आत्मा और भगवान में भेद और अभेद - वेद वेदांत के प्रमाण।

वेद वेदान्त के द्वारा आत्मा और भगवान में अभेद भी है।

वेदान्त द्वारा भेद और अभेद

वेदान्त २.१.२२ "ब्रह्म बहुत अधिक है, क्योंकि जीवात्मा से ब्रह्म का भेद बताया गया है" वेदान्त २.१.२३ "जैसे लकड़ पत्थर से भगवान की तुलना नहीं हो सकती, ऐसे ही जीव से भगवान की बराबरी नहीं हो सकती। तो बहुत भेद है" वेदान्त १.३.४, 'भेदव्यपदेशात्' वेदान्त १.१.१८ 'भेदव्यपदेशाच' वेदान्त १.१.२२ 'भेदव्यपदेशाचान्य:' वेदान्त १.२.२१, वेदान्त १.२.८ 'संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेप्यात्' वेदान्त १.३.६ 'स्थित्यदनाभ्यां च' वेदान्त ३.२.२७ 'उभयव्यपदेशात्त्रहिकुण्डलवत्' वेदान्त ३.४.८ 'अधिकोपदेशात्' इन सब में भगवान के अवतार वेदव्यास जी ने लिखा की जीव और भगवान में बहुत भेद (अंतर) है।

वेद द्वारा भेद और अभेद

एक ही ❛वेद❜ (❛उपनिषद्❜) में भेद भी बताया गया और अभेद भी बताया गया। जैसे छान्दोग्योपनिषद्, इसमें पहले अभेद मंत्र है, छान्दोग्योपनिषद् ६.८.७ 'तत् त्वम् असि' और भेद मंत्र है छान्दोग्योपनिषद् ६.१४.१।
तो अभेद मंत्र में कहा जा रहा है 'तत् त्वम् असि' अर्थात तू वही है। मतलब ऐ जीव तू ब्रह्म (भगवान) है। और भेद मंत्र में कहा जा रहा है छान्दोग्योपनिषद् ६.१४.१ 'ऐ जिव तू उससे पैदा हुआ है, उससे जीवित है, उसी में लय होगा, इसलिए उसकी भक्ति कर।; ये भेद और अभेद एक ही ❛वेद❜ (❛उपनिषद्❜) में बताया गया है।
बृहदारण्यकोपनिषद् १.४.१० 'अहम् ब्रह्मास्मि' अर्थात मैं ब्रह्म हूँ। मतलब जीव ब्रह्म है। यह अभेद मंत्र है, जो आत्मा और परमात्मा (भगवान) एक है ऐसा कहता है। और इसी उपनिषद् (वेद) में कहा बृहदारण्यकोपनिषद् १.४.१० अर्थात जैसे बहुत बड़े अग्नि के कुंज से चिंगारियां निकलती रहती है, ऐसे से ही उस ब्रह्म (भगवान) से अंनत जीव प्रकट हुए हैं। सदा से प्रकट है। एक दिन प्रकट नहीं हुए। यानि भेद है।