भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई? - भागवत पुराण

भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु कैसे हुई भागवत पुराण अनुसार

भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई? मृत्यु के बाद, क्या श्री कृष्ण ने अपना शरीर छोड़ दिया और किसी अन्य शरीर को धारण कर लिया? उनके शरीर का दाह संस्कार किसने किया? इन प्रश्नों का उत्तर इस लेख में विस्तार से दिया गया है। परन्तु, सर्वप्रथम यह समझिये कि ‘भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई’ वास्तव में यह प्रश्न पूछना गलत है। क्योंकि मृत्यु का अर्थ है समाप्ति। चुकी भगवान और आत्मा की मृत्यु नहीं होती। अतएव यह प्रश्न करना गलत हो गया कि ‘श्री कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई’ लेकिन यह प्रश्न मन में जरूर उठता है कि भगवान कृष्ण यह संसार से कैसे अलक्षित (आँखों से ओझल) हो गए या भगवान श्री कृष्ण ने भारतवर्ष छोड़ कर आपने लोक कैसे गये या भगवान कृष्ण ने प्रस्थान कैसे किया? तो इस बारे में भागवत पुराण के ११ वे स्कन्ध में विस्तार पूर्वक वर्णित है।

भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु लीला

भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्य
गुप्तैः स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेयः।
मन्येऽवनेर्ननु गतोऽप्यगतं हि भारं
यद्यादवं कुलमहो अविषह्यमास्ते॥३॥
नैवान्यतः परिभवोऽस्य भवेत्कथञ्चिन्
मत्संश्रयस्य विभवोन्नहनस्य नित्यम्।
अन्तः कलिं यदुकुलस्य विधाय वेणु
स्तम्बस्य वह्निमिव शान्तिमुपैमि धाम॥४॥
- भागवत पुराण ११.१.३-४

अर्थात् :- (शुकदेव जी परीक्षित से कहते हैं कि) - भगवान श्रीकृष्ण ने विचार किया कि लोक दृष्टि से पृथ्वी का भार दूर हो जाने पर भी वास्तव में मेरी दृष्टि से अभी तक दूर नहीं हुआ, क्योंकि जिस पर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता, वह यदुवंश अभी पृथ्वी पर वर्तमान है। यह यदुवंश मेरे आश्रित है और हाथी, घोड़े, जनबल, धनबल आदि विशाल वैभव के कारण मनमानी कर रहे है। अन्य किसी देवता आदि से भी इसकी किसी प्रकार पराजय नहीं हो सकती। जैसे बाँस के वन में आपस में संघर्ष से अग्नि उत्पन्न होती है, उसी के समान इस यदुवंश में भी आपस में कलह खड़ा करके मैं शान्ति प्राप्त कर सकूँगा और इसके बाद अपने धाम में जाऊँगा।

यदुकुल का संहार

तो श्री कृष्ण ने ऐसा ही किया। एक दिन यदुवंश में से कुछ उद्दण्ड कुमार खेलते-खेलते जाम्बवतीनन्दन साम्ब को गर्भवती स्त्री बना कर ऋषि-मुनियों के पास गये।

एवं प्रलब्धा मुनयस्तानूचुः कुपिता नृप।
जनयिष्यति वो मन्दा मुसलं कुलनाशनम्॥
- भागवत पुराण ११.१.१६

अर्थात् :- (शुकदेव जी कहते हैं परीक्षित से कि) परीक्षित! जब उन यदुवंश कुमारों ने इस प्रकार उन मुनियों को धोखा देना चाहा, तब वे भगवत्प्रेरणा से क्रोधित हो गये। उन्होंने कहा - ‘मूर्खों! यह एक ऐसा मूसल पैदा करेगी, जो तुम्हारे कुल का नाश करने वाला होगा।’

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि ऋषि- मुनियों को क्रोध नहीं आया था। वो भगवत्प्रेरणा से क्रोधित हो उठे थे। इसलिए हमें भगवान की इस लीला को लीला ही मानना चाहिए न की ये तर्क करे कि भगवान ने इनके साथ ऐसा क्योंकि किया। यह ध्यान रहे कि भगवान की लीला में अधिकांश जीवात्मा महापुरुष ही होते है जो पूर्व में ही भगवत् प्रति कर चुके है और संसार में अवतरित होकर स्त्री-पुरुष रूप में रहते है। वे लोग भगवान की लीला में सहयोग करने के लिए मनुष्य की भाती अज्ञानता भरे कार्य करते है। परन्तु वास्तव में वो ऐसे है नहीं। उनका मन सदा भगवान में लगा रहता है।

