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सम्बन्ध का अर्थ, भगवान या संसार कौन हमारा सम्बन्धी है?

सम्बन्ध शब्द का अर्थ?
सम्बन्ध शब्द का क्या अर्थ होता है? हम लोग संसार और भगवान दोनों के लिए सम्बन्ध शब्द का प्रयोग करते हैं। तो प्रश्न यह है कि "संसार के लोग हमारे सम्बन्धी है या भगवान हमारे सम्बन्धी हैं?" इस प्रश्न के निवारण के लिए सर्वप्रथम सम्बन्ध शब्द का क्या अर्थ जानना प्रमुख है।
'सम्बन्ध' शब्द में, 'सम' उपसर्ग और 'बन्ध' धातु है।
'सम' का अर्थ सम्यक् होता है।
'सम्यक्' का अर्थ पूरी तरह से, चारों ओर से अथवा परिपूर्ण।
अर्थात सम्बन्ध शब्द का अर्थ होता है, 'चारों ओर से बंधन",'सब प्रकार से बंधन' अथवा 'परिपूर्ण बंधन' अथवा '१००% बंधन'

संसार (माता-पिता, भाई-बहन, जीजा, दामाद आदि) को हम लोग सम्बन्धी (रिश्तेदार, नातेदार, सम्बन्धी) कहते हैं। तो यह 'सम्बन्ध या सम्बन्धी' शब्द, क्या संसार (माता-पिता, भाई-बहन, स्री-पति आदि) पर लागू हो सकरा हैं? इस प्रश्न पर हम विचार करेंगे। और क्या 'सम्बन्ध अथवा सम्बन्धी' शब्द भगवान पर लागू हो सकता है? इस प्रश्न पर भी हम विचार करेंगे। और यह निर्णय करेंगे कि किस से हमारा वास्तविक सम्बन्ध है।

क्या 'सम्बन्ध' शब्द संसार (माता-पिता, स्री-पति आदि) पर प्रयोग हो सकता हैं?

हमारा सबसे बड़ा सम्बन्ध माता-पिता से होता हैं, पहला माता दूसरा पिता फिर भाई-बहन। पति-पत्नी का सम्बन्ध तो बहुत दूर का सम्बन्ध हैं, कहाँ के वो फिर उसके माता-पिता, यह तो केवल इस जन्म में ७ फेरे लिए, और उसका नाम पति-पत्नी हो गया, हमने यह पति-पत्नी का सम्बन्ध इस जन्म में बनाया। यह पति-पत्नी का सम्बन्ध बना-बनाया नहीं था। वेद कहता है बृहदारण्यकोपनिषद् २.४.५ "इस संसार में कोई भी किसी के सुख के लिए कर्म नहीं कर सकता, सोच नहीं सकता।" तो क्योंकि सब आपने सुख ले लिए कर्म करते हैं, इसलिए सब स्वार्थी हैं। तो यह जितने सम्बन्ध या सम्बन्धी हमारे संसार में हैं, इनको हम अपना सम्बन्धी इसलिए कहते है, क्योंकि "इनसे हमारे स्वार्थ की सिद्धि होती हैं।" और फिर यह संसार के लोग अर्थात हमारे सम्बन्धी कबतक हमारा साथ देंगे? यह अनिश्‍चित (पता नहीं कितने समय तक) एक बच्चा माँ के पेट से बहार आया और माँ मृत्यु को प्राप्त हो गयी। वह बच्चा को अभी यही नहीं पता 'माँ का होती है' और माँ चल बसी। दस दिन बाद पिता भी मृत्यु को प्राप्त हो गया।


अतएव, संसार के लोगों का सम्बन्ध इतना अनिश्‍चित हैं! कि एक छण (पल) का भरोसा नहीं। और अगर हम मान ले की हमारे माता-पिता जिंदा रहे, भाई-बहन जिंदा रहे, पति-पत्नी जिंदा रहे, जीजा-दामाद आदि सभी लोग जिंदा रहे, कोई भी १०० वर्ष तक नहीं मरे ही न। तब भी! अगर वह आपके अनुकूल रहे, आपके स्वार्थ की सिद्धि करे, तभी सम्बन्ध बना रहेगा। आप लोग जानते हैं, भाई-भाई, पिता-पुत्र एक दूसरे पर गोली चला देते है। पिता पुत्र को घर से बहार निकाल देता है।
अतएव एक तो संसार के लोगों का जीवन ही छणिक (कुछ समय के लिए) है और अगर संसार के लोगों का जीवन हमारे जीवन के बराबर भी मान ले तो उनके मन-बुद्धि का ठिकाना नहीं कब वे सम्बन्ध तोड़ दे और अगर वे सम्बन्ध न भी तोड़े और ❛हमरे साथ ही मरे जब हम मरे, तब भी माँ अपने कर्म के अनुसार जायेगी, पिता अपने कर्म के अनुसार जायेंगे, पत्नी अपने कर्म के अनुसार जायेगी।❜ सब लोग अलग-अलग जायेंगे। यानि संसार में जब तक सम्बन्ध था, वह स्वार्थ के आधार पर ही था। तो 'सम' का अर्थ परिपूर्ण और पूर्ण। अतएव संसार का सम्बंद न तो परिपूर्ण है क्योंकि स्वार्थ का है, और पूर्ण नहीं है क्योंकि छणिक (कुछ समय के लिए) है।

क्या 'सम्बन्ध' शब्द भगवान पर प्रयोग हो सकता है?

गीता १५.७ कहती है "भगवान से हमारा (जीवात्मा का) सम्बन्ध अनादि (जिसका प्रारंभ न हो), अनन्त, और सनातन या नित्य (सदा) है।" सुबालोपनिषत् ५.४ और भागवत ३.२५.३८ "भगवान हमारे माता-पिता, भाई सब कुछ है" श्वेताश्वतरोपनिषद ४.३ "तुम स्त्री, तुम कुमार और कुमारी और तुम बूढ़े हो कर लड़िया लेके चलते हो।" "त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव" यहाँ त्वमेव का अर्थ है 'तुम ही', और 'ही' का अर्थ होता है 'तुम्हारे सिवा कोई नहीं'
हम आत्मा हैं इसलिए आत्मा का परमात्मा के साथ सम्भन्ध नित्य (सदा) रहता हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद ४.६ "भगवान और आत्मा एक साथ एक ही स्थान पर रहते हैं।" अर्थात अगर हम लोग कुत्ते बिल्ली गधे घोड़े बनेंगे तो भगवान भी साथ जायेंगे। आप लोग जानते हैं, एक तरफ ऐसे नास्तिक लोग जो भगवान को गाली देते हैं, और एक तरफ महापुरुष लोग तुलसीदास, मीरा, नानक, प्रह्लाद आदि लोग हैं। भगवान! इन दोनों को इसी पृथ्वी का पानी देते हैं। अगर भगवान और आत्म का सम्बन्ध नहीं होता, तो भगवान कहते तुम नास्तिक लोग जैसे पानी पीओगे उसी छण मर जाओगे। परन्तु भगवान ऐसा नहीं करते। क्योंकि उनका और हमारा सम्बन्ध हैं, इसलिए चाहे नास्तिक हो या आस्तिक दोनों को भगवान इसी पृथ्वी का पानी पिलाते हैं। हम लोग भगवान से आपने सम्बन्ध को भूले हुए हैं लेकिन भगवान सर्वज्ञ (सब जानने वाला) हैं। वो कभी भी अपना और जीवात्मा का सम्बन्ध नहीं भूलते।

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