धन्वंतरि

धन्वंतरि

धन्वंतरि जी का जन्म (प्रकट)

धनत्रयोदशी समुद्र मंथन के समय हाथों में अमृत कलश लिए भगवान विष्णु ही धन्वंतरि रूप में प्रगट हुए।कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था। जन्म शब्द बनता है जनि धातु से, और जनि का अर्थ है प्रादुर्भाव। प्रादुर्भाव माने प्रकट होना या दोबारा नये सिरे से अस्तित्व में आना। अधिक जानने के लिए पढ़े ❛जन्म का मतलब? क्या श्री कृष्ण, श्री राम का जन्म हुआ था?❜ तो क्योंकि समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ अर्थात प्रगट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है।

धन्वंतरि का भगवान विष्णु रूप

धन्वंतरि को हिन्दू धर्म में देवताओं के वैद्य माना जाता है। ये एक महान चिकित्सक है। धन्वंतरी जी भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनका पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था। कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी, चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव (प्रकट)हुआ था। इसीलिये दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस को भगवान धन्वंतरी का जन्म धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन इन्होंने आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव (प्रकट) किया था। इन्‍हे आयुर्वेद की चिकित्सा करनें वाले वैद्य आरोग्य का देवता कहते हैं। भगवान् धन्वंतरि जी ने आयुर्वेद को प्रकट किया। जैसे हम आपको वेदों शास्त्रों के सिद्धांत को आपके समक्ष प्रकट करते हैं। उन वेदों के सिद्धांत को हम बनाते नहीं हैं। वैसे ही भगवान् धन्वंतरि जी ने आयुर्वेद को प्रकट किया। आयुर्वेद वेद का ही अंश (भाग) है। अर्थात आयुर्वेद उपवेद हैं। वेद के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़े ❛वेद❜
धन्वंतरी को भगवान विष्णु का रूप कहते हैं जिनकी चार भुजायें हैं। उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं। अमृत कलश पीतल का बना था। इसीलिये धनतेरस को पीतल आदि के बर्तन खरीदने की परंपरा लोगोंने बना ली हैं। परन्तु यह प्रथा या परम्परा कोहमें नहीं मनानी चाहिए, क्योंकि इस प्रथा का कोई मतलब नहीं निकलता। चूंकि भगवान धन्वंतरि कलश लेकर प्रकट इसलिए हम भी बर्तन लेकर प्रकट हो ये बात कुछ जमी नहीं। इसलिए यह प्रथा को त्याग दीजिये।

धन्वंतरि का आयुर्वेद से संबंध

आयुर्वेद के संबंध में सुश्रुत का मत है कि ब्रह्माजी ने पहली बार एक लाख श्लोक के, आयुर्वेद का प्रकाशन किया था जिसमें एक सहस्र अध्याय थे। उनसे प्रजापति ने पढ़ा तदुपरांत उनसे अश्विनी कुमारों ने पढ़ा और उन से इन्द्र ने पढ़ा। इन्द्रदेव से धन्वंतरि ने पढ़ा और उन्हें सुन कर सुश्रुत मुनि ने आयुर्वेद की रचना की। भावप्रकाश के अनुसार आत्रेय प्रमुख मुनियों ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर उसे अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों को दिया।

महिमा

वैदिक काल में जो महत्व और स्थान अश्विनी को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धन्वंतरि को प्राप्त हुआ। जहाँ अश्विनी के हाथ में मधुकलश था वहाँ धन्वंतरि को अमृत कलश मिला, क्योंकि विष्णु संसार की रक्षा करते हैं अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अंश माना गया। विषविद्या के संबंध में कश्यप और तक्षक का जो संवाद महाभारत में आया है, वैसा ही धन्वंतरि और नागदेवी मनसा का ब्रह्मवैवर्त पुराण ३.५१ में आया है।
अवश्य पढ़े ❛धनतेरस क्यों मनाया जाता है व धनतेरस मनाने का कारण?❜