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क्या सब कुछ भगवान करता है? - वेद

क्या जो कुछ होता है वो भगवान करता है?
भगवान आत्मा को सदा शक्ति देते है जीवित (चेतन) रहने का। और केनोपनिषद १.५ , १.६, १.८ और भगवत १०.१३.५५ कहा है कि भगवान प्रत्येक इन्द्रिय मन बुद्धि में तत तत कर्म करने की शक्ति देता हैं।
बृहदारण्यकोपनिषद् ३.७.२२ "य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोन्तरो" अर्थात भगवान हमारे अंदर बैठे है, और भगवान अंदर बैठ कर कार्य करने की शक्ति देता है। हम क्या करना चाहे हो हम पर निर्भर करता हैं। जैसे पावर हाउस ने हमारे घर में पावर (बिजली) दे दिया। अब आप कमरा गर्म कीजिये, ठंडा कीजिये, या तार पकड़ के मर जाइये। ये सब आप की जिम्मेदारी है पावर हाउस इसका जिम्मेदार नहीं। पावर हाउस ने कृपा करके आपको पावर दे दी। अब आप उसका सदुपयोग करे या दुरूपयोग करे इसका दंड आप भोगें क्योंकि उसके करता आप हैं।
अब सोचिये अगर पावर हाउस वाला कहे कि मेरे बिना तुम्हारे जिले का एक बल्ब भी नहीं जल सकता। हाँ! हो सकता है, क्योंकि पावर हाउस ही तो बिजली देता है। उसी प्रकार भगवान भी प्रत्येक इन्द्रिय मन बुद्धि में तत तत कर्म करने की शक्ति देता हैं। तो अगर भगवान कर्म करने की शक्ति नहीं दे तो हम भी कोई भी कर्म नहीं कर सकते। इसी आधार पर कहा जाता है कि भगवान के बिना एक पत्ता नहीं हिल सकता।
तो ये जो सुना जाता हैं, कहीं-कहीं लिखा हुआ है, या आम अज्ञानियों में खास तोर से प्रचलित है, कि जो करता है कि वो भगवान कराता है, जो करे सो हरि करे होय कबीर कबीर, वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है इत्यादि जो आप सुना करते हैं। यहाँ तक की वेदान्त में भी एक सूत्र बना दिया। वेदान्त २.३.४१ "परात्तु तच्छु तेः" अर्थात 'उसको कराने वाला है अगर वो न करावे तो कोई कुछ नहीं कर सकता।' देखो कितना गोल-मॉल है भाषा में। अगर वो न करावे तो कोई कुछ नहीं कर सकता और भोले भाले लोग ने कहा ऐसा है! अब सुनें वालों ने कहा फिर ठीक हैं जब भगवान कराता है ये तो हम पहले से ही कह रहे थे।
लेकिन वास्तविकता यह है, कि एक प्रयोजन कर्ता होता है और एक प्रयोज्य कर्ता होता है। यानी भगवान पावर देता है, लेकिन कर्म करने का अधिकार आपको देता हैं। हम (जीव) कर्म करने में स्वतंत्र है लेकिन अपने कर्म के फल भोगने में परतंत्र है। अगर अच्छा कर्म किया तो उसका अच्छा फल भोगना पड़ेगा, आप मना नहीं कर सकते। वैसे ही बुरे कर्म का भी फल भुगतना पड़ेगा। जब बुरे कर्म का फल भोगने को होता है, तो आप ऐतराज करते है और सोचते हैं "भगवान ने ऐसा किया हमारे साथ।" अरे भगवान ने कुछ नहीं किया। तो और किसने किया? भगवान ने किया जो आप कहते है ये भी ठीक है क्योंकि वो तुम्हारे कर्म का फल दिया। लेकिन ये जो तुम को दंड दिया भगवान ने, ये क्यों दिया? कोई कैदी कहे कि जज ने हम को १० साल की सजा देदी, ये बदमाश जज। तो जज कहता है भैया मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ, तुमने ऐसे-ऐसे अपराध किये हैं, उनका प्रमाण मिल गया है, इसलिए हम दंड दिया है। ताकि तुम भविष्य में अपराध न कर करो।
तो भगवान कहते है कि तुमने कर्म किया ख़राब! उस समय तुमने नहीं सोचा की जब इसका फल भोगना पड़ेगा तो क्या होगा। तुमको उस समय सोचना चाहिए था। खराब-खराब खाना खाया। और जब बूढ़े हुए तो हार्ट अटैक आया, तो हम कहते कि हमारा दिल तो सही था ये हार्ट-अटके कैसे आया। अरे वो दिल खराब हो रहा था, युवा अवस्था में पता नहीं चला, जब एकदम हालत खराब हो गई तब तुमको समझ आया। ऐसे ही हम जब कोई गलत काम करते है वेद विरुद्ध शास्त विरुद्ध तो उस समय हम कहते है, "देखा जायेगा जो कुछ होगा।" तो अब जब आ गया, तो फिर देखा जायेगा! तो देखो उसको, भोगों अपने गलत किये हुए कर्मों का फल। क्यों ऐतराज करते को कि "मेरा एक बेटा था वो भी भगवान ने छीन लिया और हमारे पड़ोसी के ७ बेटे थे तो आठवां हो गया, ये कौन सा न्याय हैं भगवान का!" क्यों आप भगवान को कोसते हो।
भगवान फल देता है और कर्म करने की शक्ति देता हैं। ये दोनों बात पर ध्यान दो। सारी बात इन्हीं पर निर्भर करती हैं। भगवान इन्द्रिय मन बुद्धि आत्मा में कर्म करने की शक्ति देता है और हमारे बिना तनख्वाह (वेतन) दिए वो हमारे पूर्व कर्मों का फल देता हैं।
हमने कुछ नहीं किया और हमें अमुक फल मिल गया। तो ये मिल गया ये कोई आसमान से नहीं गिरा। वो जो तुम्हारे भीतर बैठा है भगवान! उसने फल दिया। भगवान हमारे अच्छे बुरे कर्मों का फल भुगवाता है। हम मना नहीं कर सकते। हमने अपने पूर्व जन्मों में जो साधना की थी उसका फल भगवान ने इस जन्म में दे दिया, जिसके कारण संसार से मन हटने लगा और हम भगवान की ओर हम तेजी से बढ़ गए। भगवान जो करता है अच्छा ही करता है। ये सब गलत बात है, क्योंकि ऐसा कहने का मतलब है कि सबकुछ भगवान ही करता हैं।

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