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देवताओं का शिव से प्रार्थना, शिव का सिंगर व बारात - शिव विवाह कथा

शिव विवाह कथा
देवताओं ने शिवजी से ब्याह के लिए प्रार्थना किया। उन्होंने कहा कि हे शंकर! सब देवताओं के मन में ऐसा परम उत्साह है, वे अपनी आँखों से आपका विवाह देखना चाहते हैं।

शिव जी ब्याह के लिए राजी हुए

ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्री रामचन्द्रजी के वचनों को याद करके शिवजी ने प्रसन्नतापूर्वक कहा- 'ऐसा ही हो।' तब देवताओं ने नगाड़े बजाए और फूलों की वर्षा करके 'जय हो! सभी देवताओं के स्वामी की जय हो' ऐसा जयघोष करने लगे।

पार्वती के प्रेम की परीक्षा

उचित अवसर जानकर सप्तर्षि आए और ब्रह्माजी ने तुरंत ही उन्हें हिमाचल के घर भेज दिया। वो पार्वतीजी के के प्रेम की परीक्षा लेने गए। उन्होंने कहा कि "नारदजी के उपदेश से तुमने उस समय हमारी बात नहीं सुनी। अब तो तुम्हारा प्रण झूठा हो गया, क्योंकि महादेवजी ने काम को ही भस्म कर डाला।"
यह सुनकर पार्वतीजी बोलीं- हे मुनिवरों! आपने उचित ही कहा। आपकी समझ में शिवजी ने कामदेव को अब जलाया है। किन्तु हमारी समझ से तो शिवजी सदा से ही योगी, अजन्मे, अनिन्द्य, कामरहित और भोगहीन हैं और यदि मैंने शिवजी को ऐसा समझकर ही मन, वचन और कर्म से प्रेम सहित उनकी सेवा की है। वे कृपानिधान भगवान मेरी प्रतिज्ञा को सत्य करेंगे। आपने जो कहा कि शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया, यही आपका (सप्तर्षि का) मूर्खतापूर्ण बात है। हे मुनिवरों! अग्नि का तो यह सहज स्वभाव ही है कि ठंढ उसके समीप कभी जा ही नहीं सकता और अगर जायेगा तो वह अवश्य नष्ट हो जाएगा। महादेवजी और कामदेव के संबंध में भी यही न्याय की बात समझना चाहि।
पार्वती के यह वचन सुनकर और उनका प्रेम तथा विश्वास देखकर, मुनि बड़े प्रसन्न हुए। वे भवानी को सिर नवाकर चल दिए और हिमाचल के पास पहुँचे।

लग्नपत्रिका शिव विवाह

फिर हिमाचल (हिमनरेश हिमावन - पार्वती के पिता) ने श्रेष्ठ मुनियों को आदरपूर्वक बुला लिया और उनसे शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी शोध कर वेद की विधि के अनुसार शीघ्र ही लग्न निश्चय कराकर लिखवा लिया। फिर हिमाचल ने वह लग्नपत्रिका सप्तर्षियों को दे दी। उन्होंने जाकर वह लग्न पत्रिका ब्रह्माजी को दी। ब्रह्माजी ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, यह सुनकर सब मुनि और देवता हर्षित हो गए। आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, बाजे बजने लगे और दसों दिशाओं में मंगल कलश सजा दिए गए।

शिव का सिंगर

शिव
सब देवता अपने-अपने वाहन और विमान को सजाने लगे, मंगल शकुन भी होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं। शिवजी के गण शिवजी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिवजी ने साँपों के ही कुंडल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया। शिवजी के सुंदर मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगाजी, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी। इस प्रकार उनका वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम और कृपालु हैं। एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिवजी को देखकर देवांगनाएँ (देवताओं की स्त्री) मुस्कुरा रही हैं और कहती हैं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में नहीं मिलेगी।

विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं का शिव को छोड़ कर जाना

विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर बारात में चलने लगे। देवताओं का समाज परम सुंदर था, पर दूल्हे के योग्य बारात न थी। तब विष्णु भगवान ने सब दिक्पालों को बुलाकर हँसकर ऐसा कहा कि "सब लोग अपने-अपने दल समेत अलग-अलग होकर चलो। हे भाई! हम लोगों की यह बारात वर के योग्य नहीं है। क्या पराए नगर में जाकर हँसी कराओगे?"

शिव बारात का विवरण

शिव बारात
विष्णु भगवान की बात सुनकर देवता मुस्कुराए और वे अपनी-अपनी सेना सहित अलग हो गए। महादेवजी (यह देखकर) मन-ही-मन मुस्कुराते हैं कि विष्णु भगवान के व्यंग्य-वचन नहीं छूटते! अपने प्यारे विष्णु भगवान के इन अति प्रिय वचनों को सुनकर शिवजी ने भी भृंगी को भेजकर अपने सब गणों को बुलवा लिया।
शिवजी की आज्ञा सुनते ही सब चले आए और उन्होंने शिव शंकर के चरण कमलों में सिर नवाया। तरह-तरह की सवारियों और तरह-तरह के वेष वाले अपने समाज को देखकर शिवजी हँसे। कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के कई हाथ-पैर हैं। किसी के बहुत आँखें हैं तो किसी के एक भी आँख नहीं है। कोई बहुत मोटा-ताजा है, तो कोई बहुत ही दुबला-पतला है। कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किए हुए है। भयंकर गहने पहने हाथ में कपाल लिए हैं और सब के सब शरीर में ताजा खून लपेटे हुए हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार के से उनके मुख हैं। इसी प्रकार, बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगिनियों की जमाते हैं। भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं, वे सब बड़े मौज में हैं। देखने में बहुत ही बेढंगे लगते हैं और बड़े ही विचित्र ढंग से बोलते हैं।
जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥
भावार्थ:- जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बारात बन गई है। मार्ग में चलते हुए भाँति-भाँति के कौतुक (तमाशे) होते जाते। इधर हिमाचल ने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका उल्लेख नहीं हो सकता।

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