शरद पूर्णिमा क्यों मनाते है?

महारास
हम लोग शरद पूर्णिमा को रात्रि में खीर रख कर के १२ बजे के बाद खा लेते है और हम लोग सोचते है की शरद पूर्णिमा बास यह है। इस शरद पूर्णिमा को महारास हुआ था। श्री कृष्ण के अपना प्यार गोपिओ को दिया था। ये सब हम लोग भूल गए। अरे इस प्रेम को तो बड़े-बड़े संत महापुरुष चाहते थे और है, यहाँ तक की भोले नाथ भी। शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं।
महारास महारास! ये शब्द आप लोग बहुत बार सुना होगा। महारास एक रत का नहीं था, भागवत १०.२२.२७ वो तो ब्रह्म रात्रि तक रास हुआ है। तमाम वर्षकी एक रात्रि बन गयी थी! योग माया के द्वारा। शरद पूर्णिमा अथवा महारास, कुछ लोग समझते है की इस दिन गोपियो को श्री कृष्ण ने आपन प्रेम दिया था। हाँ वो लोग सही है। लेकिन ये पूर्णतः सत्य नहीं है। उन्होंने तो प्रेम तो पहले ही दे दिया था, परन्तु! गोपियों को राधा-कृष्ण ने अपना अंतिम प्रेम समर्था रति वाला, वो प्रेम शरद पूर्णिमा के दिन दिया था। इसलिए भक्तों के लिए शरद पूर्णिमा सबसे बड़ा पर्व है।
एक बात बताये रहस की; बता देते है, आप लोग समझे या न समझे। भागवत १०.२९ .६ गोपिया जो थी विवाहिता! उनके पतियों के साथ शारीरिक शम्बंद नही हुआ था। विवाह हो गया था। और भागवत१०.२९.९ गोपियो ने श्याम सुन्दर के मुरली का धुन सुना महारास के समय; तो अपने बच्चो को दूध पिलाती हुई पटक कर भागी। अब सोचिए! जब पति से शारीरिक सम्बंद नहीं था! तो शिशु किसे हुए? और सोचिए दूध पिलाती हुई माता(गोपिया) शिशुओ पटक कर भागी। ये नहीं सोचा गोपियों ने की किसी को देकर जाये, की "थोड़ा तुम संभाल लो मुझे ज़रूरी काम आगया है", या "पेट में दर्द हो गया है", कोई बहाना बना लेती काम से काम। ऐसा कुछ नहीं किया। मुरली सुनते ही बच्चे को यु पटक और यु भागी। इतना समय नहीं है, की किसी को दे कर जाये की थोड़ा तुम सम्हाललो। अगर एक तरफ कंघी किये है तो वैसे ही भागी, अगर एक पैर में छागल पीना है और दूसरा पहने जा रही है तो बीन पहने है भागी, और कोई कोई मन लो कंचुकी(ब्लाउज) पहनने जा रहे थी और मुरली बजी तो चोली लेके भागी, पहनने का होश नहीं। वो मुरली नहीं थी वो ऐसे मुरली थी की गोपिओ का प्राण खीचा चला जा रहा था। आप लो अब सोच रहें होंगे की ये सब क्या हो रहा है

अरे! आप लोग ने थोड़ी बहुत झांकी सुनी होंगे अथवा देखि होगी। मिलिट्री में , जब अलार्म बचत है खतरे का, तो वहाँ ऑर्डर होता है, की अगर तुमने पेंट न पहिने हो तो मत पहने और भागो। यहाँ तो डर के मरे भाग रहे है वहां प्यार के मरे भाग रही थी। मेरा ये कहना है की ये सब जो कुछ हुआ ये सब योग माया से हुआ।महारास एक रत का नहीं था, भागवत १०.२२.२७ वो तो ब्रह्म रात्रि तक रास हुआ है। तमाम वर्षकी एक रात्रि बन गए है! योग माया के द्वारा। भगवान ने तमाम रात्रियो को मिला कर एक रात बनाया योग माया से। आप लोग ये न सोचे की बहुत बड़ा काम करना पड़ा होगा भगवान को। अरे ये काम तो छोटे मोती योगी लोग कर लेते है।अस्तु इतनी लंबी रात्रि में सारा संसार सोता रहा सुसुकती अवस्ता में, किसी को पता नहीं है इतनी बड़ी रत हो गयी।
जब महारास हुआ था और जो स्त्रियां विवाहिता थी जब वो श्याम सुन्दर के पास गयी। भागवत१०.३३.३७ उन के पातियो को भी नहीं मालूम पड़ा की उनकी स्त्रियां कहा गयी है। उनके पातियो ने येही महसूस किया की हमारी पत्नी हमारे पास है, आलिंगित (गले लगने की अवस्ता) अवस्ता में हमारी खाट पर है, टटोल-टटोल कर देखते रहे, "ये यही है! ये नहीं गई!"। लेकिन सब चली गई थी। ये सब योग माया के द्वारा भगवन ही उनकी(पातियो) के स्त्री बन के उनके साथ थे। ताकि उनको भ्रम न हो।
ये योग माया की बात है इस में एक सेकंड का समय नहीं लगता और सब हो जाता है। भगवान बस सोचते है और सब हो जाता है, भगवन को कुछ करना नहीं पड़ता। योगमाया उनकी नोकरानी है अंतरंग सकती है वो सब कर देती है। तो ये है महत्त्व शरद पूर्णिमा का। जो भक्त इस दीन का महत्त्व जानते हैं, वे भक्त सारी रात जग कर भगवत नाम संग कीर्तन करते हैं की "आज वो दिन है, जिस दिन मेरे प्रियतम, प्राणवल्लभ ने आपन प्रेम गोपियो को दिया था, हम भी उन गोपियो की तरह उस निष्काम प्रेम मभावसे प्रभु की भक्ति करके उनकी प्राप्ति करे।"

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