तच्छ्रुत्वा तेऽतिसन्त्रस्ता विमुच्य सहसोदरम्।
साम्बस्य ददृशुस्तस्मिन् मुसलं खल्वयस्मयम्॥१७॥
किं कृतं मन्दभाग्यैर्नः किं वदिष्यन्ति नो जनाः।
इति विह्वलिता गेहानादाय मुसलं ययुः॥१८॥
- भागवत पुराण ११.१.१७-१८

अर्थात् :- मुनियों की यह बात सुनकर वे कुमार बहुत ही डर गये। उन्होंने तुरंत ही साम्ब का पेट खोलकर देखा तो सचमुच उसमें एक लोहे का मूसल मिला। अब तो वे पछताने लगे और कहने लगे कि ‘हम बड़े अभागे हैं। देखो, हम लोगों ने यह क्या अनर्थ कर डाला? अब लोग हमें क्या कहेंगे?’ इस प्रकार वे बहुत घबरा गये और मूसल लेकर अपने निवासस्थान में गये।

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि बालकों ने ‘तुरंत साम्ब का पेट खोलकर देखा।' इसका मतलब यह नहीं हुआ कि साम्ब के स्थूल पेट के अन्दर वो लोहे का मूसल था। साम्ब ने गर्भवती स्त्री का भेष धारण किया था यानी जो झूठ-मूठ का गर्भ रूपी पेट बनाया था कपड़ा आदि से, उसकी जगह लोहा था।

फिर वे यदुवंशी कुमारों ने भरी सभा में सब यादवों के सामने उस मूसल को रख दिया और उग्रसेन (जो मथुरा के राजा थे और कंस इन्हीं का पुत्र था) से सारी घटना कहयी। तब सब-के-सब भयभीत हो गये क्योंकि वे जानते थे कि मुनियों का शाप कभी झूठा नहीं होता। अतएव उग्रसेन ने उस मूसल को चूरा-चूरा करवा डाला। उस चूरे को और बचे छोटे-छोटे लोहे के टुकड़े को समुद्र में फेंकवा दिया।

कश्चिन्मत्स्योऽग्रसील्लोहं चूर्णानि तरलैस्ततः।
उह्यमानानि वेलायां लग्नान्यासन्किलैरकाः॥२२॥
मत्स्यो गृहीतो मत्स्यघ्नैर्जालेनान्यैः सहार्णवे।
तस्योदरगतं लोहं स शल्ये लुब्धकोऽकरोत्॥२३॥
- भागवत पुराण ११.१.२२-२३

अर्थात् :- (शुकदेव जी कहते हैं कि) परीक्षित! उस लोहे के टुकड़े को एक मछली ने निगल लिया और चूरा तरंगों के साथ बहकर समुद्र के किनारे आ गया। वह थोड़े दिनों में एरक (बिना गाँठ की घास) के रूप में उग गया। मछुआरों ने समुद्र में दूसरी मछलियों के साथ उस मछली को भी पकड़ लिया जिसके पेट में लोहे का टुकड़ा था। उस लोहे के टुकड़े को जरा नामक बहेलिया ने अपने बाण के नोक में लगा लिया।

फिर कुछ समय बाद श्री कृष्ण के पिता वसुदेव जी के पास नारद जी का आना हुआ और उन्हें राजा जनक तथा नौ योगीश्वरों का संवाद सुनाना और माया, माया से पार होने के उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोग का निरूपण आदि ज्ञान वसुदेव जी के जिज्ञासा करने पर बताया।

श्रीशुक उवाच
अथ ब्रह्मात्मजैः देवैः प्रजेशैरावृतोऽभ्यगात्।
भवश्च भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृतः॥१॥
इन्द्रो मरुद्भिर्भगवानादित्या वसवोऽश्विनौ।
ऋभवोऽङ्गिरसो रुद्रा विश्वे साध्याश्च देवताः॥२॥
- भागवत पुराण ११.६.१-२

अर्थात् :- श्रीशुकदेव जी कहते है - परीक्षित! जब देवर्षि नारद वसुदेव जी को उपदेश करके चले गये, उसके बाद ब्रह्मा जी अपने पुत्र सनकादिकों एवं देवताओं और प्रजापतियों के साथ, भूतगणों के साथ सर्वेश्वर महादेव जी और मरुद्गणों के साथ देवराज इन्द्र द्वारकानगरी में आये।

