राम जन्म भूमि का फैसला, इन श्लोकों और चौपाइयां का दिया गया प्रमाण

राम जन्म भूमि

सुप्रीम कोर्ट ने श्री राम जन्म भूमि मामले में 9 नवम्बर 2019 को फैसला सुनाया था, जिसमें Archaeological Survey of India के द्वारा प्राप्त मूर्तियाँ, खम्भे और अन्य प्रमाण भी दिए गए। उसमें पुराण, वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के प्रमाण भी दिए गए। अतः वो सब प्रमाण हम आपको इस लेख में बतायेंगे। यदपि सुप्रीम कोट ने सब प्रमाण इंग्लिश में दिए है, लेकिन हम आपको इसे हिंदी में बताएंगे। तो आइए जानते है की हमारे ग्रंथों की क्या भूमिका थी, जिस कारण से आज हम इस दिन को देख रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट से राम मंदिर जजमेंट की पीडीएफ डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें। यह जजमेंट हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। अस्तु, इस जजमेंट के 651 वें पन्ने पर स्कन्द पुराण का प्रमाण देते हुए ये कहा-

“I bow down to the immutable Rama, the Supreme Brahman whose eyes resemble lotus, who is as dark-blue as flower of flax (in complexion) and who killed Ravana. Great and holy is the City of Ayodhya which is inaccessible to perpetrators of evil deeds. Who would not like to visit Ayodhya wherein Lord Hari himself resided? This divine and splendid City is on the bank of the river Sarayu. It is on par with Amaravati (the capital of Indra) and is resorted to by many ascetics." (Srimad Skandpuranam .II.VIII… 29-31).

सुप्रीम कोर्ट में जिस स्कन्द पुराण का प्रमाण बताया गया वह Dr. G.V. Tagare के द्वारा अनुवाद किया गया है। इसलिए हमनें गीता प्रेस के संछिप्त स्कन्द पुराण की सहायता ली और इंगिलश में दिए गए प्रमाण को हिंदी में अनुवाद किया। गीता प्रेस के संछिप्त स्कन्द पुराण श्लोक सहित नहीं है, इसलिए हमनें श्लोक अन्य जगह से लिया है। तो उपर्युक्त प्रमाण का हिन्दी अनुवाद कुछ इस प्रकार है -

नमामि परमात्मानं रामं राजीवलोचनम्। अतसीकुसुमश्यामं रावणांतकमव्ययम्॥२९॥
अयोध्या सा परा मेध्या पुरी दुष्कृतिदुर्ल्लभा। कस्य सेव्या च नाऽयोध्या यस्यां साक्षाद्धरिः स्वयम्॥३०॥
सरयूतीरमासाद्य दिव्या परमशोभना। अमरावतीनिभा प्रायः श्रिता बहुतपोधनैः॥३१॥
- स्कन्द पुराण खण्ड २ (वैष्णव खण्ड) अयोध्या माहात्म्य अध्याय ०१

अर्थात् :- (सूतजी बोले-) मैं श्री राम को नमन करता हूँ, जो परमात्मा है, जिनकी आंखें कमल के समान है। अलसी के फूल की भाँति जिनकी श्याम कान्ति है और जिन्होंने रावण का वध किया है। अयोध्यापुरी परम पवित्र है, पापी मनुष्यों को इसकी प्राप्ति होनी बहुत कठिन है। उस अयोध्या की यात्रा करना कौन पसंद नहीं करेगा, जिसमें साक्षात् भगवान श्री हरि (राम) निवास करते है? वह पुरी सरयू नदी के तट पर है। वह दिव्य पुरी परम शोभा युक्त है। यह अमरावती (इंद्र की राजधानी) के बराबर है और प्रायः बहुत से तपस्वी महात्मा उसके भीतर निवास करते है।

जो स्कन्द पुराण में अयोध्या का वर्णन मिलता है वह आज उत्तर प्रदेश में वैसे ही मिलता है। अतः स्कन्द पुराण के इस प्रमाण से यह सिद्ध हुआ कि अयोध्या नमक स्थान सरयू नदी के तट पर है जिसमें रावण का वध करने वाले श्री राम रहते है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले में स्कन्द पुराण के प्रमाण में सरयू की महत्ता बताया गया है, जिससे अब यह प्रमाणित होता है कि सरयू,अयोध्या और श्री राम हिन्दुओं के लिए कितने महत्वपूर्ण है -

