राजा नृग का उद्धार कैसे हुआ?

राजा नृग
नृग का उद्धार की कथा भागवत १०.६४.१०-३० और १०.३७.१७ में है।
राजा नृग प्राचीन काल के एक प्रतिष्ठा प्राप्त राजा थे, जो इक्ष्वाकु के पुत्र थे। राजा नृग अपनी दान के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। एक बार भूल से राजा नृग ने पहले दान की हुई गाय को फिर से दूसरे ब्राह्मण को दान दे दिया। लेकिन इसका ज्ञान राजा नृग को दान देते समय नहीं था, किंतु इसके फलस्वरूप ब्राह्मणों के शाप के कारण राजा नृग को गिरगिट होकर एक सहस्र वर्ष तक कुएँ में रहना पड़ा। अंत में कृष्ण अवतार के समय नृग का उद्धार हुआ।
भागवत के अनुसार एक बार प्रद्युम्न, चारुभानु और गदा आदि यदुवंशी राजकुमार घूमने के लिये उद्यान (बगीचा) में गये। वहाँ बहुत देर तक खेल खेलते हुए उन्हें प्यास लगी। वे सब जगह जल की खोज करने लगे। वे एक कुएँ के पास गये। उसमें जल नहीं था परन्तु एक बड़ा विचित्र जीव था। वह जीव एक बहुत बड़ा गिरगिट था। उसे देखकर उनके आश्चर्य में पड़गए। राजकुमारों ने सोचा उसे बाहर निकालने का प्रयत्न करने लगे। लेकिन राजकुमार ने गिरे हुए गिरगिट को चमड़े और सूत की रस्सियों से बाँधकर बाहर न निकाल सके। तब जिज्ञासा के कारण उन्होंने यह गजब का कथन श्री कृष्ण के पास जाकर बताया।
श्री कृष्ण उस कुएँ पर आये। उसे देखकर उन्होंने बायें हाथ से आसानी से उसको बाहर निकाल लिया। भगवान श्रीकृष्ण के हथेली का स्पर्श होते ही उसका गिरगिट-रूप जाता रहा और वह एक स्वर्गीय देवता के रूप में परिवर्तित हो गया। अब उसके शरीर का रंग सोने के समान चमक रहा था और उसके शरीर पर अद्भुत वस्त्र, आभूषण और फूलों के हार था। यद्यपि श्री कृष्ण जानते थे कि इस दिव्य पुरुष को गिरगिट-योनि क्यों मिली थी, फिर भी वह कारण साधारण व्‍यक्ति को मालूम हो जाय, इसलिये उन्होंने उस पुरुष से पूछा- "महाभाग! तुम्हारा यह रूप तो बहुत ही सुन्दर है। तुम हो कौन? मैं तो ऐसा समझता हूँ कि तुम अवश्य ही कोई श्रेष्ठ देवता हो। किस कर्म के फल से तुम्हें इस योनि में आना पड़ा था? हम लोग तुम्हारे बारे में जानना चाहते हैं। यदि तुम हम लोगों को वह बतलाना उचित समझो तो अपना परिचय अवश्य दो।"तो राजा ने सब बात बताई।
इसलिए वेद भागवत कहते है कि कर्म धर्म का पालन बहुत कठिन है और इसका फल स्वर्ग है जो कुछ दिन को मिलता है। उसके बाद वापस नर्क या पृथ्वी पर पशु-पक्षी बनाकर भेज दिए जाते है। इसलिए इनका पालन करना बेकार है।

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