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भगवान शिव जी के बारात के आगमन में क्या हुआ? - शिव विवाह कथा

 शिव विवाह कथा
हमने पिछले लेख में देवताओं का शिव से प्रार्थना, शिव का सिंगर व बारात - शिव विवाह कथा का विस्तार से विवरण किया है अबे आगे की कथा बताने जा रहे है।

पहले देवताओं व ब्रह्मा विष्णु बारात आये

देवताओं व ब्रह्मा विष्णु बारात को नगर के निकट आई। यह सुनकर नगर में चहल-पहल मच गई। अगवानी करने वाले लोग बनाव-श्रृंगार करके तथा नाना प्रकार की सवारियों को सजाकर आदर सहित बारात को लेने चले। देवताओं के समाज को देखकर सब मन में प्रसन्न हुए और विष्णु भगवान को देखकर प्रसन्न हुए।

भगवान शिव शंकर का आगमन

जब हिमाचल के लोगों ने शिवजी के दल को देखने लगे, तब तो उनके सब वाहन (सवारियों के हाथी, घोड़े, रथ के बैल आदि) डरकर भाग चले। कुछ बड़ी उम्र के समझदार लोग धीरज धरकर वहाँ डटे रहे। छोटे लड़के तो सब वहाँ से भागे। घर पहुँचने पर जब माता-पिता पूछते हैं, तब वे भय से काँपते हुए शरीर से कुछ ऐसा बोले - "क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती। यह बारात है या यमराज की सेना? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है। साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं। दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, साँप और कपाल के गहने हैं, वह नंगा, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं, जो बारात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य हैं और वही पार्वती का विवाह देखेगा।" लड़कों ने सब घर यही बात कही।
महेश्वर (भोले) का समाज समझकर सब लड़कों के माता-पिता मुस्कुराते हैं। उन्होंने बहुत तरह से लड़कों को समझाया कि निडर हो जाओ, डर की कोई बात नहीं है। जो आगे लोग थे वो लोग बारात को लेकर आये, उन्होंने सबको सुंदर जनवासे ठहरने को दिए। मैना (पार्वतीजी की माता) ने शुभ आरती सजाई और उनके साथ की स्त्रियाँ उत्तम मंगलगीत गाने लगीं। सुंदर हाथों में सोने का थाल शोभित है, इस प्रकार मैना हर्ष के साथ शिवजी का परछन करने चलीं। जब महादेवजी को भयानक वेष में देखा तब तो स्त्रियों के मन में भय होने लगा।

पार्वती की माता मैना ने किया शादी से इंकार

बहुत ही डर के मारे वो भागकर घर में घुस गईं और भोले जहाँ जनवासा था, वहाँ चले गए। मैना (पार्वती की माता) को  बड़ा दुःख हुआ, उन्होंने पार्वतीजी को अपने पास बुला लिया। और अत्यन्त स्नेह से अपने नीलकमल के समान नेत्रों में आँसू भरकर कहा - "जिस विधाता ने पार्वती तुमको ऐसा सुंदर रूप दिया, उस मूर्ख विधाता ने तुम्हारे दूल्हे को बावला कैसे बनाया? जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिए, वह जबर्दस्ती बबूल में लग रहा है। मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में कूद पड़ूँगी। चाहे घर उजड़ जाए और संसार भर में अपकीर्ति फैल जाए, पर जीते जी मैं इस बावले दूल्हे से तुम्हारा विवाह न करूँगी पार्वती!
रानी मैना को दुःखी देखकर सारी स्त्रियाँ व्याकुल हो गईं। मैना अपनी बेटी प्रवति के स्नेह को याद करके विलाप करती, रोती और कहती - "मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वती को ऐसा उपदेश दिया कि जिससे उसने बावले वर के लिए तप किया।" नारद जी ने रानी मैना और पार्वती से कहा की अच्छा वर चाहिए तो पार्वती को तप करना होगा।

पार्वती का माँ मैना को समझाना

माता को चिंतित देखकर पार्वतीजी विवेक युक्त कोमल वाणी बोलीं - "हे माता! जो विधाता रच देते हैं हमारे कर्म अनुसार भाग्य, वह टलता नहीं, ऐसा विचार कर तुम चिंता मत करो!
करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥
भावार्थ:-जो मेरे कर्म अनुसार भाग्य में बावला ही पति लिखा है, तो किसी को क्यों दोष लगाया जाए किसी को? हे माता! क्या विधाता के अंक तुमसे मिट सकते हैं? निरर्थक कलंक का टीका मत लो।
पार्वतीजी के ऐसे विनय भरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और भाँति-भाँति से विधाता को दोष देकर आँखों से आँसू बहाने लगीं।

नारद जी ने पार्वती की वास्तविकता बताया

इस समाचार को सुनते ही हिमनरेश हिमावन (पार्वती के पिता) उसी समय नारदजी और सप्त ऋषियों को साथ लेकर रानी मैना के पास गए। तब नारदजी ने पूर्वजन्म की कथा सुनाकर सबको समझाया और कहा कि -
"हे मैना! तुम मेरी सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह लड़की साक्षात जगज्जनी भवानी है। ये अजन्मा (जिसका जन्म नहीं हुआ), अनादि (जिसका प्रारम्भ न हो) और अविनाशिनी (जिसका कभी भी किसी काल में नाश न हो) ये वो शक्ति हैं। सदा शिवजी के अर्द्धांग (आधे अंग) में रहती हैं।"
अर्द्धांग
फिर नारद जी ने कहा "ये जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली हैं और अपनी इच्छा से ही लीला शरीर धारण करती हैं। एक बार इन्होंने शिवजी के साथ आते हुए राह में रघुकुल रूपी कमल के सूर्य श्री रामचन्द्रजी को देखा, तब इन्हें मोह हो गया और इन्होंने शिवजी का कहना न मानकर भ्रमवश सीताजी का वेष धारण कर लिया। सतीजी ने जो सीता का वेष धारण किया, उसी अपराध के कारण शंकरजी ने उनको त्याग दिया। फिर शिवजी के वियोग में ये अपने पिता के यज्ञ में जाकर अपनी इच्छा से वहीं योगाग्नि से भस्म हो गईं। अब इन्होंने तुम्हारे घर जन्म लेकर अपने पति के लिए कठिन तप किया है ऐसा जानकर संदेह छोड़ दो, पार्वतीजी तो सदा ही शिवजी की पत्नी हैं।"

पार्वती की माता मैना ने दिया शादी की मंजूरी

तब नारद के वचन सुनकर सबका विषाद मिट गया और क्षणभर में यह समाचार सारे नगर में घर-घर फैल गया। तब मैना और हिमवान आनंद में मग्न हो गए और उन्होंने बार-बार पार्वती के चरणों की वंदना की। स्त्री, पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध नगर के सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए।
नगर में मंगल गीत गाए जाने लगे और सबने भाँति-भाँति के सुवर्ण के कलश सजाए। पाक शास्त्र में जैसी रीति है, उसके अनुसार अनेक भाँति की रसोई बनी। भोजन करने वालों की बहुत सी पंगतें बैठीं। चतुर रसोइए परोसने लगे। स्त्रियों की मंडलियाँ देवताओं को भोजन करते जानकर कोमल वाणी से गालियाँ देने लगीं।

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