स्वार्थ शब्द का अर्थ क्या है? क्या हम स्वार्थी है?

क्या हम स्वार्थी है?

स्वार्थ का अर्थ

'स्व' संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है - अपना। इसलिए 'स्व' का अर्थ है अपना। 'अपना' का अर्थ क्या है? अपना का अर्थ होता है - मैं का। अब 'मैं का' अर्थ क्या है? मैं का दो अर्थ होता है -
१. ज्ञानीयों का मैं - 'मैं' = आत्मा।
२. अज्ञानीयों का मैं - 'मैं' = शरीर।

कौन स्वार्थी है?

तो जैसा की समस्त शास्त्र वेद पुराण कहते है श्वेताश्वतर उपनिषद् १.१२ कि तीन तत्व है - जीव, माया और भगवान। अतएव जो ज्ञानी है, जिसने भगवान से अपना लक्ष्य सिद्ध करने का अर्थ (लक्ष्य) बनाया, वो भगवान सम्बन्धी स्वार्थी है। और जिसने माया जगत से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का सिद्धांत बनाया, वो अज्ञानी स्वार्थी है। इसलिए दोनों स्वार्थी प्रत्येक छण (हर पल) है। दोनों अपने स्वार्थ के लिए निरंतर प्रयत्न (कोशिश) कर रहे है।

'अर्थ' शब्द का अर्थ

हमने अपने लेख में बताया है कि कोई भी जीव एक छण को अकर्मा (बिना कर्म किये) नहीं रह सकता। जैसा कि हमने अभी आपको बताया कि 'स्व' शब्द का अर्थ दो है। लेकिन 'अर्थ' शब्द का अर्थ एक है। 'अर्थ' का अर्थ है - अभिप्राय, मतलब, प्रयोजन, उद्देश्य, लक्ष्य।

ज्ञानी और अज्ञानी दोनों स्वार्थी है।

हमने आपको अपने लेख में बताया है कि संसार में प्रतेक व्यक्ति आनंद ही चाहता है। तो अज्ञानी का भी अर्थ है आनंद प्राप्ति और ज्ञानी का भी अर्थ आनंद प्राप्ति। अर्थात जो शरीर को 'मैं' मानता है वो भी आनंद के लिए ही प्रयत्न कर रहा है और जो आत्मा को 'मैं' मान रहा वो भी आनंद के लिए ही प्रयत्न कर रहा है। इसलिए दोनों लोग स्वार्थी है। अगर कोई बाबा जी आपको मिले तो वो भी स्वार्थी है क्योंकि वो भगवान सम्बन्धी सुख चाहते है और जो अज्ञानी लोग है अपने आप को जो शरीर मानते है, जो संसार (माया) सम्बन्धी सुख (माँ-पिता, पति-पत्नी का प्यार, मान-सम्मान, धन) चाहता है वो भी आनंद चाहता है। अवश्य पढ़े सभी लोग स्वार्थी है, क्यों और कैसे?
तो चुकी सब स्वार्थी है इसलिए किसी के स्वार्थी कहने पर हमे बुरा नहीं मानना चाहिए। यह हम लोगों का स्वभाव है। आत्मा का स्वभाव है आनंद चाहना। तुलसीदास लिकते है, श्रीरामचरितमानस किष्किंधाकाण्ड, शिव जी पार्वती जी से कह रहे है कि
सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति॥
भावार्थ : देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति (आचरण) है कि स्वार्थ के लिए ही सब प्रीति (प्रेम) करते है।
तो हर व्यक्ति अपने स्वार्थ (सुख / आनंद) के लिए किसी से प्रेम करते है। वो चाहे जड़ (नशीले पदार्थ, मोबाइल, खाना) हो या चेतन (माता-पिता, पति-पत्नी) हो।
अगर हमको यह पता लग जाये की असली स्वार्थ क्या है। तो हम असली स्वार्थ के लिए प्रयत्न करने लगे और असली स्वार्थ सिद्ध हो जायेगा। जैसे अगर हम असली दूध को मथे तो २ मिनट या आधा घंटा में माखन निकल आएगा। क्योंकि उस असली दूध में माखन है। और यदि चुने के पानी को माथे हजार जन्म, तबभी उसमे से माखन नहीं निकलेगा क्योंकि चुने के पानी में माखन नहीं होता।
ऐसे ही भगवान आनंद स्वरुप है। यदि अपने को आत्मा मानकर भगवान से अपना स्वार्थ मानकर प्रयत्न (कोशिश) करें, तो एक जन्म दो जन्म दस जन्मों या हजार जन्म में भगवान की प्राप्ति हो जाएगी या आनंद की प्राप्ति हो जाएगी क्योंकि भगवान आनंद सिंधु है, और दूसरी तरफ संसार जगत में माया के जगत में अनंत जन्म में प्रयत्न किया लेकिन आनंद का लवलेश नहीं मिला। क्योंकि यह संसार चूने के पानी की तरह है यहाँ आनंद है ही नहीं।

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