सरयूसलीले स्नात्वा पिण्डारकं च पूजयेत्। पापिनां मोहकर्त्तारं मतिदं कृतिनां सदा॥१५॥
तस्य यात्रा विधातव्या सपुष्या नवरात्रिषु। तत्पश्चिमदिशाभागे विघ्नेशं किल पूजयेत्॥१६॥
यस्य दर्शनतो नॄणां विघ्नलेशो न विद्यते। तस्माद्विघ्नेश्वरः पूज्यः सर्वकामफलप्रदः॥१७॥
- स्कन्द पुराण खण्ड २ (वैष्णव खण्ड) अयोध्या माहात्म्य अध्याय १०

अर्थात् :- सरयू के जल में स्नान करके पिण्डारक का पूजन करना चाहिये। ये पिण्डारक पापियों के लिये मोह उत्पन्न करने वाले और पुण्यात्माओं के लिये सदा ही विवेक प्रदान करने वाले हैं। इनकी यात्रा नवरात्रि में (चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में) जिस दिन पुष्य नक्षत्र हो (यह प्रायः नवमी तिथिको पड़ता है) उस दिन करनी चाहिये। पिण्डारक से पश्चिम दिशा में विघ्नेश (भगवान् गणेश) हैं, इनकी पूजा करनी चाहिये। विघ्नेश के दर्शन करने से मानव के समस्त विघ्न दूर होते हैं – विघ्न लेशमात्र भी बाधा नहीं पहुँचा सकते। विघ्नेश्वर सभी प्रकार के वाञ्छित फल (भोग) देने वाले हैं, अतः उनका पूजन करना चाहिये।

तो इस प्रमाण से यह सिद्ध हुआ कि हर वर्ष अयोद्धा में श्री राम जन्मोत्सव मनाया जाता था और है। क्योंकि नवरात्रि में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के नवमी के दिन पुष्य नक्षत्र में श्री राम का जन्म हुआ था। अतः इस श्लोक में कहा जा रहा है कि नवरात्रि (चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में और पुष्य नक्षत्र) में सरयू के जल में स्नान करके भगवान् गणेश की पूजा करनी चाहिये क्योंकि वो श्री राम जन्मोत्सव में होने वाले विघ्न को हर लेंगे। फिर आगे सुप्रीम कोट के जजमेंट में लिखा है -

तस्मात्स्थानत ऐशाने रामजन्म प्रवर्त्तते। जन्मस्थानमिदं प्रोक्तं मोक्षादिफलसाधनम्॥१८॥
विघ्नेश्वरात्पूर्वभागे वासिष्ठादुत्तरे तथा। लौमशात्पश्चिमे भागे जन्मस्थानं ततः स्मृतम्॥१९॥
यद्दृष्ट्वा च मनुष्यस्य गर्भवासजयो भवेत्। विना दानेन तपसा विना तीर्थैर्विना मखैः॥२०॥
नवमीदिवसे प्राप्ते व्रतधारी हि मानवः। स्नानदानप्रभावेण मुच्यते जन्मबन्धनात्॥२१॥
कपिलागोसहस्राणि यो ददाति दिनेदिने। तत्फलं समवाप्नोति जन्मभूमेः प्रदर्शनात्॥२२॥
आश्रमे वसतां पुंसां तापसानां च यत्फलम्। राजसूयसहस्राणि प्रतिवर्षाग्निहोत्रतः॥२३॥
नियमस्थं नरं दृष्ट्वा जन्मस्थाने विशेषतः। मातापित्रोर्गुरूणां च भक्तिमुद्वहतां सताम्॥२४॥
तत्फलं समवाप्नोति जन्मभूमेः प्रदर्शनात्॥२५॥
- स्कन्द पुराण खण्ड २ (वैष्णव खण्ड) अयोध्या माहात्म्य अध्याय १

