जगन्नाथ मंदिर में रखा है भगवान कृष्ण का दिल? - महाभारत और भागवत पुराण अनुसार

क्या जगन्नाथ मंदिर में रखा है भगवान कृष्ण का दिल?

श्री जगन्नाथ पुरी के मंदिर में आज भी एक मूर्ति में सुरक्षित है श्रीकृष्ण का दिल! ऐसे बहुत से लेख आज-कल लोग प्रकाशिक कर रहे है। और कुछ लोगों ने तो श्रीकृष्ण के दिल की तुलना Marvel Cinematic Universe के Iron Man के Arc Reactor से कर दी। आश्रय तो यह है की बहुत से लोग इस पर विश्वास करते है। बिना यह जाने की श्री कृष्ण की मृत्यु हुई भी है या नहीं, क्या उनके शरीर को जलाया गया है या नहीं? अतः इस लेख में हम पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में श्री कृष्ण का दिल रखा है या नहीं, इसके बारे में प्रमाण द्वारा चर्चा करेंगे। लेकिन पहले जो कुछ लोगों की मान्यता है, वो जान लेते है।

जगन्नाथ पुरी मंदिर से जुड़ी श्री कृष्ण के हृदय की मान्यता

पुरी के मंदिर में भगवान जगन्नाथ (श्री कृष्ण), उनके भाई बालभद्र (बलराम) और बहन की काठ (लकड़ी) की मूर्तियां हैं। मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने अपने देह का त्याग किया, तब पांडवों ने उनके शरीर का दाह-संस्कार कर दिया। जब उनका अंतिम संस्कार किया गया तो उनके दिल (हृदय) को छोड़कर उनकी पूरी देह पंचतत्व में विलीन हो गई। उस दौरान कृष्ण का दिल जलता ही रहा। ऐसा होने पर ईश्वर ने पांडवों को आदेश दिया कि इसे जल में प्रवाहित कर दिया जाए। बाद में उस दिल ने लट्ठे का रूप ले लिया।

तब राजा इन्द्रद्युम्न, जो कि भगवान जगन्नाथ के भक्त थे, उनको यह लट्ठा मिला तो उन्होंने इसे जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्थापित कर दिया। उस दिन से लेकर आज तक वह लट्ठा भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर है। लेकिन हर १२ वर्ष के बाद जगन्नाथ पुरी मंदिर की तीनों मूर्तियां बदल दी जाती हैं। वह लट्ठा (श्री कृष्ण का दिल) पुराने मूर्ति से निकल कर नए मूर्ति में रख दी जाती है। मूर्ति बदलते वक्त पूरे शहर में बिजली काट दी जाती है। मंदिर के आसपास पूरी तरह अंधेरा कर दिया जाता है। मंदिर के बाहर सीआरपीएफ की सुरक्षा तैनात कर दी जाती है। उस समय मंदिर में कोई नहीं जाता। सिर्फ उसी पुजारी को मंदिर के अंदर जाने की इजाजत होती है जिन्हें मूर्तियां बदलनी होती हैं।

आश्चर्य कर देने वाली बात तो यह है कि इस लट्ठे (श्री कृष्ण के हृदय) को आज तक किसी ने नहीं देखा। क्योंकि वहाँ के पुजारियों का ऐसा भी मानना है कि अगर किसी व्यक्ति ने मूर्ति के अंदर स्थापित ब्रह्म को देख लिया तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। मंदिर के जिस पुजारी द्वारा इस मूर्ति को बदला जाता है। उनका इस बारे में कहना है कि, उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है और हाथ को कपड़े से ढक दिया जाता है। इसीलिए उन्होंने ना ही कभी उस लट्ठे को देखा और ना ही कभी उसे स्पर्श किया। अब वाकई में सच्चाई क्या है यह आज भी एक रहस्य है। लेकिन आज हम पुराणों के और महाभारत के प्रमाणों द्वारा इस रहस्य पर चर्चा करेंगे।

श्री कृष्ण की मृत्यु हुई कैसे?