ये लोग भगवान से प्रार्थना करने आये थे कि यदि आप उचित समझें तो अब आप अपने परमधाम में पधारिये। तो श्री कृष्ण ने भी कहा कि मैं पहले से ही ऐसा निश्चय कर चुका हूँ। ब्राह्मणों के शाप से यदुवंशीयों वंश का नाश होते ही अपने परमधाम में पधारूँगा।

श्रीशुक उवाच
इत्युक्तो लोकनाथेन स्वयम्भूः प्रणिपत्य तम्।
सह देवगणैर्देवः स्वधाम समपद्यत॥३२॥
अथ तस्यां महोत्पातान्द्वारवत्यां समुत्थितान्।
विलोक्य भगवानाह यदुवृद्धान्समागतान्॥३३॥
- भागवत पुराण ११.६.३२-३३

अर्थात् :- श्रीशुकदेव जी ने कहा - परीक्षित! जब भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा, तब ब्रह्मा जी ने उन्हें प्रणाम किया और फिर देवताओं के साथ वे अपने धाम को चले गये। उनके जाते ही द्वारकापुरी में बड़े-बड़े अपशकुन और उत्पात होने लगे। तब उन्हें देखकर यदुवंश के बड़े-बूढ़े भगवान श्री कृष्ण के पास गये। भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे यह बात कही।

श्रीभगवानुवाच
एते वै सुमहोत्पाता व्युत्तिष्ठन्तीह सर्वतः।
शापश्च नः कुलस्यासीद्ब्राह्मणेभ्यो दुरत्ययः॥३४॥
न वस्तव्यमिहास्माभिर्जिजीविषुभिरार्यकाः।
प्रभासं सुमहत्पुण्यं यास्यामोऽद्यैव मा चिरम्॥३५॥
- भागवत पुराण ११.६.३४-३५

अर्थात् :- भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘गुरुजनों आजकल द्वारका में जिधर देखो उधर बड़े- बड़े अपशकुन और उत्पात हो रहे हैं। आप लोग जानते ही हैं कि ब्राह्मणों ने हमारे वंश को ऐसा शाप दे दिया है, जिसका टाल सकना बहुत ही कठिन है। मेरा यह विचार है कि हम लोग अपने प्राणों की रक्षा चाहते हों तो हमें यहाँ नहीं रहना चाहिये। अब हमें विलम्ब करने की आवश्यकता नहीं है। हम लोग आज ही पवित्र प्रभास क्षेत्र के लिए निकल जाना चाहिये।’

जब भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा, तब यदुवंशियों ने एक मत से प्रभास जाने का निश्चय कर लिया और सब अपने-अपने रथ सजाने लगे। तब उद्धव जी ने इस प्रकार यदुवंशियों को यात्रा की तैयारी करते देखा, भगवान की आज्ञा भी किसी से सुनी और अत्यन्त घोर अपशकुन भी देखे, तब वे भगवान श्रीकृष्ण के पास एकान्त में गये, उनके चरणों पर अपना सिर रखकर प्रणाम किया। फिर जो बात श्री कृष्ण और उद्धव जी के बीच हुई वो बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और एक तरह से गीता ज्ञान ही है। क्योंकि इनके बीच जो संवाद है वो श्रीमद्भागवत महापुराण ११ स्कन्ध अध्याय ६ से २९ अध्याय तक है। जिसमें ज्ञान की बातें की गयी है। अस्तु, तो अंत में फिर श्री कृष्ण की ने उद्धव जी को बदरीवन जाने को कहा और फिर उद्धव जी वह से बदरीवन चले गये। इसके बाद सभी लोग प्रभास क्षेत्र के लिए निकल पड़ें।

श्रीभगवानुवाच
एते घोरा महोत्पाता द्वार्वत्यां यमकेतवः।
मुहूर्तमपि न स्थेयमत्र नो यदुपुङ्गवाः॥५॥
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च शङ्खोद्धारं व्रजन्त्वितः।
वयं प्रभासं यास्यामो यत्र प्रत्यक्सरस्वती॥६॥
- भागवत पुराण ११.३०.५-६

