याय २७

संक्षिप्त भावार्थः - ‘सनातन’ शब्द नित्य और निर्गुण का वाचक है। जो देवी सदा निर्गुणा और नित्या हैं, उन्हें ‘सनातनी’ कहा गया है।

जया नाम का अर्थ

जयः कल्याणवचनो याकारो दातृवाचकः।
जयं ददाति या नित्यं सा जया परिकीर्तिता॥३१॥
- ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्ड) अध्याय २७

संक्षिप्त भावार्थः - ‘जय’ शब्द कल्याण का वाचक है और ‘आकार’ दाता का। जो देवी सदा जय देती हैं, उनका नाम ‘जया’ है।

सर्वमंगला नाम का अर्थ

सर्व मङ्गलशब्दश्च संपूणैश्वर्यवाचकः।
आकारो दातृवचनस्तद्दात्री सर्वमङ्गला॥३२॥
- ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्ड) अध्याय २७

संक्षिप्त भावार्थः - ‘सर्वमंगल’ शब्द सम्पूर्ण ऐश्वर्य का बोधक है और ‘आकार’ का अर्थ है देने वाला। ये देवी सम्पूर्ण ऐश्वर्य को देने वाली हैं, इसलिये ‘सर्वमंगला’ कही गयी हैं।

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