यह जो मान्यता है, उसके केंद्र में स्वयं श्री कृष्ण है और उनकी मृत्यु है। श्री कृष्ण की मृत्यु ही इस मान्यता का आधार है, यही से मान्यता आरम्भ होती है। इसलिए, यदि इस आधार की जाँच-पड़ताल कर ले, तो आगे की जितनी भी बातें है वह अपने-आप सत्य या असत्य सिद्ध हो जाएँगी। तो, श्री कृष्ण की मृत्यु हुई कैसे? इस बारे में भागवत पुराण में विस्तार से कहा गया है, जिसे हमें इस लेख में बताया है। इस लेख में हम संछेप में भागवत पुराण और महाभारत दोनों के द्वारा साथ-साथ जानेंगे, जिससे दोनों में कोई अंतर है यह भी ज्ञात हो जाये-

रामनिर्याणमालोक्य भगवान्देवकीसुतः।
निषसाद धरोपस्थे तुष्णीमासाद्य पिप्पलम्॥२७॥
बिभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया।
दिशो वितिमिराः कुर्वन्विधूम इव पावकः॥२८॥
- भागवत पुराण ११.३०.२७-२८

अर्थात् :- जब देवकीसुत श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरे बड़े भाई बलराम जी परमपद में लीन हो गये, तब वे एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गये। भगवान श्रीकृष्ण ने उस समय अपनी चतुर्भुज रूप धारण कर लिया और धूम से रहित अग्नि के समान दिशाओं को अन्धकार रहित-प्रकाशमान बना रहे थे।

मुषलावशेषायःखण्ड कृतेषुर्लुब्धको जरा।
मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशङ्कया॥
- भागवत पुराण ११.३०.३३

अर्थात् :- जरा नाम का एक बहेलिया ने मूसल के बचे हुए टुकड़े से अपने बाण की गाँसी बना ली थी। उसे दूर से भगवान का लाल तलवा मृग (हिरण) के मुख के जैसे जान पड़ा। उसने उसे वास्तव में मृग समझकर अपने उसी बाण से बेध दिया।

यही सब महाभारत में भी इसी प्रकार मिलता है, महाभारत मौसल पर्व में यदुवंशियों का विनाश कैसे हुआ यह विस्तार से बताया गया है। महाभारत मौसल पर्व के चौथे अध्याय में कहा गया -

ततो गते भ्रातरि वासुदेवो जानन् सर्वा गतयो दिव्यदृष्टिः॥१७॥
वने शून्ये विचरंश्चिन्तयानो भूमौ चाथ संविवेशाग्र्यतेजाः।
- महाभारत मौसल अध्याय ४.१७-१८

अर्थात् :- भाई बलराम के परमधाम पधारने के पश्चात सम्पूर्ण गतियों को जानने वाले दिव्यदर्शी भगवान श्रीकृष्ण कुछ सोचते-विचारते हुए उस सूने वन में विचरने लगे। फिर वे श्रेष्ठ तेज वाले भगवान पृथ्वी पर बैठ गये।

जराथ तं देशमुपाजगाम लुब्धस्तदानीं मृगलिप्सुरुग्रः।
स केशवं योगयुक्तं शयानं मृगासक्तो लुब्धकः सायकेन॥२२॥
जराविध्यत् पादतले त्वरावांस्तं चाभितस्तज्जिघृक्षुर्जगाम
अथापश्यत् पुरुषं योगयुक्तं पीतांबरं लुब्धकोऽनेकबाहुम्॥२३॥
- महाभारत मौसल अध्याय ४.२२-२३

अर्थात् :- उसी समय जरा नामक एक भयंकर व्याध मृगों (हिरण) को मार ले जाने की इच्छा से उस स्थान पर आया। उस समय श्रीकृष्ण योगयुक्त होकर सो रहे थे। मृगों में आसक्त हुए उस व्याध ने श्रीकृष्ण को भी मृग ही समझा और बड़ी उतावली के साथ बाण मारकर उनके पैर के तलवे में घाव कर दिया। फिर उस मृग को पकड़ने के लिये जब वह निकट आया, तब योग में स्थित, चार भुजा वाले, पीताम्बरधारी पुरुष भगवान श्रीकृष्ण पर उसकी दृष्टि पड़ी।

ध्यान दे, महाभारत और भागवत पुराण दोनों में समानता है। दोनों में यही लिखा कि जब बलराम जी परमधाम चले गए तब श्री कृष्ण एक जगह बैठे और उन्होंने चतुर्भुत रूप धारण किया था। भागवत पुराण में स्पस्ट श्री कृष्ण के शरीर की दिव्यता बताई गयी कि चतुर्भुत रूप धारण कर लिया। वही महाभारत में कहा गया कि चार भुजा वाले, पीताम्बरधारी पुरुष, इन शब्दों से श्री कृष्ण के शरीर की दिव्यता बताई गयी। दोनों में जरा नामक बहेलिया का वर्णन है जो श्रीकृष्ण के पैर के तलवे को मृग के मुख के जैसे जान कर बाण से बेध दिया।

