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क्या भक्त की मुक्ति (मोक्ष) पर वो भगवान बन जाता है?

जो मुक्त हो जाते है वो भी भगवान नहीं बन जाते।

भक्त (वास्तविक महापुरुष / गुरु / संत) भगवान एक है।

क्या जो भगवान को पा लेता है वह तो भगवान के बराबर हो गया? क्योंकि ❛वेद❜ शास्त्र पुराण इन सब में ऐसे भी मंत्र पाए गए हैं, जो कहते हैं कि भक्त और भगवान एक ही है। जैसे मुण्डकोपनिषद ३.२.९ "ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति" अर्थात् उस भगवान को जानकर वह (भक्त) भगवान बन जाता है। इसी बात तो तुलसीदास जी ने भी लिखा कि "जानत तुमहि तुमहि होइ जाई।" नारद जी भी कहते हैं नारद भक्ति सूत्र ४१ भक्त और भगवान में अंतर नहीं होता। भागवत ११.२९.३४ भी यही कहती है कि भक्त भगवतप्राप्ति के बाद भगवान हो जाता है। सब शास्त्र वेद कह रहे है कि भक्त भगवान हो जाता है। हाँ हो जाता है, ये भी ठीक है।
लेकिन! वेदव्यास जी ने उत्तर दिया वेदान्त ४.४.२१ कि वह ज्ञान, आनंद और भगवान की सत्ता ये भगवान भक्त को दे देते है। जो भगवान की सत् चित् आनंद = सच्चिदानंद है वह तीनों चीजों भक्त को मिल जाती है, इसलिए भक्त भगवान के बराबर हो जाता है। अर्थात् जिस आनंद में भगवान सदा से लीन है वही आनंद जीव को देते हैं। तो कोई अंतर नहीं होता भगवान के आनंद में और जीव (भक्त) के आनंद में। भगवान के पास जो आनंद है वही जीव (भक्त) को दे देते है सदा के लिए। और भगवान का ज्ञान भी सदा के लिए मिल जाता है भक्त को। फिर माया का अज्ञान हावी नहीं हो सकता। गोपालतापिन्युपनिषत् ७ "सदा पश्यन्ति सूरयः।" अर्थात् सदा के लिए अज्ञान गया दुख गया यानी माया गयी। लेकिन!

भक्त (वास्तविक महापुरुष / गुरु / संत) से भगवान में एक अंतर है।

वेदान्त ४.४.१७ अर्थात् संसार बनाने का काम, संसार की रक्षा करने का काम, संसार को प्रलय करने का काम, यह भगवान किसी को नहीं देते। चाहें वो महापुरुषों भक्त हो। यानी भगवान को पा लेने के बाद भी, एक मामले में अंतर बना हुआ है। इसीलिए ❛हमने भगवान की परिभाषा वेदों के द्वारा बताया❜ कि "जिससे संसार उत्पन्न हो, जिससे संसार का पालन हो, जिसमे संसार का लय हो, वह भगवान है।"

जो मुक्त हो जाते है वो भी भगवान नहीं बन जाते।

जो मुक्त हो जाते हैं अर्थात् भगवान में लीन हो जाते हैं। वो भी अपनी व्यक्तित्व (Personality / सत्ता) रखते हैं। आत्मा की सत्ता सदा रहती है। गीता २.२३ "न शोषयति मारुतः" आत्मा नष्ट नहीं हो सकती, वो सदा रहेगी। मुक्त की अवस्ता में भी रहेगी।
दूसरे शब्दो में कहे तो एक मुक्ति (मोक्ष) कहलाती है। जिसे अनुसार आत्मा भगवान में मिल जाता है लेकिन आत्मा की सत्ता है वह सदा रहेगी मुक्त (मोक्ष) की अवस्था में भी। जैसे यह बात ऐसी है कि समुद्र में नदी मिल गई लेकिन वह नदी का पानी समुद्र में है इसी प्रकार भगवान में जीव मिल जाता है लेकिन जीव की अपनी सत्ता होती है।

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