कर्म क्या है? कर्म की परिभाषा? - गीता के अनुसार

कर्म क्या है?- गीता के अनुसार

कर्म क्या है, उसकी परिभाषा क्या है? यह ऐसे प्रश्न है जिन्हें जानना आवश्यक है। क्योंकि अगर आप शास्त्र, वेद, गीता, पुराण आदि को पढ़ेंगे। तो उनमें कर्म-अकर्म, शुभ-अशुभ कर्म, कर्मयोग, कर्मसंन्यास, कर्म-बंधन आदि की व्याख्या की है। परन्तु, कर्म क्या है? कर्म की परिभाषा क्या है? यह स्पष्ट रूप से हमें ज्ञात नहीं हो पाता। कर्म को जानने की गंभीरता पर महाभारत वनपर्व ३२.९ ने कहा ‘कृतं हि योऽभिजानति सहस्रे सोऽस्ति नास्ति च।’ अर्थात् “हजारों में कोई एक ही होगा जो कर्म को अच्छी प्रकार करना जानता हो।” अतएव कर्म के विषय में जानना अति आवश्यक है।

कर्म क्या है?

कर्म के विषय में गीता ३.५ ने कहा ‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्’ अर्थात् “कोई भी मनुष्य, किसी भी अवस्था में, क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता।” यानी हर क्षण (पल) मनुष्य कर्म कर रहा है। क्योंकि हम चार तरीके से कर्म करते हैं।

१. विचारों के माध्यम से। जैसे किसी के बारे में कुछ सोचना।
२. शब्दों के माध्यम से। जैसे किसी को कुछ कहना।
३. क्रियाओं के माध्यम से जो हम स्वयं करते हैं।
४. क्रियाओं के माध्यम से जो हमारे निर्देश पर दूसरे करते है।

इसका मतलब यह है कि वह सब कुछ जो हमने सोचा, कहा, किया या कारण बने - यह कर्म हैं। यानी हमारा सोना, उठना, चलना, बोलना, खाना, कुछ करना सभी कर्म के अंतर्गत आते है।

कर्म की परिभाषा क्या है?

कर्म की परिभाषा करना कठिन है। क्योंकि जैसा की हमने बताया कि ग्रंथों ने आसक्ति, कर्तव्य, शुभ-अशुभ, योग, भक्ति आदि को ध्यान में रखते हुए परिभाषा की है। एवं बहुत ही कम जगह पर स्पष्ट रूप में कर्म की व्याख्या की है। फिर भी गीता १८.१५ ने कहा ‘शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म’ अर्थात् “शरीर, वाणी और मन से की गयी क्रिया कर्म है।” यानी शरीर-निर्वाह-संबंधी क्रियाएँ; नींद, चिंतन आदि क्रियाएँ और समाधि आदि क्रियाएँ ये सब कर्म ही है। इसी कर्म की परिभाषा को ध्यान में रखते हुए जो गीता ३.५ में कहा कि कोई भी मनुष्य, किसी भी अवस्था में, क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। क्योंकि हर पल मनुष्य मन, शरीर और वाणी से कुछ न कुछ कर रहा है।

अस्तु, तो जो कुछ भी मनुष्य अपने जीवन में करता है वो सब कर्म है। अतएव आप ऐसा भी कह सकते है कि क्रिया को कर्म कहते है। अब यही ‘कर्म’ को विभिन्न प्रसंगों में परिभाषित किया गया है - जैसे आसक्ति से युक्त कर्म, कर्तव्य कर्म, शुभ-अशुभ कर्म आदि। उद्धरण के लिए कर्म-संग्रह (यानी कर्म का संचय कैसे होता है) के प्रसंग में कुछ इस प्रकार कहा गया है-

गीता १८. १८ ने कहा ‘करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः।’ अर्थात् “कर्ता, करण तथा क्रिया - यह तीन प्रकार का कर्म-संग्रह है।”

क्रिया - देखना, सुनना, समझना, स्मरण करना, खाना, पीना आदि को ‘क्रिया’ कहते है। दूसरे शब्दों में ‘करने को’ ‘क्रिया’ कहते है। कर्ता - उपर्युक्त समस्त क्रियाओं को ‘करने वाले’ को ‘कर्ता’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में ‘कर्म करने वाले को’ ‘कर्ता’ कहते है। करण - जिन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा उपर्युक्त समस्त क्रियाएं की जाती है, उसको ‘करण’ कहते है। दूसरे शब्दों में जिन साधनों से कर्म किया जाये उसे ‘करण’ कहते है।

इन तीनों के संयोग से ही कर्म का संग्रह होता है। गीता ३.२७ अनुसार “जब मनुष्य 'मैं करता हूँ।' ऐसा मानता है।” तो उसके किये गए क्रिया को कर्म कहेंगे। अतएव जब मनुष्य स्वयं कर्ता बनकर अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा क्रिया करके किसी कर्म को करता है, तभी कर्म बनता है और फिर इसी कर्म का संग्रह होता है जिसे कर्म-संग्रह कहते है। अतएव यहाँ कर्म-संग्रह के प्रसंग में कर्म को परिभाषित किया गया, अर्थात् मनुष्य तो कर्म (क्रिया) करता है परन्तु साथी ही “मैं करता हूँ” इस भाव से जो कुछ करता है वो कर्म है। यह कर्म-संग्रह के प्रसंग में कर्म के बारे में बताया गया।

निष्कर्ष :- मूल रूप से ‘कर्म’ को आप ‘क्रिया’ समझिये। और दी गई अन्य परिभाषाओं को, कर्म (यानी क्रिया) को ध्यान में रखते हुए परिभाषित किया गया है यह समझिये।।

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