अर्थात् :- (फिर भगवान श्रीकृष्ण ने सभा में उपस्थित सभी यदुवंशियों से कहा -) ‘श्रेष्ठ यदुवंशियों! यह देखो, द्वारका में घोर उत्पात और अपशकुन होने लगे हैं। ये यमराज की ध्वजा के समान हमारे महान् अनिष्ट का संकेत दे रहे हैं। अब हमें यहाँ घड़ी-दो-घड़ी भी नहीं रुकना चाहिये। स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े यहाँ से शंखद्धार क्षेत्र में चल जायें और हम लोग प्रभास क्षेत्र में जायेंगे। वहाँ सरस्वती नदी पश्चिम की ओर बहकर समुद्र में जा मिली जाती है।’

तस्मिन्भगवतादिष्टं यदुदेवेन यादवाः।
चक्रुः परमया भक्त्या सर्वश्रेयोपबृंहितम्॥११॥
ततस्तस्मिन्महापानं पपुर्मैरेयकं मधु।
दिष्टविभ्रंशितधियो यद्द्रवैर्भ्रश्यते मतिः॥१२॥
- भागवत पुराण ११.३०.११-१२

अर्थात् :- प्रभास क्षेत्र में पहुँचकर यादवों ने भगवान श्रीकृष्ण के कथन अनुसार बड़ी श्रद्धा और भक्ति से शान्ति पाठ आदि किया तथा और भी सब प्रकार के जो मंगल कर्म थे वो भी किये। यह सब यादवों ने किया, परन्तु वे मैरेयक नामक मदिरा का पान करने लगे, जिसके नशे से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। वह पीने में तो अवश्य मीठी लगती है, परन्तु परिणाम में सर्वनाश करने वाली है।

उस समय वे क्रोध में एक-दूसरे पर आक्रमण करने लगे और धनुष-बाण, तलवार, भाले, गदा, तोमर और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रों से वहाँ समुद्र तट पर ही एक-दूसरे से भिड़ गये और आपस में लड़ कर सभी लोग मर गये।

एवं नष्टेषु सर्वेषु कुलेषु स्वेषु केशवः।
अवतारितो भुवो भार इति मेनेऽवशेषितः॥
- भागवत पुराण ११.३०.२५

अर्थात् :- जब केशव ने देखा कि समस्त यदुवंशियों का संहार हो चुका है, तब उन्होंने यह सोचकर सन्तोष की साँस ली कि चलो अब पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया है।

तभी बलराम जी भी समुद्र तट पर बैठकर एकाग्र-चित्त से परमात्मचिन्तन करने लगे और अपने आत्मा को आत्मस्वरूप में ही स्थिर करके, संसार को छोड़ दिया।

जरा का शरीर कृष्ण के चरणों में तीर मारना

रामनिर्याणमालोक्य भगवान्देवकीसुतः।
निषसाद धरोपस्थे तुष्णीमासाद्य पिप्पलम्॥२७॥
बिभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया।
दिशो वितिमिराः कुर्वन्विधूम इव पावकः॥२८॥
- भागवत पुराण ११.३०.-२७-२८

अर्थात् :- जब देवकीसुत श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरे बड़े भाई बलराम जी परमपद में लीन हो गये, तब वे एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गये। भगवान श्रीकृष्ण ने उस समय अपनी चतुर्भुत रूप धारण कर लिया और धूम से रहित अग्नि के समान दिशाओं को अन्धकार रहित-प्रकाशमान बना रहे थे।

तो उस समय भगवान पीपल के पेड़ के नीचे अपनी दाहिनी जाँघ पर बायाँ चरण रखकर बैठे हुए थे, उस समय उनका लाल-लाल तलवा रक्त कमल के समान चमक रहा था।

मुषलावशेषायःखण्ड कृतेषुर्लुब्धको जरा।
मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशङ्कया॥३३॥
चतुर्भुजं तं पुरुषं दृष्ट्वा स कृतकिल्बिषः।
भीतः पपात शिरसा पादयोरसुरद्विषः॥३४॥
- भागवत पुराण ११.३०.-३३-३४

अर्थात् :- परीक्षित! जरा नाम का एक बहेलिया ने मूसल के बचे हुए टुकड़े से अपने बाण की गाँसी बना ली थी। उसे दूर से भगवान का लाल तलवा हरिन के मुख के जैसे जान पड़ा। उसने उसे वास्तव में हरिन समझकर अपने उसी बाण से बेध दिया। जब वह पास आया, तब उसने देखा कि ‘ये तो चतुर्भुज पुरुष हैं।’ इसलिये अपराध के डर के मारे काँपने लगा और भगवान श्रीकृष्ण के चरणों पर सिर रखकर धरती पर गिर पड़ा।

श्रीभगवानुवाच
मा भैर्जरे त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे।
याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम्॥
- भागवत पुराण ११.३०.३९

