राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न विष्णु ही थे - रामायण प्रमाण

राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कौन थे?
राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न यह चारों भगवान विष्णु ही थे यह बात वाल्मीकि रामायण द्वारा प्रमाणित भी है। वाल्मीकि रामायण बाल काण्ड सर्ग १५ में विस्तारपूर्वक से कहा गया है कि देवता लोग रावण के अत्याचार से परेशान होकर ब्रह्मा जी के पास जाते है और रावण के अत्याचार के बारे में बताते हैं। फिर ब्रह्मा जी सोच करके कहते हैं कि 'हमें रावण को मारने का उपाय मिल गया है, उसने वर मांगते समय यह कहा था कि मैं गंधर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसों के हाथों से नहीं मारा जाऊँ। मैंने भी "तथास्तु" कह कर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। लेकिन मनुष्यों को वह तुच्छ समझता था। इसलिए उसने वर में मनुष्य के हाथों ना मारे जाने का वर नहीं माँगा। इसलिए मनुष्य के हाथ से ही उसका वध होगा, मनुष्य के सिवा कोई दूसरा उसकी मृत्यु का कारण नहीं है।' ब्रह्मा जी का कथन सुन देवता व ऋषि गण प्रसन्न हुए।
एतस्मिन् अनन्तरे विष्णुः उपयातो महाद्युतिः।
श्ङ्ख चक्र गदा पाणिः पीत वासा जगत्पतिः॥१-१५-१६॥
वैनतेयम् समारूह्य भास्कर तोयदम् यथा।
तप्त हाटक केयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः॥१-१५-१७॥
ब्रह्मणा च समागम्य तत्र तस्थौ समाहितः।
भावार्थ: - इसी समय महान तेजस्वी जगतपति भगवान विष्णु भी मेघके ऊपर स्थित हुए सूर्यकी भांति गरुड़ पर सवार होकर वहाँ आ पहुँचे। उनके शरीर पर पीताम्बर और हाथों में शंख चक्र एवं गधा आदि आयुध शोभा पा रहे थे। उनकी दोनों भुजाओं में तपाते हुए सुवर्ण के बने केयूर प्रकाशित हो रहे थे। उस समय संपूर्ण देवताओं ने उनकी वंदना की और वह ब्रह्मा जी से मिलकर सावधानी के साथ सभा में विराजमान हो गये।
तमब्रुवन् सुराः सर्वे समभिष्टूय सन्नताः॥१-१५-१८॥
त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया।
भावार्थ:- समस्त देवता विनती भाव से उनकी स्तुति करके कहा - 'सर्वव्यापी परमेश्वर हम तीनों लोगों के हित की कामना से आपके ऊपर एक महान कार्य का भार दे रहे हैं।'
राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभोः॥१-१५-१९॥
धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः।
अस्य भार्यासु तिसृषु ह्री श्री कीर्ति उपमासु च॥१-१५-२०॥
विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वात्मानं चतुर्विधम्।
तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम्॥१-१५-२१॥
भावार्थ:- प्रभु! अयोध्या के राजा दशरथ धर्मज्ञ, उदार तथा महर्षियों के समान तेजस्वी है। उनके तीन रानियाँ है, जो ही, श्री और कीर्ति - इन तीन देवियों के समान है। विष्णु देव! आप अपने चार स्वरूप बनाकर राजा की उन तीनों रानियों के गर्भ में पुत्र रूप में अवतार ग्रहण कीजिये। इस प्रकार मनुष्यरूप में प्रकट होकर आप संसार के लिये प्रबल कण्टकरूप रावण को, जो देवताओं के लियें अवध्य है, समरभूमि में डालिये।
१-१५-२१ - इस श्लोक में देवता कह रहे हैं कि प्रभु (विष्णु) आप अपना चार रूप धारण करके राजा के उन तीनों रानियों के गर्भ से पुत्र रूप में अवतार लीजिये। अर्थात देवता ये प्राथना कर रहे है कि राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का रूप धारण कर प्रभु विष्णु जी रावण के अत्याचार से मुक्त कीजिये। और भगवान विष्णु आगे स्वयं भी कह देते हैं वाल्मीकि रामायण बाल काण्ड सर्ग १५ का ३१ श्लोक (भगवान विष्णु ने देवताओं की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए स्वयं कहा)
ततः पद्मपलाशाक्षः कृत्वा ऽ ऽत्मानं चतुर्विधम्॥१-१५-३१॥
पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्।
भावार्थ:- इसके बाद कमलनयन श्री हरि ने अपने को चार रूपों में प्रकट करके राजा दशरथ को पिता बनाने का निश्चय किया।
इस श्लोक से यह सिद्ध हो जाता है कि भगवान विष्णु स्वयं को चारों (राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न) रूप में प्रकट करूंगा कहकर सिद्ध कर देते है कि विष्णु ही लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और राम बने है।
भगवान विष्णु ही चारों रूप में प्रकट हुए। इस का एक और प्रमाण मिलता है जब लक्ष्मण जी का त्याग हो जाता है और उनकी मृत्यु होती है। उस वक्त महर्षि वाल्मीकि जी लिखते हैं वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग १०६ में
ततो विष्णोश्चतुर्भागमागतं सुरसत्तमाः।
हृष्टाः प्रमुदिताः सर्वेऽपूजयनृषिभिः सह॥७.१०६.१८॥
भावार्थ:- भगवान विष्णु के चतुर्थ (चौथे) अंश लक्ष्मण को आया देख सभी देवता हर्ष से भर गये और उन सबने प्रसन्नतापूर्वक लक्ष्मण की पूजा की।
७.१०६.१८ - श्लोक से यह सिद्ध हो जाता है कि भगवान विष्णु के चौथे अंश लक्ष्मण जी है। अतएव भगवान विष्णु ही राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुए। यह कहा जाता है कि लक्ष्मण जी शेषनाग के अवतार हैं यह सत्य बात है। लेकिन वह शेषनाग कौन है? शेषनाग भगवान विष्णु ही बने हैं। और हमने आपको अपने लेख में भी बताया है कि भगवान के समस्त अवतार एक हैं अतः उसे सिद्धांत से भी भगवान राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न एक हो गए और शेषनाग भी विष्णु जी है यह बात भी सिद्ध हो जाती है।