वेद - कर्म-धर्म का पालन करने वाले घोर मूर्ख है।

वेद - कर्म-धर्म।
वेदों में यज्ञ को प्रमुख धर्म बताया है। तो हमने आपको बतया यज्ञ करने की विधि में ६ शर्तें। इस लेख में हमने ६ नियम को बताया लेकिन इनका पालन करना इतना कठिन है की कलुग में असम्भ सा है। फिर हमने आपको इस लेख में वेदों पुराणों द्वारा बताया वेद कहता है - कर्म धर्म का पालन करना बेकार है। क्योंकि उसका फल है स्वर्ग। इस बात को हमने आपको विस्तार पूर्वक प्रमाणों द्वारा बताया इस लेख में कि कर्म-धर्म का पालन करने का फल क्या है? इस लेख का सारांश यह है कि कर्म-धर्म का पालन करने वाले लोग स्वर्ग जाते है कुछ दिन के लिए उसके बाद निचे आते है तो कुत्ते बिल्ली गधे की निम्न योनि में या नर्क में डाल दिए जाते है।
वेद कहता है, मुण्डकोपनिषद १.२.१०
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥
अर्थात् ’इष्ट’ कर्म अग्निहोत्रादि पञ्चमहायज्ञ और अन्य श्रुति-विहित कर्मों को कहा जाता है मतलब धर्म। अस्पताल बनवाना, गरीबों को भोजन कराना, आदि स्मृति-विहित कर्म ’पूर्त’ कर्म कहाते हैं।
तो इष्ट (धर्म) और पूर्त कर्मों को ही सबसे श्रेष्ठ मानते हुए, विशेष रूप से घोर मूर्ख जन उनसे भिन्न श्रेय, अर्थात् वास्तविक श्रेयस्कर कर्मों, को नहीं जानते । इन पुण्यकर्मों के कारण, वे स्वर्ग के उच्चतम पद को प्राप्त कर वहाँ के सुखों का अनुभव करके, बाद में मृत्युलोक में पूर्व की मनुष्य योनि में, या उस से भी हीन (कुत्ते बिल्ली मछर) कि योनियों में प्रवेश करते हैं।
तो वेद ने प्रमूढाः शब्द का प्रयोग किया है मतलब कि कर्म धर्म का पालन करने वाला मामूली मूर्ख नहीं है वो विशेष मूर्ख है। इसलिए स्वर्ग में जाने वाले लोग को वेद कहता है कि वो मूर्ख है। क्यों? इसलिए जो कर्म धर्म का पालन है उसमे बहुत परिश्रम है (हमने आपको बताया है कि यज्ञ में ६ नियम का पालन ठीक-ठीक करे) और कोई गलती हो जाये तो दण्ड मिलता है। एक बार राजा नृग को गिरगिट बनना पड़ा उनसे धर्म का पालन करने में गलती हुए तो। और राजा निमि - श्राप से सम्बंधित एक कथा।
तो इतना परिश्रम करो और एक भी गलती हो जाये तो दण्ड मिले! ऐसे कर्म-धर्म का पालन क्यों करे हम। तो क्या करे? यह जानने के लिए पढ़े मनुष्य का क्या कर्तव्य है, क्या करें और क्या नहीं करें है? `