अर्थात् :- तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हे जरे! तू डर मत, उठ! यह जो तूने किया है वो मेरे मन का काम किया है। जा, मेरी आज्ञा से तू उस स्वर्ग में निवास कर, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े पुण्यवानों को होती है।

इत्यादिष्टो भगवता कृष्णेनेच्छाशरीरिणा।
त्रिः परिक्रम्य तं नत्वा विमानेन दिवं ययौ॥४०॥
दारुकः कृष्णपदवीमन्विच्छन्नधिगम्य ताम्।
वायुं तुलसिकामोदमाघ्रायाभिमुखं ययौ॥४१॥
- भागवत पुराण ११.३०.४०-४१

अर्थात् :- (शुकदेव जी कहते है कि परीक्षित!) भगवान श्रीकृष्ण तो अपनी इच्छा से शरीर धारण करते हैं। (यहाँ शरीर धारण का अर्थ है कि मनुष्य रूप में प्रकट होते है) जब उन्होंने जरा बहेलिया को यह आदेश दिया, तब उस जरा ने श्रीकृष्ण की तीन बार परिक्रमा की फिर नमस्कार किया और विमान पर सवार होकर के स्वर्ग को चला गया। उसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का सारथि दारुक भगवान के चरों पर पड़ी हुई तुलसी की गन्ध से युक्त वायु को सूँघकर, भगवान श्री कृष्ण के होने के स्थान का अनुमान लगता हुआ उनके सामने की ओर गया।

गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथः।
सङ्कर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मद्दशाम्॥४६॥
द्वारकायां च न स्थेयं भवद्भिश्च स्वबन्धुभिः।
मया त्यक्तां यदुपुरीं समुद्रः प्लावयिष्यति॥४७॥
स्वं स्वं परिग्रहं सर्वे आदाय पितरौ च नः।
अर्जुनेनाविताः सर्व इन्द्रप्रस्थं गमिष्यथ॥४८॥
त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः।
मन्मायारचितामेतां विज्ञयोपशमं व्रज॥४९॥
- भागवत पुराण ११.३०.४६-४९

अर्थात् :- (तब भगवान ने उससे कहा कि) ‘दारुक! अब तुम द्वारका जाओ और वहाँ यदुवंशियों के संहार, भैया बलराम जी की परमगति और मेरे स्वधाम गमन की बात कहो’। उनसे कहना कि ‘अब आप लोगों को अपने परिवार वालों के साथ द्वारका में नहीं रहना चाहिये। क्योंकि मेरे न रहने पर समुद्र उस नगरी को डुबो देगा। अतएव सब लोग अपनी धन-सम्पत्ति आदि और मेरे माता-पिता को लेकर अर्जुन के संरक्षण में इन्द्रप्रस्थ चले जायें। दारुक! तुम मेरे द्वारा बताई भागवत धर्म का आश्रय लो और ज्ञाननिष्ठ होकर सब की उपेक्षा कर दो तथा इस दृश्य को (जो यदुकुल का संहार हुआ है उसे) मेरी माया की रचना समझकर शान्त हो जाओ’।

यह आदेश पाकर दारुक ने श्री कृष्ण की परिक्रमा की और उनके चरणकमल को अपने सिर पर रखकर बारम्बार प्रणाम किया। उसके बाद दारुक उदास मन से द्वारका के लिये चल पड़ा।

श्रीशुक उवाच
अथ तत्रागमद्ब्रह्मा भवान्या च समं भवः।
महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनयः सप्रजेश्वराः॥१॥
पितरः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः।
चारणा यक्षरक्षांसि किन्नराप्सरसो द्विजाः॥२॥
द्रष्टुकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुकाः।
गायन्तश्च गृणन्तश्च शौरेः कर्माणि जन्म च॥३॥
ववृषुः पुष्पवर्षाणि विमानावलिभिर्नभः।
कुर्वन्तः सङ्कुलं राजन्भक्त्या परमया युताः॥४॥
- भागवत पुराण ११.३१.१-४

अर्थात् :- श्रीशुकदेव जी कहते हैं - परीक्षित! दारुक के चले जाने पर ब्रह्मा जी, शिव पार्वती जी, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, मुनि, पितर, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्नर, अप्सराएँ तथा द्विज आदि श्री कृष्ण के परमधाम-प्रस्थान को देखने के लिये बड़ी उत्सुकता से वहाँ पर आये। वे सभी श्री कृष्ण के जन्म एवं लीलाओं का गान कर रहे थे। उनके विमानों से सारा आकाश भर-सा गया था। वे बड़ी भक्ति से भगवान पर पुष्पों की वर्षा कर रहे थे।

