क्या एलियंस होते है? - वेद विज्ञान

एलियंस होते है? - वेद विज्ञान

क्या एलियंस होते है? हिन्दू धर्म का एलियंस के बारे में क्या कहना है? जब लोग एलियंस की कल्पना करते हैं, तो वे आम तौर पर विज्ञान की कल्पना पर आधारित फिल्मों में जो देखते हैं उसके बारे में सोचते हैं। लेकिन, हम आपको हिंदू ग्रंथों में वर्णित सिद्धांतों के आधार पर, इस प्रश्न का उत्तर देंगे।

हमारे पास एक पृथ्वी ग्रह और एक सौर मंडल है, और इनमें किसी न किसी शरीर में आत्माएं रहती हैं। लेकिन, क्योंकि आत्माओं की संख्या असीमित है, इस बात को वेद ने इस प्रकार कहा-

एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित्।
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्॥१२॥
- श्वेताश्वतर उपनिषद् १.१२

अर्थात्:- तीन तत्व है। अनादि अनंत शाश्वत। एक ब्रह्म, एक जीव, एक माया।

तो आत्मा अनंत है। अतएव वे सभी एक ग्रह प्रणाली (one planetary system) में एक साथ मौजूद नहीं हो सकते हैं। अतएव अनंत ब्रह्माण्ड की आवश्यकता होगी।

वेद अनुसार भगवान ने इस ब्रह्माण्ड को प्रकट किया है, पृथ्वी ग्रह पर आत्मा को मनुष्य शरीर में जन्म देने का मौका दिया। जिसका मुख्य उद्देश्य यह है कि मनुष्य कर्म कर सकें, भगवान के बारे में जानें और जिस आनंद, सुख, शांति, प्यार को चाहता है वो उसे मिल सके। अतएव भगवान ने अनंत ब्रह्माण्ड बनाये क्योंकि अनंत आत्माएं है। अगर अनंत ब्रह्माण्ड नहीं होंगे तो फिर आत्मा मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त कर पायेगा। वेद कहता है कि एक मात्र मनुष्य शरीर में ही कर्म करने का अधिकार है। इस वक्त हम जिस ब्रह्माण्ड में है यह सबसे छोटा ब्रह्माण्ड है। इससे भी अनंत बड़े ब्रह्माण्ड है, तथा उनमें भी अनंत पृथ्वी है। इस बारे में वेद तथा पुराण इस प्रकार कहते है -

स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः।
यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति॥१५॥
- श्वेताश्वतर उपनिषद् ४.१५

अर्थात्:- वही समय पर समस्त ब्रह्माण्डों की रक्षा करने वाला, समस्त जगत का आधिपति (और) समस्त प्राणियों में छिपा हुआ है। जिसमें वेदज्ञ महर्षिगण और देवता लोग भी ध्यान द्वारा संलग्न हैं, उस (परमदेव परमेश्वर) को इस प्रकार जानकर (मनुष्य) मृत्यु के बंधनों को काट डालता है।

सप्तद्वीपैः सप्तनाकैः सप्तपातालसंज्ञकैः।
एभिर्लोकैश्च ब्रह्माण्डं ब्रह्माधिकृतमेव च॥१४॥
एवञ्चासंख्यब्रह्माण्डं सर्वं कृत्रिममेव च।
महाविष्णोश्च लोम्नां च विवरेषु च शौनक॥१५॥
- ब्रह्म वैवर्त पुराण खण्डः १ (ब्रह्म खण्ड) अध्याय ०७ १४-१५

संक्षिप्त भावार्थ:- सात द्वीप, सात स्वर्ग तथा सात पाताल– इन लोकों सहित जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, वह ब्रह्मा जी के ही अधिकार में है। शौनक! ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और महाविष्णु के रोमांच-विवरों में उनकी स्थिति है।

अर्थात् वेद पुराण के अनुसार, भगवान ब्रह्माण्ड का शासन करता है, जिसमें ब्रह्माण्डों की असीमित संख्या होती है जहां आत्माएं रहती हैं।

वे आत्माएं भी वैसे ही हैं जैसे हम (आत्मा) हैं। जो आत्मा के लक्षण हममे है वही उन अनंत जीवों में भी है। जैसे जो परम सुख की इच्छा हमे है वही उनको भी है। उनके मन में वही दोष और माया के गुण हैं जो हमारे में है।

इसका तातपर्य है कि अगर हम ब्रह्मांड में कहीं और जायेंगे, या शायद किसी अन्य पृथ्वी ग्रह पर पुनर्जन्म ले भी ले, परन्तु हमारी स्थिति बदलेगी नहीं। अर्थात् वही इच्छाओं के साथ जाएंगे, वही मन होगा और वही कर्म-फल भोगना पड़ेगा। जैसे इस पृथ्वी पर भोग रहे है।

हमारा कहना है कि हिंदू शास्त्रों के मुताबिक, हाँ, ब्रह्माण्ड में अन्य स्थानों में आत्माएं रहती हैं। लेकिन वे आपके जैसे ही हैं और वे हमारे लिए एलियं नहीं हैं - वे हमारी तरह एक ग्रह प्रणाली में मौजूद हैं।

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