यहाँ आप ग्रंथों की महत्ता देखिये, भागवत पुराण श्री कृष्ण लीला की अंतरंग बातों को बताता है, वहीं महाभारत में इतिहास है इसलिए बस उन्ही चीजों का वर्णन है जो जाननी चाहिए। तो बाण लगने के बाद क्या हुआ? श्री कृष्ण ने जरा को क्षमा कर दिया। फिर भागवत पुराण ने कहा -

भगवान्पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनो विभुः।
संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्मनेत्रे न्यमीलयत्॥५॥
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलम्।
योगधारणयाग्नेय्या दग्ध्वा धामाविशत्स्वकम्॥६॥
- भागवत पुराण ११.३१.५-६

अर्थात् :- (श्रीशुकदेव जी कहते हैं कि -) तब सर्वव्यापक भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा जी और अपने विभूतिस्वरूप देवताओं को देखकर अपने आत्मा को स्वरूप में स्थित किया और कमल के सामन नेत्र बंद कर लिये। भगवान का शरीर उपासकों के ध्यान-धारणा का मंगलमय आधार है तथा समस्त लोकों के लिये परम आनंद देने वाला आश्रय है। इसलिये उन्होंने (योगियों की तरह) अग्नि योग धारणा के द्वारा शरीर को जलाया नहीं, अपितु सशरीर अपने धाम में चले गये।

अस्तु, तो श्री कृष्ण के शरीर को किसी ने जलाया यह प्रश्न ही गलत है, क्योंकि न ही उन्होंने किसी शरीर को छोड़कर अन्य कोई और शरीर धारण किया है। वो शरीर सहित ही अपने धाम गये। इससे यह भी सिद्ध होता है की श्री कृष्ण का शरीर भी माया के पंचतत्व या पंचमहाभूतों से नहीं बना है। उनका शरीर दिव्य चिन्मय है क्योंकि श्री कृष्ण के लोक में कोई माया का शरीर नहीं जा सकता। अब महाभारत का भी प्रमाण देखिये-

मत्वाऽऽत्मानं त्वपराद्धं स तस्य पादौ जरो जगृहे शङ्कितात्मा।
आश्वासयंस्तं महात्मा तदानीं गच्छन्नूर्द्ध्वं रॊदसी लक्ष्म्या॥२४॥
दिवं प्राप्तं वासवोऽथाश्विनौ च रुद्रादित्या वसवश्चाथ विश्वे।
प्रत्युद्ययुर्मुनयश्चापि सिद्धा गन्धर्वमुख्याश्च सहाप्सरोभिः॥२५॥
ततो राजन्भगवानुग्रतेजा नारायणः नारायणः प्रभवश्चाव्ययश्च।
योगाचार्यो रोदसी वयाप्य लक्ष्म्या स्थानं प्राप सवं महात्माप्रमेयम्॥२६॥
- महाभारत मौसलपर्व अध्याय ४.२४-२६

अर्थात् :- अब तो जरा अपने को अपराधी मानकर मन-ही-मन बहुत डर गया। उसने भगवान श्रीकृष्ण के दोनों पैर पकड़ लिये। तब महात्मा श्रीकृष्ण ने उसे आश्वासन दिया और अपनी कान्ति से पृथ्वी एवं आकाश को व्याप्त करते हुए वे ऊर्ध्‍वलोक में (देवलोक) चले गये। अन्तरिक्ष में पहुँचने पर इन्द्र, अश्विनी कुमार, रुद्र, आदित्य, वसु, विश्वेदेव, मुनि, सिद्ध, अप्सराओं सहित मुख्य-मुख्य गन्धर्वों ने आगे बढ़कर भगवान का स्वागत किया। राजन! तत्पश्चात जगत की उत्पत्ति के कारणरूप, उग्रतेजस्वी, अविनाशी, योगाचार्य महात्मा भगवान नारायण अपनी प्रभा से पृथ्‍वी और आकाश को प्रकाशमान करते हुए (अन्‍तर्धान हो) अपने अप्रमेयधाम को प्राप्त हो गये।

अस्तु, तो महाभारत और भागवत पुराण में अब तक समानता है और इनके प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि श्री कृष्ण के शरीर को जलाया नहीं गया, वे विष्णु स्वरूप में अन्‍तर्धान हो गए और अपने धाम चले गये। इसलिए जो श्री कृष्ण के शरीर जलने और हृदय को नदी में प्रवाह करने की बात है वो असत्य ही लगती है।