भगवान्पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनो विभुः।
संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्मनेत्रे न्यमीलयत्॥५॥
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलम्।
योगधारणयाग्नेय्या दग्ध्वा धामाविशत्स्वकम्॥६॥
दिवि दुन्दुभयो नेदुः पेतुः सुमनसश्च खात्।
सत्यं धर्मो धृतिर्भूमेः कीर्तिः श्रीश्चानु तं ययुः॥७॥
देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि।
अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्चातिविस्मिताः॥८॥
- भागवत पुराण ११.३१.५-८

अर्थात् :- (श्रीशुकदेव जी कहते हैं कि -) तब सर्वव्यापक भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा जी और अपने विभूतिस्वरूप देवताओं को देखकर अपने आत्मा को स्वरूप में स्थित किया और कमल के सामन नेत्र बंद कर लिये। भगवान का शरीर उपासकों के ध्यान-धारणा का मंगलमय आधार है तथा समस्त लोकों के लिये परम आनंद देने वाला आश्रय है। इसलिये उन्होंने (योगियों की तरह) अग्नि योग धारणा के द्वारा शरीर को जलाया नहीं, अपितु सशरीर अपने धाम में चले गये। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। (श्री शुकदेव जी कहते हैं कि) परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे इस लोक से सत्य, धर्म, धैर्य, कीर्ति और श्रीदेवी (राधा जी) भी चली गयीं। भगवान श्री कृष्ण की गति, मन और वाणी के परे है। तभी तो जब भगवान अपने धाम में प्रवेश करने लगे, तब ब्रह्मादि देवता भी उन्हें न देख सके।

ध्यान दे यह ब्रह्मा भी श्री कृष्ण को न देख सके का अर्थ यह नहीं है कि इतना सामर्थ्य नहीं है। क्योंकि वास्तव में ब्रह्मा श्री कृष्ण ही तो है। अरे एक ही भगवान सनातन धर्म में होते है। अगर हम ब्रह्मा को अलग और कृष्ण को अलग मानेंगे तो सिद्धांत रूप से तो दो भगवान हो जायेंगे जो वेद विरुद्ध बात होगी। देवता नहीं देख सके वो तो ठीक बात है क्योंकि देवताओं में वो सामर्थ्य नहीं है और न ही देवता भगवान होते है। परन्तु ब्रह्मा जी तो भगवान है। अतएव ‘न देख सकने का’ लेखक हमें इशारे में समझाने का प्रयत्न कर रहे है कि श्री कृष्ण भगवान है उन्हें साधारण मनुष्य नहीं समझना चाहिये और ऐसा भी नहीं समझना चाहिये कि उनकी तो मृत्यु हो गयी।

अस्तु, तो श्री कृष्ण का किसी ने दाह संस्कार किया है? यह प्रश्न ही गलत है, क्योंकि न ही उन्होंने किसी शरीर को छोड़कर अन्य कोई और शरीर धारण किया है। वो शरीर सहित ही अपने धाम गये। इससे यह भी सिद्ध होता है की श्री कृष्ण का शरीर भी माया के पंचतत्व या पंचमहाभूतों से नहीं बना है। उनका शरीर दिव्य चिन्मय है क्योंकि श्री कृष्ण के लोक में कोई माया का शरीर नहीं जा सकता।

जो लोग यह कहा करते है कि श्री कृष्ण को कर्म-फल की वजह से ऐसी मृत्यु मिली (यानी जरा ने बाण मारा, जैसे राम ने बालि को बाण मारा था) तो वो भी बात नहीं है। क्योंकि राम ने तो जान कर बालि को बाण मारा, परन्तु यहाँ जरा को पता ही नहीं था की वो श्रीकृष्ण है। और फिर यह सिद्धांत तो यह कहता है कि कर्म-फल दाता (देने वाला) कर्म-फल के आधीन नहीं हो सकता और अगर मान लो हो भी जाये, तो माया के पंचतत्व या पंचमहाभूतों के मानव शरीर में की कर्म- फल भोगा जा सकता है। तो चुकी श्री कृष्ण का शरीर दिव्य है इसलिए वो कर्म- फल के आधीन नहीं है। हाँ, लीला में नाटक कर सकते है कि देखो हम कर्म का फल भोग रहे है। वास्तव में वो कर्म के बंधन से परे ही है।

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