स्वामी विवेकानन्द के अनमोल वचन
हमारे देश में कई ऐसे महापुरूष हुए हैं, जिनके जीवन और विचार से कोई भी व्यक्ति बहुत कुछ सीख सकता है। उनके विचार ऐसे हैं कि निराश व्यक्ति भी अगर उसे पढ़े तो उसे जीवन जीने का एक नया मकसद मिल सकता है।
इन्हीं में से एक हैं स्वामी विवेकानंद। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। पहले जानिए उनके बारे में ये खास बातें...
स्वामी विवेकानन्द ने कहा
- मैं सिर्फ और सिर्फ प्रेम की शिक्षा देता हूँ और मेरी सारी शिक्षा वेदों के उन महान सत्यों पर आधारित है जो हमें समानता और आत्मा की सर्वत्रता का ज्ञान देती है।
- सफलता के तीन आवश्यक अंग हैं-शुद्धता, धैर्य और दृढ़ता। लेकिन, इन सबसे बढ़कर जो आवश्यक है वह है प्रेम।
- हम ऐसी शिक्षा चाहते हैं जिससे चरित्र निर्माण हो। मानसिक शक्ति का विकास हो। ज्ञान का विस्तार हो और जिससे हम खुद के पैरों पर खड़े होने में सक्षम बन जाएं।
- खुद को समझाएं, दूसरों को समझाएं। सोई हुई आत्मा को आवाज दें और देखें कि यह कैसे जागृत होती है। सोई हुई आत्मा के का जागृत होने पर ताकत, उन्नति, अच्छाई, सब कुछ आ जाएगा।
- मेरे आदर्श को सिर्फ इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता हैः मानव जाति देवत्व की सीख का इस्तेमाल अपने जीवन में हर कदम पर करे।
- अगर आपको तैतीस करोड़ देवी-देवताओं पर भरोसा है लेकिन खुद पर नहीं तो आप को मुक्ति नहीं मिल सकती। खुद पर भरोसा रखें, अडिग रहें और मजबूत बनें। हमें इसकी ही जरूरत है।
- शक्ति की वजह से ही हम जीवन में ज्यादा पाने की चेष्टा करते हैं। इसी की वजह से हम पाप कर बैठते हैं और दुख को आमंत्रित करते हैं। पाप और दुख का कारण कमजोरी होता है। कमजोरी से अज्ञानता आती है और अज्ञानता से दुख।
- पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान. ध्यान से ही हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है।
- ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।
- जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।
- पवित्रता, धैर्य और उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूँ।
- जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिये, नहीं तो लोगो का विश्वास उठ जाता है।
- जब तक आप खुद पे विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पे विश्वास नहीं कर सकते।
- एक समय में एक काम करो , और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।
स्वामीजी के उपदेशों का सूत्रवाक्य, "उतिष्ठत जग्रत वरान् प्राप्य तत् निबोधत" कठोपनिषद् के एक मंत्र से प्रेरित है:
उतिष्ठत जग्रत वरान् प्राप्य तत् निबोधत।
निशिता क्षुरस्य धारा दुरत्यया दुर्गं तत् पथः इति कवयः वदन्ति।। कठोपनिषद् १.३.१४
अर्थात - उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों (गुरु) से ज्ञान प्राप्त करो। ज्ञान प्राप्ति का मार्ग उसी प्रकार दुर्गम है जिस प्रकार छुरे के पैना किये गये धार पर चलना। अवश्य पढ़े - स्वामी विवेकानन्द