अर्थात् :- विघ्नेश्वर के स्थान से ईशान (उत्तर-पूर्व दिशा) में रामजन्म-स्थान है। यह मोक्ष आदि सभी फलों को देने वाला कहा गया है। विघ्नेश्वर से पूर्व में तथा वसिष्ठ-स्थान से उत्तर में, लोमश-स्थान से पश्चिम दिशा में रामजन्म-स्थान है। रामजन्म-भूमि के दर्शन मात्र से बिना दान के, बिना तप के, बिना तीर्थयात्रा के तथा बिना यज्ञ किये ही मनुष्य की मुक्ति हो जाती है, उसे गर्भवास की प्राप्ति नहीं होती। रामनवमी के दिन रामनवमी ब्रत करने वाला स्नान,दान और तप के प्रभाव से जन्म, मरण के बंधन से छुटकारा प्राप्त कर लेता है। प्रतिदिन हजारों कपिला गायों के दान से जो फल मिलता है, वही फल जन्मभूमि के दर्शन-मात्र से मिल जाता है। आश्रम में निवास करने वाले तपस्वीजनों को जो फल मिलता है, यावज्जीवन अग्निहोत्र करने वाले को जो फल मिलता है, हजारों राजसूय यज्ञ करने वालों को जो फल मिलता है, माता, पिता तथा गुरु की सदा भक्ति करने वाले तथा यम-नियमादि ब्रतों के पालन में तत्पर संयमी सत्पुरुषों के दर्शन से जो फल मिलता है, वही फल श्रीरामजन्मभूमि के दर्शन-मात्र से मिल जाता है।

तो ये सब प्रमाण देने के बाद सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से वकील जफरयाब जिलानी ने कहा कि “राम जन्मभूमि स्थल का कोई प्रमाण न तो वाल्मीकि रामायण में और न ही रामचरितमानस में है।” - पेज नंबर 652

इसके उत्तर में पेज नंबर 654 पर रामचरितमानस से प्रमाण दिया गया, रामचरितमानस बालकाण्ड ‘जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि॥’ अर्थात् “यह सुहावनी पुरी (नगर) मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशा में जीवों को पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं।” आगे इस जगमेंट में वाल्मीकि रामायण द्वारा श्री राम जन्म का प्रमाण दिया गया, वो इस प्रकार है-

प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम्।
कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम्॥
- वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग १८.१०

अर्थात् :- कौसल्या देवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया।

सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कुल 1045 पन्नों का है। उनमें से 929 पन्नों का फैसला सारे जजों ने लिखा है और सभी 5 जज इस पर एकमत हैं। लेकिन एक जज ऐसे भी थे जिन्होंने अपना 116 पन्नों का फैसला अलग से भी दिया है। इसमें उन्होंने ये प्रमाणित किया है कि जिस जगह पर विवादित ढांचा था, वो भगवान राम का जन्मस्थान था। ये जज कौन हैं, उनका नाम इस फैसले में नहीं लिखा गया है। उन्होंने बहुत से तर्क दिए हैं। उन्होंने सबसे पहले 19 वें पन्ने पर लिखा है कि हिंदू शास्त्रों में अयोध्या को एक पवित्र नगर बताया गया है। बृहद धर्मोत्तर पुराण के एक श्लोक में अयोध्या को सात तीर्थ शहरों में से एक बताया गया है।

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची ह्मवन्तिका॥
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः।

अर्थात् :- अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काञ्ची, अवंतिका (उज्जैन) और द्वारावती (द्वारका) सात सबसे मोक्षदायी (पुरियाँ) हैं।

फिर उन्होंने पेज नंबर 31-32 पर वाल्मीकि रामयाण के बालकांड सर्ग १८ के ८ से १२ श्लोक का प्रमाण देते हुए लिखा कि श्री राम विष्णु के अवतार है जिन्हें कौशल्या ने जन्म दिया है। श्री राम अयोधा के राजा दशरथ और कौशल्या के पुत्र है। फिर उन्होंने रामयाण के बालकांड का उपर्युक्त श्लोक लिखा है - वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग १८.१० और फिर लिखा कि वाल्मीकि रामायण से ये बात साबित नहीं होती है कि श्रीराम का जन्म हुआ कहां था। बस ये लिखा है कि राम का जन्म अयोध्या में राजा दशरथ के महल में हुआ था। लेकिन इसका समाधान करने के लिए उन्होंने जजमेंट में स्कंद पुराण के अयोध्या महात्म्य का भी जिक्र किया। अयोध्या महात्म्य के १०वें अध्याय में ८७ श्लोक हैं। वो कहते है कि इनमें से कुछ श्लोकों में राम जन्मस्थान का प्रसंग है। जजमेंट के पेज 34-35 पर वो उपर्युक्त स्कन्द पुराण खण्ड २ (वैष्णव खण्ड) अयोध्या माहात्म्य अध्याय १० के श्लोक १८ से २५ तक का प्रमाण देते है। (इन प्रमाणों में दिशाओं के माध्यम से राम जन्म भूमि को बताया गया है।)