लेकिन, महाभारत में कृष्ण के शरीर को जलाने की बात भी कही गई है, वही भागवत पुराण में यह बात नहीं है। महाभारत में कृष्ण की मृत्यु को लेकर विरोधाभास है। एक तरफ तो महाभारत ने कहा की श्री कृष्ण अन्‍तर्धान हो गए फिर महाभारत ने यह भी कहा की अर्जुन के उनके शरीर को जलाया। महाभारत में कहा गया -

ततः शरीरे रामस्य वासुदेवस्य चोभयोः।
अन्वीक्ष्य दाहयामास पुरुषैराप्तकारिभिः॥
- महाभारत मौसलपर्व अध्याय ७.३१

अर्थात् :- तदनन्‍तर विश्वस्‍त पुरुषों द्वारा बलराम तथा वसुदेवनन्‍दन श्रीकृष्‍ण दोनों के शरीरों की खोज कराकर अर्जुन ने उनका भी दाह संस्‍कार किया।

इस श्लोक से पहले विस्तार से यह बताया गया की कैसे श्री कृष्ण के पिता वासुदेव जी के शव को कैसे नगर में ले जाया गया, उनकी अर्थी के आगे-आगे कौन थे, लोग कितने दुखी थे, कैसे अर्जुन ने उनको अग्नि दिया, यहाँ तक की अग्नि में लिप्त हुई लकड़ी का चट-चट आवाज करना, इत्यादि भी लिखा है। हम यह कहना चाहते है कि श्री कृष्ण के पिता वासुदेव जी की शव यात्रा तथा दाह संस्‍कार बहुत विस्तार से बताया गया, महाभारत मौसल अध्याय ७ के १६वे श्लोक से २८ श्लोक तक विस्तार से वर्णन है। लेकिन महान श्री कृष्ण के दाह संस्‍कार के विषय में केवल एक ही श्लोक है। इससे क्या लगता है? यदि श्री कृष्ण का दाह संस्‍कार हुआ होता तो उनके विषय में काम से काम तो ४-५ श्लोक में लिखा होता कि उस समय नगर का यह हाल था, कैसे अर्जुन ने दाह संस्‍कार किया इत्यादि।

आचर्य की बात तो यह है की अर्जुन आगे यह भी कहते है कि श्री कृष्ण तो अन्‍तर्धान हो गए। महाभारत मौसलपर्व अध्याय ८ श्लोक २४ ‘श्रुत्वैव हि गतं विष्णुं ममापि मुमुहुर्दिशः।’ अर्थात् :- “सर्वव्‍यापी भगवान श्रीकृष्‍ण अन्‍तर्धान हो गये, यह बात सुनते ही मुझे सम्‍पूर्ण दिशाओं का ज्ञान भूल जाता है।”

अतः श्री कृष्ण के दाह संस्‍कार के लिए केवल १ श्लोक वही उनके पिता के दाह संस्‍कार के लिए शव यात्रा यहाँ तक की अग्नि में पड़ी लकड़ी के जलने की आवाज तक का वर्णन लगभग १२ श्लोक में। साथ ही अर्जुन का एक ओर विश्वस्‍त पुरुषों द्वारा श्रीकृष्‍ण के शरीर को खोज कराकर उनका दाह संस्‍कार करना और दूसरी ओर श्री कृष्ण अन्‍तर्धान हो गए यह कहना इस श्लोक की विश्वसनीयता पर शंका होती है कि महाभारत मौसलपर्व अध्याय ७.३१ श्लोक मिलावटी तो नहीं है ।

यदि इस श्लोक को मिलावटी नहीं माने तो भी महाभारत में या भागवत पुराण में श्री कृष्ण के शरीर को जलाने के बाद, श्री कृष्ण का दिल जलता ही रहा, फिर ईश्वर ने पांडवों को आदेश दिया की इसे जल में प्रवाहित कर दो, फिर उस दिल का लट्ठे का रूप ले लेना - यह सब कही नहीं लिखा मिलता है।

तो, इस मान्यता के केंद्र में श्री कृष्ण की मृत्यु है और उस मृत्यु से जुडी बातें ही पुराण व महाभारत से प्रमाणित नहीं होती है। इसलिए आगे जो सब कुछ है वो प्रमाणित नहीं किया जा सकता है। अतः इसे हम आपके विवेक पर छोड़ते है की आप इसे अभी-भी मान्यता मानते है या नहीं। वैसे यह मान्यता न मानने पर भी हमारा प्रेम जगन्नाथ जी में उतना ही है।

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