अर्जुन ने युद्ध भूमि में कर्म किया था, कर्म का मूल अर्थ?

कर्म का मूल अर्थ?
हमने आपको बताया की कर्म किसे कहते हैं? कर्म, क्रिया और कार्य में क्या भेद हैं? कर्म क्या है? इस लेख में विस्तार रूप से बतया। लेकिन! हम ने इस लेख में माया जगत कर्म के कर्म को बताया।
लेकिन अब हम आपको कर्म का मूल अर्थ बताने जा रहे है। कर्म कामना से उत्पन होता है और कामना आसक्ति से होती है। जिसकी जहाँ आसक्ति होगी, उसीकी कामना होगी और जिसकी कामना होगी उसकी पूर्ति में आनंद (सुख) मिलेगा, और लोभ पैदा होगा। कामना की पूर्ति नहीं हुई तो दुःख मिलेगा, और क्रोध पैदा होगा।

दो प्रकार के कर्म

तो अब कर्म भी दो प्रकार के हो गए एक तो संसार संबंधी कर्म और एक भगवान संबंधी कर्म। जैसा कि हमने आपको बताया कि कर्म कामना से उत्पन्न होता है और कामना आसक्ति से उत्पन्न होती है। हम लोग जो माया के आधीन हैं हमारी आसक्ति माया के जगत में है और जो ऋषि मुनि संत महात्मा भक्ति त्यागी लोग हैं उनका आसक्ति या अटैचमेंट भगवान में है। भगवान में आसक्त होना या भगवान में मन का लगना यही भक्ति कहलाती है और संसार में मन का आसक्त होना या अटैचमेंट होना यह संसारी आसक्ति कहलाती है। इसी को माया का बंधन कहते हैं।
तो युद्ध भूमि क्योंकि अर्जुन का मन भगवान (श्री कृष्ण) में आसक्त था। तो उसको भगवान संबंधी कर्म का फल मिला, उसको भगवान का प्रेम मिला, भगवान का सुख मिला क्योंकि अर्जुन का मन भगवान में आसक्त था। भगवान में अर्जुन का मन सदा लगा था इसलिए अर्जुन ने कर्म किया था लेकिन भगवत संबंधी या भगवान के संबंधित कर्म किया था।
वैसे तो वेद शास्त्र सिद्ध भक्तों के बारे में कहते हैं कि वह कृतकृत्य हो चुके - करना कर चुके। भावार्थ यह है कि जो सिद्ध भक्त हो, संत हो, वह संसार संबंधी कर्म कर चुके। क्यों? इसलिए क्योंकि हम कर्म इसलिए करते हैं क्योंकि हमें आनंद चाहिए और जो संत, महात्मा, भक्त लोग हैं यह भगवान को पा लेते हैं। तो हमने आपको अपने कई लेख में बताया है कि भगवान ही आनंद है भगवान का दूसरा नाम है आनंद। क्योंकि भक्त भगवान को पा लेते हैं इसलिए अब वह कोई भी कर्म नहीं करते संसार संबंधी। लेकिन वह भगवान संबंधी कर्म करते हैं।
यह भगवान संबंधी कर्म को भक्ति कहते हैं। जैसे अभी एक भक्त भक्ति कर रहा है, उसे भगवान नहीं मिले हैं, तो अब उस से प्रश्न पूछिए कि क्या कर रहे हो? तो वह कहेगा भक्ति। फिर पूछा क्यों कर रहे हो? तो वह कहेगा भक्ति (दिव्य भक्ति) पाने के लिए। क्योंकि वह जो भक्ति कर रहा है वह माया के आधीन भक्ति है, जब कोई व्यक्ति का मन शुद्ध हो जाता है, तो भगवान और गुरु के द्वारा उसे दिव्य भक्ति दी जाती है। तो इसलिए क्या कर रहे हो? भक्ति, क्यों कर रहे हो? दिव्य भक्ति के लिए और क्या करोगे दिव्य भक्ति को लेकर? दिव्य भक्ति करेंगे!
अर्थात भक्ति कर रहे हैं, भक्ति के लिए और फिर उस भक्ति को अपने पूरे जीवन संजोये रहेंगे। तो वह भक्त भगवान को पा कर भी भक्ति करता है क्योंकि वह जितना भक्ति करता है उतना ही आनंद में वृद्धि होती है। क्योंकि वह भक्त भगवान से जितना प्रेम करता है उतना भगवान उस से प्रेम करते हैं, तो प्रेम और बढ़ता है। तो यह जो कार्य हो रहा है यह भगवान संबंधी हो रहा है। इसी को भक्ति कह देते हैं।
तो यह कर्म के बारे में समझ जाएंगे कि कर्म भी दो प्रकार का होता है एक संसार संबंधी और एक भगवान संबंधी। तो भगवान संबंधी कर्म को भक्ति कहते हैं और संसार संबंधी कर्म को आसक्ति कहते हैं, अटैचमेंट कहते हैं या माया की भक्ति कहते हैं अनेक नाम है।

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