फिर जजमेंट के 48 वें पन्ने पर उन्होंने लिखा - “महाकाव्य वाल्मीकि रामायण जैसा कि ऊपर देखा गया है, जो ईसाई युग की शुरुआत से पहले की रचना थी जिसमें लिखा है कि अयोध्या में भगवान राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ के महल में हुआ था।"

फिर 65 वें पन्ने पर उन्होंने ने लिखा है कि “भगवान राम के जन्मस्थान को लेकर हिंदुओं की आस्था और विश्वास वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण जैसी पवित्र धार्मिक किताबों के आधार पर है और ये आस्था और विश्वास आधारहीन नहीं माना जा सकता है। क्योंकि ये पाया गया है कि सन् 1528 से पहले के समय में ऐसी पर्याप्त लिखित सामग्री उपलब्ध है, जिससे हिंदुओं का ये विश्वास है कि राम जन्मभूमि की मौजूदा जगह ही भगवान राम का जन्मस्थान है।"

इसके बाद 66 वें पन्ने पर राम जन्मस्थान को साबित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज ने 1528 से 31 अक्टूबर 1858 के समय का संकेत किया और इसमें सबसे पहले गोस्वामी तुलसीदास का संकेत किया, जिन्होंने 1574-75 में रामचरितमानस की रचना की थी। सुप्रीम कोट ने अपने फैसले में लिखा है कि वाल्मीकि रामायण की तरह ही रामचरितमानस का भी हिंदुओं में अपना अलग स्थान है। फैसले के 66 वें पन्ने पर रामचरित्रमानस का प्रमाण देते हुए लिखा गया-

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥1॥
कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा॥
ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नर भूपा॥2॥
तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥
नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ॥3॥
- श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड

अर्थात् :- हे मुनि, सिद्ध और देवताओं के स्वामियों! डरो मत। तुम्हारे लिए मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा और उदार (पवित्र) सूर्यवंश में अंशों सहित मनुष्य का अवतार लूँगा। कश्यप और अदिति ने बड़ा भारी तप किया था। मैं पहले ही उनको वर दे चुका हूँ। वे ही दशरथ और कौसल्या के रूप में मनुष्यों के राजा होकर श्री अयोध्यापुरी में प्रकट हुए हैं। उन्हीं के घर जाकर मैं रघुकुल में श्रेष्ठ चार भाइयों के रूप में अवतार लूँगा। नारद के सब वचन मैं सत्य करूँगा और अपनी पराशक्ति के सहित अवतार लूँगा।

जजमेंट के 67 वें पन्ने पर उन्होंने लिखा कि “उपरोक्त चौपाइयां केवल विष्णु को अवधपुरी, यानी अयोध्या में मानव रूप लेने का उल्लेख नहीं करती हैं, लेकिन चौपाइ में विशेष रूप से उल्लेख है कि वह दशरथ और कौसल्या के घर पर मानव रूप लेंगे। उपरोक्त चौपाइ न केवल अयोध्या में राम के जन्म का उल्लेख करते हैं बल्कि “एक जगह” की ओर इशारा करते हैं, जहां वे मानव रूप लेंगे, जो स्पष्ट रूप से “तिन्ह कें गृह” (दशरथ और कौसल्या के घर में) के शब्दों में दर्शाया गया।"

फिर 116 वें पर वो लिखते है - “इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला गया है कि मस्जिद और उसके बाद के निर्माण से पहले हिंदुओं की आस्था और विश्वास हमेशा से रहा है कि भगवान राम का जनमस्थान वह स्थान है जहां बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया है, जहां आस्था और विश्वास - दस्तावेज और मौखिक साक्ष्यों से सिद्ध होता है। जो ऊपर चर्चा की गई है।"

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस पर साल 2010 में फैसला सुनाया था। बाद में इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसका फैसला 9 नवम्बर 2019 में आया। इस पर हमारा मत है कि ये भारत वर्ष के साथ अन्याय हुआ, क्योंकि देर से किया गया न्याय अन्याय कहा गया है।

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